सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 592, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 592
  • उत्तरपर्व *

५८१

निन्दक और सत्कर्ममें दोषदृष्टि रखनेवाला महान् पापी समझा जाता है। किंतु ऐसा घोर पापी भी बहुतसे सुवर्णोंसे युक्त उभयमुखी कपिलाके दानसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। दाताको चाहिये कि उस दिन खीरका भोजन करे अथवा दूधके ही सहारे रहे।

जो इस प्रकार उभयमुखी कपिला गौका दान करता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर समाहितचित्तसे तीन बार भक्तिपूर्वक इस कल्प— 'गोदान-विधान' को पढ़ता है, उसके वर्षभरके

किये हुए पाप उसी क्षण इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वायुके झोंकेसे धूलके समूह। जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर इस परम पावन प्रसङ्गका पाठ करता है, उस बुद्धिमान् पुरुषके अन्तरमें दिव्य संस्कार भर जाते हैं और पितर उसकी वस्तुओंको बड़े प्रेमसे ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको ब्राह्मणोंके सम्मुख इसका पाठ करता है, उसके पितर सौ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं। जो पुरुष मन लगाकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसके सौ वर्षोंके पाप नष्ट हो जाते हैं।

(अध्याय १६१)

महिषी एवं मेघी-दानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—'राजन्! अब मैं पापनाशक, पुण्यप्रद तथा आयु और सुखप्रदायक महिषीके दानकी विधि बता रहा हूँ। सूर्य-चन्द्रग्रहण, कार्तिक-पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी आदि पर्व-दिनोंमें अथवा जब भी सामर्थ्य हो, उसी समय सांसारिक दुःखकी निवृत्तिके लिये महिषी-दान करना चाहिये। शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अलंकृत महिषी उत्तम विद्वान् ब्राह्मणको देनी चाहिये। दान देनेके समय इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये—

इन्द्रादिलोकपालानां या राजमहिषी शुभा। महिषीदानमाहात्म्यात् सास्तु मे सर्वकामदा॥ धर्मराजस्य साहाय्ये यस्य पुत्रः प्रतिष्ठितः। महिषासुरस्य जननी या सास्तु वरदा मम॥

(उत्तरपर्व १६२।१-१०)

'जो इन्द्रादि लोकपालोंकी कल्याणकारिणी राजमहिषी है और धर्मराजकी सहायता करनेके लिये जिसका पुत्र (महिष) उनका वाहन बना हुआ है तथा जो महिषासुरकी जननी है, वह मेरे लिये वरदायिनी हो। इस महिषी-दानसे मेरी

सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जायें।'

प्रदक्षिणाके पश्चात् पृष्ठभागसे महिषीका दान करना चाहिये। वस्त्र, आभूषण और दक्षिणाके साथ महिषी ब्राह्मणको देकर विसर्जन करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति महिषीका दान करता है, वह इस लोक तथा परलोकमें वाञ्छित फल प्राप्त करता है।

महाराज! इसी प्रकार मेघी-दान भी सभी पापोंको दूर करनेवाला है। एक सुवर्णमयी मेघीकी प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम भूषण, रेशमी वस्त्र, चन्दन, पुष्पमाला आदिसे अलंकृतकर अथवा प्रत्यक्ष मेघीको अलंकृतकर उसका दान करना चाहिये। ग्रहण, विधुवयोग, अयनसंक्रान्ति आदि पवित्र दिनोंमें, दुःस्वप्न देखनेपर, अमावास्यामें अथवा जब भी श्रद्धा हो तब इसका दान करना चाहिये। दानके समय शिव-पार्वती, ब्रह्मा-गायत्री, लक्ष्मी-नारायण तथा रति-कामदेवकी पूजा करनी चाहिये, साथ ही लोकपालों और ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हवन करना चाहिये। ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके बाद

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth