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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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भूमिको दान देकर वापस लेनेवालेको यमदूत वारुणपाशोंसे बाँधकर पूय तथा शोणितसे भरे कुण्डोंमें डालते हैं। अपने द्वारा दी गयी अथवा दूसरे व्यक्तिके द्वारा दी गयी भूमिका जो व्यक्ति अपहरण करता है, वह प्रलयपर्यन्त नरकाग्नियें जलता रहता है। दानमें प्राप्त भूमिके हरण हो जानेपर दुःखित व्यक्तिके रोने-कलपनेसे जितने अश्रुबिन्दु गिरते हैं, उतने हजार वर्षतक भूमिका

हरण करनेवाला नरकमें कष्ट भोगता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर जो व्यक्ति पुनः उस भूमिका हरण करता है, उसे उल्टा लटका कर कुम्भीपाक नरकमें पकाया जाता है। दिव्य हजार वर्षके बाद वह व्यक्ति कुम्भीपाकसे निकलकर इस भूमिपर जन्म लेता है और सात जन्मतक अनेक प्रकारके कष्टोंको भोगता रहता है। इसलिये भूमिका हरण नहीं करना चाहिये। (अध्याय १६४)

सुवर्णरचित भूदानकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! भूमिका दान तो क्षत्रिय ही कर सकते हैं, क्योंकि क्षत्रिय ही भूमिका उपार्जन करनेमें, उसका दान करनेमें और उसके पालन करनेमें समर्थ होते हैं तथा लोगोंसे न तो भूमिका दान हो सकता है, न ही उसका पालन ही हो सकता है। अतः आप कोई ऐसा उपाय बताइये जो भूमिदानके समकक्ष हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! यदि भूमिका दान सम्भव न हो तो सुवर्णके द्वारा भूमण्डलकी आकृति बनाकर और नदी-पर्वतोंको रेखाङ्कित कर उसे ही दान कर देना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त हो जाता है। अब मैं इसकी विधि बता रहा हूँ।

सूर्य-चन्द्र-ग्रहण, जन्मनक्षत्र, विषुवयोग, युगादि तिथियों तथा अयनसंक्रान्ति आदि पुण्य समयोंमें पापक्षय और यशकी प्राप्तिके लिये इस दानको करना चाहिये। अन्य भी प्रशस्त समयोंमें जब धन एकत्र हो जाय, इस दानको किया जा सकता है। एक सौ पलसे लेकर कम-से-कम पाँच पलतक अर्थात् अपनी सामर्थ्यके अनुसार सुवर्णकी जम्बुद्वीपके आकारमें पृथ्वीकी प्रतिमा बनानी चाहिये। जिसके मध्यमें मेरु पर्वत तथा यथास्थान अन्य पर्वत अङ्कित हों। वह पृथ्वी सस्यसम्पन्न तथा लोकपालोंसे

रक्षित, ब्रह्मा, शंकर आदि देवताओंसे सुशोभित और सभी रत्न आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो। बाईस हाथ लम्बा-चौड़ा तोरणयुक्त चार द्वारोंवाला एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसमें चार हाथकी वेदी बनानी चाहिये। ईशानकोणमें वेदीपर देवताओंका स्थापन करे और अग्निकोणमें कुण्ड बनाये। पताका-तोरण आदिसे मण्डपको सजा ले। अनन्तर पञ्चलोकपाल और नवग्रहोंका षोडशोपचार पूजन करनेके बाद ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। ब्राह्मणवर्ग वेदध्वनि करते हुए तथा मङ्गलघोषपूर्वक भेरी, शङ्खु इत्यादि वाद्योंकी ध्वनिके साथ उस सुवर्णमयी पृथ्वीकी प्रतिमाको मण्डपमें लाकर तिल बिछी हुई वेदीपर स्थापित करे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्न, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चँदोवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनद्वारा अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्न कर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अङ्गलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—

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