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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 595, कुल 654 में से

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पृष्ठ 595

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः। धात्री त्वमसि भूतानामतः पाहि वसुन्धरे॥ वसु धारयसे यस्मात् सर्वसौख्यप्रदायकम्। वसुन्धरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्॥ चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद्यस्मादनं तवाचले। अनन्तायै नमस्तुभ्यं पाहि संसारकर्दमात्॥ त्वमेव लक्ष्मीर्गोविन्दे शिवे गौरीति संस्थिता। गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा॥ बुद्धिवर्हस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता। विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात् ततो विश्वम्भरा मता॥ धृतिः क्षितिः क्षमा क्षोणी पृथिवी वसुधा मही। एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्॥

(उत्तरपर्व १६५।२१—२६)

‘वसुन्धरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं और सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके सुखप्रदाता वसुओंको धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा नाम वसुन्धरा है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते, इसलिये

तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रवियें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधारूपमें स्थित हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, क्षिति, क्षमा, क्षोणी, पृथिवी, वसुधा तथा मही—ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।’

इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्ति ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीकी सुवर्णमूर्तिका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा शुद्ध घंटिकाओं (घुँघरू)—से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर इस संसारमें आकर वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा होता है।

(अध्याय १६५)

हलपंक्तिदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सर्वपापनाशक तथा सर्वसौख्यप्रद हलपंक्ति-दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे सभी प्रकारके दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। एक हलके लिये चार बैलोंकी आवश्यकता होती है और दस हलोंकी एक पंक्ति होती है। साखूकी लकड़ीसे दस हल बनवाकर उन्हें सुवर्ण-पट्ट और रलोंसे मढ़कर अलंकृत कर ले। वस्त्र, स्वर्ण, पुष्प तथा चन्दन आदिसे मण्डित तरुण, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट, उत्तम वृष उन हलोंमें जोतने चाहिये। बैलोंके कन्धोंपर जुआ भी रखे, साथमें

कील लगा हुआ अंकुश आदि उपकरण भी रहने चाहिये। पर्वकालमें हलपंक्तिके साथ सस्यसम्पन्न बड़ा ग्राम, छोटा ग्राम अथवा सौ निवर्तन (सौ बीघा) अथवा पचास निवर्तन भूमि देनी चाहिये। इसका दान विशेषरूपसे कार्तिकी, वैशाखी, अयनसंक्रान्ति, जन्मनक्षत्र, ग्रहण, विषुवयोगमें करे। वेदवेत्ता, सदाचारी, सम्पूर्णज्ञ अलंकृत दस ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। दस हाथ प्रमाणवाला एक मण्डप बनाकर उसमें पूर्व दिशामें एक हाथ प्रमाणवाले दो अथवा एक कुण्ड बनावे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंसे पलाशकी समिधा, घी, काला

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