भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
मेघीकी प्रतिमाको तिलके कलशपर स्थापित कर उसके सामने नमक रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और गृहस्थ ब्राह्मणको उसका दान कर दे। इस दानके प्रभावसे निःसंतानको पुत्र और निर्धनको
धन प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस दानकी विधिको सुनता है, वह भी अहोरात्रमें किये गये पापोंसे छूट जाता है।
(अध्याय १६२-१६३)
भूमिदानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले भूमिदानकी विधि बतला रहा हूँ। जो अग्निहोत्री दरिद्र-कुटुम्बी तथा वैदिक ब्राह्मणको दक्षिणासहित भूमिका दान करता है, वह बहुत समयतक ऐश्वर्यका भोग कर अन्तमें दिव्य विमानमें बैठकर विष्णुलोकको जाता है। जबतक उसके द्वारा प्रदत्त भूमिपर अंकुर उपजते रहते हैं, तबतक भूमिदाता विष्णुलोकमें पूजित होता है। भूमिदानके अतिरिक्त और कोई भी दान विशिष्ट नहीं माना गया है। पुरुषर्षभ! अन्य दान कालक्रमसे क्षीण हो जाते हैं, परंतु भूमिदानका पुण्य क्षीण नहीं होता। जो व्यक्ति सस्यसम्पन्न भूमिका दान करता है, वह जबतक भगवान् सूर्य रहेंगे, तबतक सूर्यलोकमें पूजित होता रहेगा। धन-धान्य, सुवर्ण, रत्न, आभूषण आदि सब दान करनेका फल भूमिदान करनेवाला प्राप्त कर लेता है। जिसने भूमिदान किया, उसने मानो समुद्र, नदी, पर्वत, सम-विषम स्थल, गन्ध, रस, क्षीरयुक्त ओषधि, पुष्प, फल, कमल, उत्पल आदि सब कुछ दान कर दिया। दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य भूमिदान करनेसे प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर पुनः उससे वापस नहीं लेना चाहिये। सस्यसम्पन्न भूमिका दान करनेवाले व्यक्तिके पितर प्रलयपर्यन्त संतुष्ट रहते हैं। अपनी आजीविकाके निमित्त जो पाप पुरुषसे होता है,
वे सारे पाप गोचर्म-मात्र* भूमिके दान करनेसे दूर हो जाते हैं। एक हजार स्वर्णमुद्राके दानसे जो फल बतलाया गया है, वही फल गोचर्म-प्रमाणमें भूमिका दान देनेसे प्राप्त हो जाता है। नरोत्तम! हजारों कपिला गौओंके दान करनेके समान पुण्य गोचर्म-मात्र भूमि देनेसे प्राप्त होता है। सगर आदि अनेक राजाओंने भूमिका उपयोग किया है, परंतु अपने-अपने आधिपत्यमें जिसने भी भूमिका दान किया, सभीको उसका फल प्राप्त हुआ। यमदूत, मृत्युदण्ड, असिपत्रवन, वरुणके घोर पाश और रौरवादि अनेक नरक तथा उनकी दारुण यातनाएँ भूमिदान करनेवालेके समीप नहीं आतीं। चित्रगुप्त, मृत्यु, काल, यम आदि सब भूमिदाताकी पूजा करते हैं। राजन्! भगवान् रुद्र, प्रजापति, इन्द्रादि देवता और असुरगण भूमिका दान करनेवालेकी पूजा करते हैं, स्वयं मैं भी उसकी अतीव प्रसन्नतासे पूजा करता हूँ। जिस भाँति माता अपनी संतानका और गौ जैसे अपने वत्सका दूध आदिके द्वारा पालन करती है, उसी प्रकार रसमयी भूमि भी भूमि देनेवालेकी रक्षा और पालन-पोषण करती है। जिस प्रकार जलके सेचनसे बीज अंकुरित होते हैं, उसी प्रकार भूमिदानसे सब मनोरथ अंकुरित होकर सफल सिद्ध होते हैं। जिस प्रकार सूर्यके उदय होते ही उनके प्रकाशसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भूमिके दानसे सभी प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं।
- मध्यमस्य मनुष्यस्य व्यासेन परिसंख्या। त्रिशहण्डांश्च गोचर्म दत्त्वा स्वर्गं महीयते ॥ (उत्तरपर्व १६४।२१)
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