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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • उत्तरपर्व *

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निन्दक और सत्कर्ममें दोषदृष्टि रखनेवाला महान् पापी समझा जाता है। किंतु ऐसा घोर पापी भी बहुतसे सुवर्णोंसे युक्त उभयमुखी कपिलाके दानसे समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है। दाताको चाहिये कि उस दिन खीरका भोजन करे अथवा दूधके ही सहारे रहे।

जो इस प्रकार उभयमुखी कपिला गौका दान करता है, वह सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त कर लेता है। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर समाहितचित्तसे तीन बार भक्तिपूर्वक इस कल्प— 'गोदान-विधान' को पढ़ता है, उसके वर्षभरके

किये हुए पाप उसी क्षण इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वायुके झोंकेसे धूलके समूह। जो पुरुष श्राद्धके अवसरपर इस परम पावन प्रसङ्गका पाठ करता है, उस बुद्धिमान् पुरुषके अन्तरमें दिव्य संस्कार भर जाते हैं और पितर उसकी वस्तुओंको बड़े प्रेमसे ग्रहण करते हैं। जो अमावास्याको ब्राह्मणोंके सम्मुख इसका पाठ करता है, उसके पितर सौ वर्षके लिये तृप्त हो जाते हैं। जो पुरुष मन लगाकर निरन्तर इसका श्रवण करता है, उसके सौ वर्षोंके पाप नष्ट हो जाते हैं।

(अध्याय १६१)

महिषी एवं मेघी-दानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—'राजन्! अब मैं पापनाशक, पुण्यप्रद तथा आयु और सुखप्रदायक महिषीके दानकी विधि बता रहा हूँ। सूर्य-चन्द्रग्रहण, कार्तिक-पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, शुक्ल पक्षकी चतुर्दशी आदि पर्व-दिनोंमें अथवा जब भी सामर्थ्य हो, उसी समय सांसारिक दुःखकी निवृत्तिके लिये महिषी-दान करना चाहिये। शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न तथा अलंकृत महिषी उत्तम विद्वान् ब्राह्मणको देनी चाहिये। दान देनेके समय इस मन्त्रको पढ़ना चाहिये—

इन्द्रादिलोकपालानां या राजमहिषी शुभा। महिषीदानमाहात्म्यात् सास्तु मे सर्वकामदा॥ धर्मराजस्य साहाय्ये यस्य पुत्रः प्रतिष्ठितः। महिषासुरस्य जननी या सास्तु वरदा मम॥

(उत्तरपर्व १६२।१-१०)

'जो इन्द्रादि लोकपालोंकी कल्याणकारिणी राजमहिषी है और धर्मराजकी सहायता करनेके लिये जिसका पुत्र (महिष) उनका वाहन बना हुआ है तथा जो महिषासुरकी जननी है, वह मेरे लिये वरदायिनी हो। इस महिषी-दानसे मेरी

सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जायें।'

प्रदक्षिणाके पश्चात् पृष्ठभागसे महिषीका दान करना चाहिये। वस्त्र, आभूषण और दक्षिणाके साथ महिषी ब्राह्मणको देकर विसर्जन करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति महिषीका दान करता है, वह इस लोक तथा परलोकमें वाञ्छित फल प्राप्त करता है।

महाराज! इसी प्रकार मेघी-दान भी सभी पापोंको दूर करनेवाला है। एक सुवर्णमयी मेघीकी प्रतिमा बनाकर उसे उत्तम भूषण, रेशमी वस्त्र, चन्दन, पुष्पमाला आदिसे अलंकृतकर अथवा प्रत्यक्ष मेघीको अलंकृतकर उसका दान करना चाहिये। ग्रहण, विधुवयोग, अयनसंक्रान्ति आदि पवित्र दिनोंमें, दुःस्वप्न देखनेपर, अमावास्यामें अथवा जब भी श्रद्धा हो तब इसका दान करना चाहिये। दानके समय शिव-पार्वती, ब्रह्मा-गायत्री, लक्ष्मी-नारायण तथा रति-कामदेवकी पूजा करनी चाहिये, साथ ही लोकपालों और ग्रहोंकी भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर हवन करना चाहिये। ब्राह्मणकी पूजा करनी चाहिये। पूजनके बाद

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

मेघीकी प्रतिमाको तिलके कलशपर स्थापित कर उसके सामने नमक रखकर विधिपूर्वक पूजन करे और गृहस्थ ब्राह्मणको उसका दान कर दे। इस दानके प्रभावसे निःसंतानको पुत्र और निर्धनको

धन प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति इस दानकी विधिको सुनता है, वह भी अहोरात्रमें किये गये पापोंसे छूट जाता है।

(अध्याय १६२-१६३)

भूमिदानकी महिमा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंको दूर करनेवाले भूमिदानकी विधि बतला रहा हूँ। जो अग्निहोत्री दरिद्र-कुटुम्बी तथा वैदिक ब्राह्मणको दक्षिणासहित भूमिका दान करता है, वह बहुत समयतक ऐश्वर्यका भोग कर अन्तमें दिव्य विमानमें बैठकर विष्णुलोकको जाता है। जबतक उसके द्वारा प्रदत्त भूमिपर अंकुर उपजते रहते हैं, तबतक भूमिदाता विष्णुलोकमें पूजित होता है। भूमिदानके अतिरिक्त और कोई भी दान विशिष्ट नहीं माना गया है। पुरुषर्षभ! अन्य दान कालक्रमसे क्षीण हो जाते हैं, परंतु भूमिदानका पुण्य क्षीण नहीं होता। जो व्यक्ति सस्यसम्पन्न भूमिका दान करता है, वह जबतक भगवान् सूर्य रहेंगे, तबतक सूर्यलोकमें पूजित होता रहेगा। धन-धान्य, सुवर्ण, रत्न, आभूषण आदि सब दान करनेका फल भूमिदान करनेवाला प्राप्त कर लेता है। जिसने भूमिदान किया, उसने मानो समुद्र, नदी, पर्वत, सम-विषम स्थल, गन्ध, रस, क्षीरयुक्त ओषधि, पुष्प, फल, कमल, उत्पल आदि सब कुछ दान कर दिया। दक्षिणासे युक्त अग्निष्टोम आदि यज्ञ करनेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, वह पुण्य भूमिदान करनेसे प्राप्त हो जाता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर पुनः उससे वापस नहीं लेना चाहिये। सस्यसम्पन्न भूमिका दान करनेवाले व्यक्तिके पितर प्रलयपर्यन्त संतुष्ट रहते हैं। अपनी आजीविकाके निमित्त जो पाप पुरुषसे होता है,

वे सारे पाप गोचर्म-मात्र* भूमिके दान करनेसे दूर हो जाते हैं। एक हजार स्वर्णमुद्राके दानसे जो फल बतलाया गया है, वही फल गोचर्म-प्रमाणमें भूमिका दान देनेसे प्राप्त हो जाता है। नरोत्तम! हजारों कपिला गौओंके दान करनेके समान पुण्य गोचर्म-मात्र भूमि देनेसे प्राप्त होता है। सगर आदि अनेक राजाओंने भूमिका उपयोग किया है, परंतु अपने-अपने आधिपत्यमें जिसने भी भूमिका दान किया, सभीको उसका फल प्राप्त हुआ। यमदूत, मृत्युदण्ड, असिपत्रवन, वरुणके घोर पाश और रौरवादि अनेक नरक तथा उनकी दारुण यातनाएँ भूमिदान करनेवालेके समीप नहीं आतीं। चित्रगुप्त, मृत्यु, काल, यम आदि सब भूमिदाताकी पूजा करते हैं। राजन्! भगवान् रुद्र, प्रजापति, इन्द्रादि देवता और असुरगण भूमिका दान करनेवालेकी पूजा करते हैं, स्वयं मैं भी उसकी अतीव प्रसन्नतासे पूजा करता हूँ। जिस भाँति माता अपनी संतानका और गौ जैसे अपने वत्सका दूध आदिके द्वारा पालन करती है, उसी प्रकार रसमयी भूमि भी भूमि देनेवालेकी रक्षा और पालन-पोषण करती है। जिस प्रकार जलके सेचनसे बीज अंकुरित होते हैं, उसी प्रकार भूमिदानसे सब मनोरथ अंकुरित होकर सफल सिद्ध होते हैं। जिस प्रकार सूर्यके उदय होते ही उनके प्रकाशसे अन्धकार दूर हो जाता है, उसी प्रकार भूमिके दानसे सभी प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं।

  • मध्यमस्य मनुष्यस्य व्यासेन परिसंख्या। त्रिशहण्डांश्च गोचर्म दत्त्वा स्वर्गं महीयते ॥ (उत्तरपर्व १६४।२१)

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  • उत्तरपर्व *

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भूमिको दान देकर वापस लेनेवालेको यमदूत वारुणपाशोंसे बाँधकर पूय तथा शोणितसे भरे कुण्डोंमें डालते हैं। अपने द्वारा दी गयी अथवा दूसरे व्यक्तिके द्वारा दी गयी भूमिका जो व्यक्ति अपहरण करता है, वह प्रलयपर्यन्त नरकाग्नियें जलता रहता है। दानमें प्राप्त भूमिके हरण हो जानेपर दुःखित व्यक्तिके रोने-कलपनेसे जितने अश्रुबिन्दु गिरते हैं, उतने हजार वर्षतक भूमिका

हरण करनेवाला नरकमें कष्ट भोगता है। ब्राह्मणको भूमिदान देकर जो व्यक्ति पुनः उस भूमिका हरण करता है, उसे उल्टा लटका कर कुम्भीपाक नरकमें पकाया जाता है। दिव्य हजार वर्षके बाद वह व्यक्ति कुम्भीपाकसे निकलकर इस भूमिपर जन्म लेता है और सात जन्मतक अनेक प्रकारके कष्टोंको भोगता रहता है। इसलिये भूमिका हरण नहीं करना चाहिये। (अध्याय १६४)

सुवर्णरचित भूदानकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! भूमिका दान तो क्षत्रिय ही कर सकते हैं, क्योंकि क्षत्रिय ही भूमिका उपार्जन करनेमें, उसका दान करनेमें और उसके पालन करनेमें समर्थ होते हैं तथा लोगोंसे न तो भूमिका दान हो सकता है, न ही उसका पालन ही हो सकता है। अतः आप कोई ऐसा उपाय बताइये जो भूमिदानके समकक्ष हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! यदि भूमिका दान सम्भव न हो तो सुवर्णके द्वारा भूमण्डलकी आकृति बनाकर और नदी-पर्वतोंको रेखाङ्कित कर उसे ही दान कर देना चाहिये। इससे सम्पूर्ण पृथ्वीके दानका फल प्राप्त हो जाता है। अब मैं इसकी विधि बता रहा हूँ।

सूर्य-चन्द्र-ग्रहण, जन्मनक्षत्र, विषुवयोग, युगादि तिथियों तथा अयनसंक्रान्ति आदि पुण्य समयोंमें पापक्षय और यशकी प्राप्तिके लिये इस दानको करना चाहिये। अन्य भी प्रशस्त समयोंमें जब धन एकत्र हो जाय, इस दानको किया जा सकता है। एक सौ पलसे लेकर कम-से-कम पाँच पलतक अर्थात् अपनी सामर्थ्यके अनुसार सुवर्णकी जम्बुद्वीपके आकारमें पृथ्वीकी प्रतिमा बनानी चाहिये। जिसके मध्यमें मेरु पर्वत तथा यथास्थान अन्य पर्वत अङ्कित हों। वह पृथ्वी सस्यसम्पन्न तथा लोकपालोंसे

रक्षित, ब्रह्मा, शंकर आदि देवताओंसे सुशोभित और सभी रत्न आदि आभूषणोंसे अलंकृत हो। बाईस हाथ लम्बा-चौड़ा तोरणयुक्त चार द्वारोंवाला एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसमें चार हाथकी वेदी बनानी चाहिये। ईशानकोणमें वेदीपर देवताओंका स्थापन करे और अग्निकोणमें कुण्ड बनाये। पताका-तोरण आदिसे मण्डपको सजा ले। अनन्तर पञ्चलोकपाल और नवग्रहोंका षोडशोपचार पूजन करनेके बाद ब्राह्मणोंसे हवन कराना चाहिये। ब्राह्मणवर्ग वेदध्वनि करते हुए तथा मङ्गलघोषपूर्वक भेरी, शङ्खु इत्यादि वाद्योंकी ध्वनिके साथ उस सुवर्णमयी पृथ्वीकी प्रतिमाको मण्डपमें लाकर तिल बिछी हुई वेदीपर स्थापित करे। तत्पश्चात् उसके चारों ओर अठारह प्रकारके अन्न, लवणादि रसों और जलसे भरे आठ माङ्गलिक कलशोंको स्थापित करना चाहिये। उसे रेशमी चँदोवा, विविध प्रकारके फल, मनोहर रेशमी वस्त्र और चन्दनद्वारा अलंकृत करना चाहिये। इस प्रकार अधिवासनपूर्वक पृथ्वीका सारा कार्य सम्पन्न कर स्वयं श्वेत वस्त्र और पुष्पमाला धारणकर, श्वेत वर्णके आभूषणोंसे विभूषित हो अङ्गलिमें पुष्प लेकर प्रदक्षिणा करे तथा पुण्यकाल आनेपर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नमस्ते सर्वदेवानां त्वमेव भवनं यतः। धात्री त्वमसि भूतानामतः पाहि वसुन्धरे॥ वसु धारयसे यस्मात् सर्वसौख्यप्रदायकम्। वसुन्धरा ततो जाता तस्मात् पाहि भयादलम्॥ चतुर्मुखोऽपि नो गच्छेद्यस्मादनं तवाचले। अनन्तायै नमस्तुभ्यं पाहि संसारकर्दमात्॥ त्वमेव लक्ष्मीर्गोविन्दे शिवे गौरीति संस्थिता। गायत्री ब्रह्मणः पार्श्वे ज्योत्स्ना चन्द्रे रवौ प्रभा॥ बुद्धिवर्हस्पतौ ख्याता मेधा मुनिषु संस्थिता। विश्वं व्याप्य स्थिता यस्मात् ततो विश्वम्भरा मता॥ धृतिः क्षितिः क्षमा क्षोणी पृथिवी वसुधा मही। एताभिर्मूर्तिभिः पाहि देवि संसारसागरात्॥

(उत्तरपर्व १६५।२१—२६)

‘वसुन्धरे! चूँकि तुम्हीं सभी देवताओं और सम्पूर्ण जीवनिकायकी भवनभूता तथा धात्री हो, अतः मेरी रक्षा करो। तुम्हें नमस्कार है। चूँकि तुम सभी प्रकारके सुखप्रदाता वसुओंको धारण करती हो, इसीसे तुम्हारा नाम वसुन्धरा है, तुम संसार-भयसे मेरी रक्षा करो। अचले! चूँकि ब्रह्मा भी तुम्हारे अन्तको नहीं प्राप्त कर सकते, इसलिये

तुम अनन्ता हो, तुम्हें प्रणाम है। तुम इस संसाररूप कीचड़से मेरी रक्षा करो। तुम्हीं विष्णुमें लक्ष्मी, शिवमें गौरी, ब्रह्माके समीप गायत्री, चन्द्रमामें ज्योत्स्ना, रवियें प्रभा, बृहस्पतिमें बुद्धि और मुनियोंमें मेधारूपमें स्थित हो। चूँकि तुम समस्त विश्वमें व्याप्त हो, इसलिये विश्वम्भरा कही जाती हो। धृति, क्षिति, क्षमा, क्षोणी, पृथिवी, वसुधा तथा मही—ये तुम्हारी मूर्तियाँ हैं। देवि! तुम अपनी इन मूर्तियोंद्वारा इस संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।’

इस प्रकार उच्चारणकर पृथ्वीकी मूर्ति ब्राह्मणोंको निवेदित कर दे। उस पृथ्वीका आधा अथवा चौथाई भाग गुरुको समर्पित करे। जो मनुष्य पुण्यकाल आनेपर सुवर्णनिर्मित कल्याणमयी पृथ्वीकी सुवर्णमूर्तिका इस विधिके साथ दान करता है, वह वैष्णव पदको प्राप्त होता है तथा शुद्ध घंटिकाओं (घुँघरू)—से सुशोभित एवं सूर्यके समान तेजस्वी विमानद्वारा वैकुण्ठमें जाकर तीन कल्पपर्यन्त निवास करता है और पुण्य क्षीण होनेपर इस संसारमें आकर वह धार्मिक चक्रवर्ती राजा होता है।

(अध्याय १६५)

हलपंक्तिदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सर्वपापनाशक तथा सर्वसौख्यप्रद हलपंक्ति-दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे सभी प्रकारके दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। एक हलके लिये चार बैलोंकी आवश्यकता होती है और दस हलोंकी एक पंक्ति होती है। साखूकी लकड़ीसे दस हल बनवाकर उन्हें सुवर्ण-पट्ट और रलोंसे मढ़कर अलंकृत कर ले। वस्त्र, स्वर्ण, पुष्प तथा चन्दन आदिसे मण्डित तरुण, सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट, उत्तम वृष उन हलोंमें जोतने चाहिये। बैलोंके कन्धोंपर जुआ भी रखे, साथमें

कील लगा हुआ अंकुश आदि उपकरण भी रहने चाहिये। पर्वकालमें हलपंक्तिके साथ सस्यसम्पन्न बड़ा ग्राम, छोटा ग्राम अथवा सौ निवर्तन (सौ बीघा) अथवा पचास निवर्तन भूमि देनी चाहिये। इसका दान विशेषरूपसे कार्तिकी, वैशाखी, अयनसंक्रान्ति, जन्मनक्षत्र, ग्रहण, विषुवयोगमें करे। वेदवेत्ता, सदाचारी, सम्पूर्णज्ञ अलंकृत दस ब्राह्मणोंको निमन्त्रित करे। दस हाथ प्रमाणवाला एक मण्डप बनाकर उसमें पूर्व दिशामें एक हाथ प्रमाणवाले दो अथवा एक कुण्ड बनावे। निमन्त्रित ब्राह्मणोंसे पलाशकी समिधा, घी, काला

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तिल और खीरसे व्याहितियों, पर्जन्यसूक्त, आदित्यसूक्त और रुद्रमन्त्रोंसे हवन कराये। तदनन्तर यजमान स्नानकर शुक्ल वस्त्र आदिसे अलंकृत हो सप्तधान्यके ऊपर हलपंक्तिको स्थापित करे और उसमें बैलोंको जोते। उस समय विविध प्रकारके वाद्य-यन्त्रोंको बजाना चाहिये और ब्राह्मणवर्ग वेद-पाठ करें। यजमान दानके समय पुष्पाञ्जलि ग्रहण कर इन मन्त्रोंको पढ़े—

यस्माद् देवगणाः सर्वे हले तिष्ठन्ति सर्वदा।

वृषस्कन्धे संनिहितास्तस्माद्भक्तिः शिवेऽस्तु मे ॥

यस्माच्च भूमिदानस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।

दानान्यन्यानि मे भक्तिर्धर्मं चास्तु दृढा सदा ॥

(उत्तरपर्व १६६। १६-१७)

‘चूँकि बैलके कन्धेपर स्थित हलमें सभी देवगण सदा स्थित रहते हैं, अतः भगवान् शंकरमें मेरी भक्ति हो। अन्य समस्त दान भूमिदानकी सोलहवीं कलाके भी तुल्य नहीं हैं, अतः धर्ममें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो।’ इसके बाद भूमि और हल उन ब्राह्मणोंको

दे दे। इस प्रकार जो व्यक्ति हलपंक्तिका दान करता है, वह अपने इक्कीस कुलोंसहित स्वर्ग जाता है। सात जन्मतक उस व्यक्तिको निर्धनता, दुर्भाग्य, व्याधि आदि दुःख नहीं भोगने पड़ते और वह पृथ्वीका अधिपति होता है। युधिष्ठिर! दान करते समय जो भक्तिपूर्वक इस दानकर्मका दर्शन करता है, वह भी जन्मभर किये गये पापोंसे मुक्त हो जाता है। इस दानको महाराज दिलीप, ययाति, शिबि, निमि तथा भरत आदि सभी श्रेष्ठ राजर्षियोंने किया, जिसके प्रभावसे वे राजा आज भी स्वर्गका सुख भोग रहे हैं। इसलिये भक्तिपूर्वक सभी स्त्री-पुरुषोंको यह दान करना चाहिये। यदि दस हलपंक्तिका दान करनेमें समर्थ न हो तो पाँच, चार अथवा एक ही हलका दान करे। हलपंक्तिका दान करनेवाले हलसे जितनी मिट्टी उठती है और बैलोंके शरीरमें जितने भी रोम होते हैं, उतने ही हजार वर्षतक शिवलोकमें निवासकर अन्तमें पृथ्वीपर श्रेष्ठ राजा होते हैं। (अध्याय १६६)

आपाकदानके प्रसंगमें राजा हव्यवाहनकी कथा

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! कृपाकर आप ऐसा कोई दान बतायें, जिससे मनुष्य धन, पुत्र और सौभाग्यसे सम्पन्न हो सके।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं इस सम्बन्धमें एक इतिहास कह रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनिये। किसी समय चन्द्रवंशमें हव्यवाहन नामक एक राजा हुआ था। उसके राज्यमें न कोई उपद्रव होता था और न कोई उसका शत्रु ही था। सभी नीरोग रहते थे। वह बड़ा प्रतापी, स्वस्थ, बली और शत्रुओंपर विजय प्राप्त करनेवाला था। परंतु पूर्वजन्मके अशुभ कर्मके प्रभावसे उसके पास कोई ऐसा मन्त्री नहीं था जो राज्यको सुचाररूपसे चला सके तथा उसे कोई पुत्र, मित्र या सहायक

बन्धु-बान्धव भी न था। उसे कभी समयसे भोजन आदि भी नहीं मिल पाता था। इस कारण वह राजा सदा चिन्तित रहता था।

एक बार उसके यहाँ पिप्पलादमुनि पधारे। राजाकी पटरानी शुभावतीने मुनिकी श्रद्धापूर्वक पाछ, अर्घ्य आदिसे पूजा की और आसनपर उन्हें बैठाकर निवेदन किया—‘मुनीश्वर! यह निष्कण्टक राज्य तो हमें मिला है, परंतु मन्त्री, मित्र, पुत्र आदि हमें क्यों नहीं प्राप्त हुए। इसका कारण बतानेकी कृपा करें।’ रानीका वचन सुनकर पिप्पलाद-मुनिने कहा—‘देवि! पूर्वजन्ममें किये गये कर्मोंके फल ही अगले जन्ममें प्राप्त होते हैं, यह कर्मभूमि है, अतः तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। जिस

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पदार्थका पूर्वजन्ममें मनुष्यने सम्पादन नहीं किया है, उसे शत्रु, मित्र, बान्धव, राजा आदि कोई भी नहीं दे सकते। पूर्वजन्ममें तुमने राज्यका दान किया था, वह तुम्हें प्राप्त हो गया, परंतु तुमलोगोंने मित्र, भृत्य आदिसे कोई सम्बन्ध नहीं रखा, अतः इस जन्ममें ये सब कैसे प्राप्त होंगे ?'

इसपर रानी शुभावती बोली—महाराज ! पूर्वजन्ममें जो हुआ वह तो बीत गया, अब इस समय आप ऐसा कोई व्रत, दान, उपवास, मन्त्र अथवा सिद्धयोग बतानेकी कृपा करें, जिससे मुझे पुत्र, धन, मित्र, भृत्य इत्यादि प्राप्त हो सकें। रानीका वचन सुनकर पिप्पलादमुनि बोले—'भद्रे ! एक आपाक नामका महादान है, जो सभी सम्पत्तियोंका प्रदायक है। श्रद्धापूर्वक कोई भी आपाकका दान करता है तो उसे महान् लाभ होता है। इसलिये तुम श्रद्धासे आपाकदान करो।' मुनिके कथनानुसार रानी शुभावतीने आपाकदान किया। फलतः उसे पुत्र, मित्र, धन और भृत्य प्राप्त हो गये।

भगवान् श्रीकृष्णने पुनः कहा—महाराज ! अब मैं उस आपाकदानकी विधि बता रहा हूँ, आप श्रद्धापूर्वक सुनें। बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि ग्रह और ताराबलका विचार कर शुभ मुहूर्तमें अगर, चन्दन, धूप, पुष्प, वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्य आदिसे भार्गव (कुम्हार)-का ऐसा सम्मान करे, जिससे वह संतुष्ट हो और उससे निवेदन करे कि महाभाग ! आप विश्वकर्मास्वरूप हैं। आप मेरे लिये सुन्दर छोटे-बड़े मिट्टीके घड़े, स्थाली, कसौरे, कलश आदि पात्रोंका निर्माण करें। भार्गव भी उन पात्रोंको बनाये। तदनन्तर विधिपूर्वक एक आँवों—भट्टी लगाये। अनन्तर उन एक हजार मिट्टीके पात्रोंको आँवेंमें स्थापित कर सार्यकालके समय उसमें अग्नि प्रज्वलित करे

और रात्रिको जागरणकर वाद्य, गीत, नृत्य आदिकी व्यवस्था कर उत्सव मनाये। सुप्रभात होते ही यजमान आँवोंकी अग्नि को शान्तकर पात्रोंको बाहर निकाल ले। अनन्तर स्नानकर श्वेत वस्त्र पहनकर उनमेंसे सोलह पात्रोंको सामने स्थापित करे। रक्त वस्त्रसे उन्हें आच्छादितकर पुष्पमालाओंसे उनका अर्चन करे और ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन आदि कराकर भार्गवका भी पूजन करे। ये पात्र माणिक्य, सोने, चाँदी अथवा मिट्टीतकके हो सकते हैं। सौभाग्यवती स्त्रियोंकी पूजा कर भाण्डोंकी प्रदक्षिणा करनी चाहिये और इन मन्त्रोंको पढ़ते हुए उन पात्रोंका दान करना चाहिये—

आपाक ब्रह्मरूपोऽसि भाण्डानीमानी जन्तवः । प्रदानात् ते प्रजापुष्टिः स्वर्गश्चास्तु ममाक्षयः ॥ भाण्डरूपाणि यान्यत्र कल्पितानि मया किल । भूत्वा सत्यात्ररूपाणि उपतिष्ठन्तु तानि मे ॥ (उत्तरपर्व १६७।३२-३३)

'आपाक (आँवों) ! आप ब्रह्मरूप हैं और ये सभी भाण्ड प्राणीरूप हैं। आपके दान करनेसे मुझे प्रजाओंसे पुष्टि प्राप्त हो, अक्षय स्वर्ग प्राप्त हो। मैंने जितने पात्र निर्माण कराये हैं, ये सभी सत्यात्रके रूपमें मेरे समक्ष प्रस्तुत रहें।'

जिसकी इच्छा जिस पात्रको लेनेकी हो उसे वह स्वयं ही ले ले, रोके नहीं। इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री इस आपाकदानको करते हैं, उससे तीन जन्मतक विश्वकर्मा संतुष्ट रहते हैं और पुत्र, मित्र, भृत्य, घर आदि सभी पदार्थ मिल जाते हैं। जो स्त्री इस दानको भक्तिपूर्वक करती है, वह सौभाग्यशाली पतिके साथ पुत्र-पौत्रादि सभी पदार्थोंको प्राप्त कर लेती है और अन्तमें अपने पतिसहित स्वर्गको जाती है। नरेश्वर ! यह आपाकदान भूमिदानके समान ही है।

(अध्याय १६७)

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  • उत्तरपर्व *

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गृहदान-विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा— भगवन्! आप सभी शास्त्रोंके मर्मज्ञ हैं, अतः आप गृहदानकी विधि और महिमा बतलानेकी कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— महाराज! गार्हस्थ्यधर्मसे बढ़कर कोई धर्म नहीं और असत्यसे बढ़कर कोई पाप नहीं है। ब्राह्मणसे बढ़कर कोई पूज्य नहीं और गृहदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। धन, धान्य, स्त्री, पुत्र, हाथी, घोड़ा, गौ, भृत्य आदिसे परिपूर्ण घर स्वर्गसे भी अधिक सुख देनेवाला है। जिस प्रकार सभी प्राणी माताके आश्रयसे जीवित रहते हैं, उसी प्रकार सभी आश्रम भी गृहस्थ-आश्रमपर ही आश्रुत हैं। अपने घर रात्रिको पैर फैलाकर सोनेमें जो सुख है, वह सुख स्वर्गमें भी नहीं। अपने घरमें शाकका भोजन करना भी उत्तम सुख है, इसलिये महाराज! सुन्दर घर बनवाकर ब्राह्मणको देना चाहिये। जो व्यक्ति शैव, वैष्णव, योगी, दीन, अनाथ, अभ्यागत आदिके लिये गृह, धर्मशाला बनाता है, उस व्यक्तिको सभी व्रत और सभी प्रकारके दान करनेका फल प्राप्त हो जाता है। पक्के ईटसे सुदृढ़, ऊँचा, शुध्रवर्ण, जाली, झरोखा, स्तम्भ, कपाट आदिसे युक्त, जलाशय और पुष्प-वाटिकासे भूषित, उत्तम आँगनसे सुशोभित सुन्दर घर बनाना चाहिये। गृह कछुएकी पीठके समान ऊँचा एवं बरामदोंसे सुसज्जित होना चाहिये। उसे कई मंजिलों तथा गलियों आदिसे समन्वित होना चाहिये। लोहा, सोना, चाँदी, ताँबा, लकड़ी, मृत्तिका आदिके पात्र, वस्त्र, चर्म, वल्कल, तृण, पाषाण-पात्र, रत्न, आभूषण, गाय, भैंस, घोड़ा, बैल, सभी प्रकारके धान्य, घी, तेल, गुड़, तिल, चावल, ईख, मूँग, गेहूँ, सरसों, मटर, अरहर, चना, उड़द, नमक, खजूर, द्राक्षा, जीरा, धनिया, चूल्हा, चक्की, छलनी,

ऊखल, मूसल, सूप, हाँड़ी, मथानी, झाडू तथा जलकुम्भ आदि ये सब गृहस्थके उपकरण हैं, इनको घरमें स्थापित करनेके बाद शुभ मुहूर्तमें कुलीन एवं शीलसम्पन्न, वेदशास्त्रके जाननेवाले, गृहस्थधर्मका पालन करनेवाले, जितेन्द्रिय सपत्नीक ब्राह्मणोंको बुलाकर वस्त्र, गन्ध, आभूषण, पुष्पमाला आदिसे उनका पूजन कर शान्तिकर्मके लिये उनको नियुक्त करना चाहिये। घरके आँगनमें एक मेखलासहित कुण्डका निर्माण करवाना चाहिये। ब्राह्मणोंद्वारा तुष्टि-पुष्टि प्रदान करनेवाला ग्रहयाग करे। ब्राह्मण रक्षोघ्नसूक्त पढ़नेके बाद वास्तु-पूजा कर सभी दिशाओंमें भूतबलि दे। इसके बाद यजमान पुण्य पवित्र घोषके साथ ब्राह्मणोंको दानके निमित्त बनाये गये उन घरोंमें प्रवेश कराये और वहाँ शय्याओंपर उन सपत्नीक ब्राह्मणोंको बिठलाये। जिस घरको पूर्वमें ही जिस ब्राह्मणके लिये नियत किया गया है उसे 'इदं गृहं गृहाण' 'इस गृहको ग्रहण करें' ऐसा कहकर प्रदान करे। ब्राह्मण 'स्वस्ति' कहें और 'कोऽदात्' (यजु० ७।४८) इस मन्त्रका पाठ करें। यदि सामर्थ्य हो तो एक-एक घर ब्राह्मणोंको दे अथवा एक ही घर बनवाकर एक सत्पात्र ब्राह्मणको देना चाहिये। राजन्! शीत, वायु और धूपसे रक्षा करनेवाली तृणमयी कुटी ब्राह्मणोंको देनेपर भी जब सभी कामनाओंकी पूर्ति हो जाती है और स्वर्ग प्राप्त होता है तो फिर उत्तम घर दान देनेके फलका वर्णन कहँतक किया जा सकता है! गाय, भूमि, सुवर्ण आदिके दान और अनेक प्रकारके यम-नियमोंका पालन गृहदानके सोलहवें भागकी भी बराबरी नहीं कर सकते। जो व्यक्ति सभी सामग्रियोंसहित सुदृढ़ और सुन्दर घर ब्राह्मणको दान करता है, वह शिवलोकको प्राप्त करता है। (अध्याय १६८)

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५८८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

अन्नदानकी महिमाके प्रसंगमें राजा श्वेत और एक वैश्यकी कथा

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! किसी समय मुनियोंने अन्नदानका जो माहात्म्य कहा था, उसे मैं कह रहा हूँ, आप एकाग्रचित्त होकर सुनें। अनघ! आप अन्नदान करें, जिससे तत्काल संतुष्टि प्राप्त होती है। वनमें श्रीरामचन्द्रजीने दुःखी होकर लक्ष्मणसे कहा था—‘लक्ष्मण! सम्पूर्ण पृथ्वी अन्नसे परिपूर्ण है, फिर भी हमलोगोंको अन्न नहीं मिल रहा है, इससे यही जान पड़ता है कि हमलोगोंने पूर्वजन्ममें ब्राह्मणोंको कभी अन्नका भोजन नहीं कराया’।* मनुष्य जिस कर्मरूपी बीजको बोता है, जैसा कर्म करता है, वह उसीका फल पाता है। संसारमें यह ठीक ही कहा जाता है कि बिना दिये कुछ नहीं मिलता। भोजनयोग्य जिस अन्नका दान किया जाता है, वह अन्नदान परम श्रेयस्कर है। भारत! भोज्य पदार्थोंमें बहुतसे पदार्थ हैं, किंतु अन्नका दान सब दानोंसे श्रेष्ठ दान है। सत्यसे बढ़कर कोई पुण्य नहीं, संतोषसे बड़ा कोई सुख नहीं और अन्नदानसे बढ़कर कोई दान नहीं है। ज्ञान, अनुलेपन और वस्त्रालंकारोंसे मनुष्योंको वैसी तृप्ति नहीं होती, जैसी भोजनसे होती है। इस विषयमें एक इतिहास है—

राजन्! बहुत पहले एक श्वेत नामके चक्रवर्ती राजा हुए हैं, उन्होंने अनेक यज्ञ किये और अनेक युद्धोंमें विजय प्राप्त की। अनेक प्रकारका दान दिये और धर्मपूर्वक राज्यपर शासन किया। राजाने अनेक प्रकारके उत्तम भोग भोगकर अन्तमें राज्यका परित्याग कर वनमें जाकर तपस्या की। अन्तमें वे दिव्य विमानमें आरूढ़ होकर स्वर्ग गये। वहाँ विद्याधर, किंनर आदिके साथ विहार करने लगे। अप्सराएँ उनकी सेवामें रहती थीं। गन्धर्व

उन्हें गीत सुनाकर रिझाते, इन्द्र भी उनका बड़ा सम्मान करते थे। राजाको दिव्य वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदि पहननेको तो मिलता था, परंतु भोजनके समय विमानमें बैठकर भूलोकमें आकर अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खाना पड़ता था। प्रतिदिन मांसका भोजन करनेके बाद भी पूर्वजन्मके कर्मके कारण उस पूर्वशरीरका मांस घटता नहीं था। इस प्रकार प्रतिदिन मांस-भक्षणसे व्याकुल होकर राजाने ब्रह्माजीसे कहा—‘ब्रह्मन्! आपके अनुग्रहसे मुझे स्वर्गका सुख प्राप्त हुआ है, सभी देवता मेरा आदर करते हैं। सभी सामग्री उपभोगके लिये प्राप्त होती रहती है, परंतु सभी भोगोंके रहते हुए भी यह पापिनी क्षुधा कभी शान्त नहीं होती, मुझे सदा सताती रहती है। इसी कारण मुझे अपने पूर्वशरीरके मांसको प्रतिदिन खानेके लिये भूलोकमें जाना पड़ता है और इसमें मुझे बड़ी घृणा होती है। मैंने कौन-सा ऐसा पाप किया है, जिससे मुझे उत्तम भोजन नहीं मिलता। आप कृपाकर ऐसा कोई उपाय बतायें, जिससे मेरा यह दुःख दूर हो जाय।’

ब्रह्माजी बोले—राजन्! आपने अनेक प्रकारके दान दिये हैं, बहुत-से यज्ञ किये हैं और गुरुजनोंको भी संतुष्ट किया है, परंतु ब्राह्मणोंको स्वादिष्ट उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन नहीं कराया। अन्नदान न करनेसे ही आज आपकी यह दशा हो रही है। अन्नसे बढ़कर कोई संजीवनी नहीं। अन्नको ही अमृत जानना चाहिये। इसलिये अब आप पृथ्वीपर जाकर वेदशास्त्र जाननेवाले कुलीन ब्राह्मणोंको भोजन करायें। उससे आपका यह दुःख दूर हो जायगा।

  • पृथिव्यामन्नपूर्णायां वयमन्नस्य काङ्क्षिणः। सीमिन्ने नूनमस्माभिर्न ब्राह्मणमुखे हृतम् ॥ (उत्तरपर्व १६९।४)

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  • उत्तरपर्व *

५८९

ब्रह्माजीका वचन सुनकर राजा श्वेतने पृथ्वीपर आकर महर्षि अगस्त्यजीको परमभक्तिसे भोजन कराया और अपने गलेकी दिव्य एकावली (माला*)-को दक्षिणाके रूपमें समर्पित किया। अगस्त्यजीको भोजन कराते ही राजा श्वेत संतुष्ट हो गये और सभी देवता वहाँ आकर अतीव आदरपूर्वक राजाको विमानमें बैठाकर स्वर्गलोक चले गये। श्रीरामचन्द्रजीने जब रावणका वध कर दिया, तब वह एकावली अगस्त्यजीने श्रीरामचन्द्रजीको दे दी। यह अन्नदानका ही माहात्म्य है।

मेरा वचन सत्य है कि प्राणियोंके लिये अन्नसे बढ़कर कोई उत्तम पदार्थ नहीं है। अन्न जीवोंका प्राण है। अन्न ही तेज, बल और सुख है। इसलिये अन्नदाता प्राणदाता है। भूखा व्यक्ति जिस दूसरे व्यक्तिके घर आशा करके जाता है और वहाँसे संतुष्ट होकर आता है तो भोजन देनेवाला व्यक्ति धन्य हो जाता है, उसके समान पुण्यकर्मा और कौन होगा? दीक्षा-प्राप्त स्नातक, कपिला गौ, याज्ञिक, राजा, भिक्षु तथा महोदधि—ये सब दर्शनमात्रसे पवित्र कर देते हैं। इसलिये घरपर आये भूखे व्यक्तिको जो भोजन न दे सके उसका गृहस्थाश्रम व्यर्थ है। अन्नके बिना कोई अधिक समयतक जीवित नहीं रह सकता। मनुष्योंका दुष्कृत अर्थात् किया हुआ दूषित कर्म अन्नमें प्रविष्ट हो जाता है, इसलिये जो ऐसे व्यक्तिका अन्न खाता है, वह अन्न देनेवालेके दुष्कृतका ही भक्षण करता है। इसके विपरीत अमृतमय पवित्र परात्रका भोजन करनेवाले व्यक्तिका एक महीनेका किया हुआ पुण्य अन्नदाताको प्राप्त हो जाता है। जिस अन्नके दानका इतना महत्त्व है, उसका दान क्यों नहीं करते? (अर्थात् थोड़ा-बहुत अवश्य करो, करना चाहिये।) जो व्यक्ति ब्राह्मण, अतिथि आदिको भोजन आदि कराने तथा

भिक्षा देनेके पूर्व ही स्वयं भोजन कर लेता है, वह केवल पाप ही भक्षण करता है। जिस व्यक्तिने दस हजार या एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराया है, उसने मानो ब्रह्मलोकमें अपना स्थान बना लिया।

प्राचीन कालमें वाराणसीमें देवता और ब्राह्मणोंका पूजक धनेश्वर नामका एक वैश्य रहता था। उसकी दूकानमें एक स्थानपर एक सर्पिणीने अण्डा दिया और वह उस अण्डेको छोड़कर कहीं अन्यत्र चली गयी। वैश्यने अण्डेको देखा और उसपर दयाकर उसकी रक्षा करने लगा। कुछ समय बाद अण्डेको फोड़कर कृष्ण सर्पका बच्चा बाहर निकला। उस सर्पके बच्चेको वैश्य प्रतिदिन दूध पिलाता था। वह सर्प भी वैश्यके पैरोंपर लोटता, उसके अङ्गोंको चाटता और पूरे घरमें निर्भय हो घूमता रहता। वैश्य भी भलीभाँति सर्पकी रक्षा करता। थोड़े ही समयमें वह भयंकर सर्प हो गया। किसी समयकी बात है, वह धनेश्वर गङ्गा-स्नान करनेके लिये गया था और उसका पुत्र दूकानपर बैठकर सामान बेच रहा था। उसी समय वह सर्प उस लड़केके पैरोंके बीचसे निकला, जिससे वह लड़का डर गया और उसने सर्पको ढंडेसे मारा। चोट लगते ही सर्प उछलकर वैश्यपुत्रके सिरपर बैठ गया और क्रोधित होकर कहने लगा—‘मूर्ख! मैं तुम्हारे पिताकी शरणमें हूँ और तुम्हारे पिताने ही मेरा पालन-पोषण किया है, इसलिये मैं तुम्हारा भी भला ही चाहता था, परंतु तुमने मुझे अकारण ही प्रताड़ित किया है, इसलिये अब मैं तुम्हें जीवित नहीं छोड़ूँगा।’ सर्पके इस प्रकार कहनेके साथ ही वैश्यके घरमें दुःखी हो सब रोने लगे।

उसी समय अच्युत, गोविन्द, अनन्त आदि भगवान्के पवित्र नामोंका उच्चारण करता हुआ स्नानकर वह धनेश्वर भी घर आ गया। पुत्रकी

  • महाराज श्वेतकी कथा कई स्थानोंपर है, किंतु वाल्मीकीय रामायण उत्तरकाण्डके ७७ तथा ७८ सर्गोंमें बड़ी रम्य शैली और मधुर पदावलीयोंमें वर्णित हुई है। वहाँ एकावली मालाकी जगह केयर आदि दिव्य आभूषणकी बात निर्दिष्ट है।

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५९०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

वैसी स्थिति देखकर उसने सर्पसे कहा—‘पत्रग ! तुम मेरे पुत्रके मस्तकपर फण फैलाये क्यों बैठे हो ? यह ठीक ही कहा गया है कि मूर्ख मित्र और हीन जातिमें उत्पन्न प्राणीके साथ सम्बन्ध करना अपने हाथसे जलता हुआ अंगारा उठाना है१ ।’ वणिककी बात सुनकर साँपने कहा—‘धनेश्वर ! तुम्हारे पुत्रने मुझे निरपराध ही मारा है, इसलिये तुम्हारे सामने ही मैं इसका प्राण ले रहा हूँ, जिससे अन्य कोई भी व्यक्ति ऐसा काम न करे ।’ यह सुनकर धनेश्वरने कहा—‘सर्प ! जो उपकार, भक्ति तथा स्नेह आदिको भूलकर अपने रास्तेसे भटक जाय अर्थात् अपने कर्तव्यमार्गको छोड़ दे, उसे कौन रोक सकता है, परंतु क्षणमात्र तुम इस बालकको छोड़ दो, दंश न करो, जिससे मैं ब्राह्मणोंको भोजन कराकर अपना और्ध्वदैहिक कर्म अपने हाथसे कर सकूँ, क्योंकि बादमें मेरे पास कोई पुत्र नहीं रहेगा ।’ सर्पने इस बातको स्वीकार कर लिया ।

तदनन्तर वैश्यने वेदवेत्ता और जितेन्द्रिय एक हजार ब्राह्मणों तथा सन्यासियों आदिको घी, पायससहित मधुर स्वादिष्ट भोजन कराया । भोजनसे संतुष्ट हो ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा—

वणिष्पुत्र चिरं जीव नश्यन्तु तव शत्रवः ।

अभीष्टफलसंसिद्धिरस्तु ते ब्राह्मणाज्ञया ॥

(उत्तरपर्व १६९।६३)

‘वणिष्पुत्र ! ब्राह्मणोंकी आज्ञासे तुम चिरंजीवी होओ, तुम्हारे सभी शत्रु नष्ट हो जायँ और तुम्हारा मनोरथ सिद्ध हो जाय ।’

ऐसा कहकर ब्राह्मणोंने अक्षत और पुष्प वैश्यपुत्रके

मस्तकपर छोड़े । ब्राह्मणोंके वागवज्रसे ताड़ित होकर वह सर्प मस्तकसे गिरा और मर गया । सर्पको मरा हुआ देखकर धनेश्वरको बड़ा दुःख हुआ और वह सोचने लगा कि मैंने इस सर्पको पुत्रकी भाँति पाला था और आज यह मेरे ही दोषसे मर गया । यह बड़ा ही अनुचित हुआ । उपकार करनेवालेमें जो साधुता रखता है, उसकी साधुतामें कौन-सी विशेषता रहती है ? अर्थात् वह प्रशंसाके योग्य नहीं है, किंतु जो अपकारियोंमें साधुता रखता है, उसकी साधुता ही सराहनीय है२ ।

इस प्रकार अनेक प्रकारसे पश्चात्ताप करते हुए दुःखी होकर वैश्यने न तो उस दिन भोजन किया, न ही रात्रिमें सो सका । प्रातःकाल होते ही गङ्गामें स्नान कर देवता-पितरोंका पूजन-तर्पण आदि कर घर आया और पुनः एक हजार ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके उत्तम व्यञ्जनोंका भोजन कराकर संतुष्ट किया । इसपर ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर कहा—‘धनेश्वर ! हमलोग तुमसे बहुत ही संतुष्ट हैं, इसलिये तुम वर माँगो । यह सुनकर उसने वर माँगा कि ‘यह मृत सर्प पुनः जीवित हो जाय ।’ वैश्यके यह कहनेपर ब्राह्मणोंने अभिमन्त्रित जल सर्पके ऊपर छिड़का । जलके छींटे पड़ते ही वह सर्प जीवित हो गया । यह देखकर धनेश्वर बड़ा ही प्रसन्न हुआ और नगरके लोग धनेश्वरकी प्रशंसा करने लगे ।’

महाराज ! यह सहस्र-ब्राह्मण-भोजन (अन्नदान)-का संक्षेपसे मैंने माहात्म्य वर्णन किया । जो व्यक्ति ब्राह्मणोंको और अभ्यागर्तोंको अन्न देता है, वह बहुत दिनतक संसार-सुखको भोगकर विष्णुलोकको प्राप्त कर लेता है । (अध्याय १६९)

१-मूर्ख मित्रं सम्बन्धं हीनजातिजनों हि यः । यः करोत्यनुधोऽङ्गारान् स स्वहस्तेन कर्षति ॥ (उत्तरपर्व १६९।५६)

२-उपकारिषु यः साधुः साधुत्वे तस्य को गुणः । अपकारिषु यः साधुः स साधुः सद्धिरिव्यते ॥ (उत्तरपर्व १६९।६७)

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  • उत्तरपर्व *

५११

स्थालीदानकी महिमामें द्रौपदीके पूर्वजन्मकी कथा

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! आपके द्वारा अन्नदानके माहात्म्यको सुनकर मुझे भी एक बात स्मरण आ रही है। जिसे मैंने अपनी आँखोंसे देखा है, उसे मैं आपको सुनाता हूँ। जिस समय दुर्योधन, कर्ण, शकुनि आदिने द्रुतक्रीडामें छलसे हमारे राज्यको छीन लिया और हमलोग द्रौपदीके साथ वल्लभ वस्त्र तथा मृगचर्म धारण कर वनको जा रहे थे, उस समय नगरके लोग और सदाचारी ब्राह्मण स्नेहसे हमारे साथ चलने लगे। उन्हें देखकर मुझे बड़ा दुःख हुआ और मैं यह सोचने लगा कि जो व्यक्ति ब्राह्मण, मित्र, भृत्य आदिका पोषण करता है, उसीका जीवन सफल है। अपना पेट तो मनुष्य, जीव, जन्तु, पशु, पक्षी सभी भर लेते हैं। अभ्यागत सुहृद्वर्ग और कुटुम्बको छोड़कर जो व्यक्ति केवल अपना ही पेट भरता है, वह जीवित होते हुए भी मेरे हुएके समान है। यही सोचकर मैंने उन ब्राह्मणोंसे कहा कि आपलोग त्रिकालज्ञ और ज्ञान-विज्ञानमें पारंगत हैं और मेरे स्नेहके वशीभूत होकर ही आये हैं। अब कोई ऐसा उपाय बतानेकी कृपा कीजिये जिससे कि भाई, बन्धु, मित्र, भृत्यसहित आपलोगोंके लिये भी भोजन आदिका प्रबन्ध हो सके, क्योंकि इस निर्जन वनमें हमें बारह वर्ष बिताना है। मेरे इस प्रकारके वचनको सुनकर मैत्रेयमुनिने मुझसे कहा कि कौन्येय! एक प्राचीन वृत्तान्त मैंने दिव्य दृष्टिसे देखा है, जिसे मैं कह रहा हूँ, आप ध्यानसे सुनें।

किसी समय एक तपोवनमें कोई दुर्भगा, दरिद्रा, ब्रह्मचारिणी ब्राह्मणी निवास कर रही थी। वह इस दशामें भी प्रतिदिन ब्राह्मणोंका पूजन

किया करती। उसकी शम-दमसे परिपूर्ण श्रद्धाको देखकर एक दिन ब्राह्मणोंने प्रसन्न होकर उससे कहा—‘सुब्रते! हमलोग तुमसे बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।’ तब ब्राह्मणीने कहा—‘महाराज! किसी व्रत अथवा दानकी ऐसी विधि बतानेकी कृपा कीजिये, जिसके करनेसे मैं पतिकी प्रिय, पुत्रवती, सौभाग्यवती, धनाढ्य तथा लोकमें प्रशंसाके योग्य हो जाऊँ।’

ब्राह्मणीका यह वचन सुनकर वसिष्ठजीने कहा कि बाह्मणि! मैं तुम्हें सभी मनोरथोंको पूर्ण करनेवाले स्थालीदानकी विधि बता रहा हूँ। पाँच सौ पल, दो सौ पचास पल अथवा एक सौ पचीस पल ताँबेका पात्र बनाये या सामर्थ्य न हो तो मिट्टीकी उत्तम हाँड़ी बना ले। वह गहरी और सुदृढ़ हो। उसे मूँग तथा चावलसे बने पदार्थसे भरकर चन्दनसे चर्चित कर एक मण्डलके मध्यमें स्थापित कर ले तथा उसके समीप सब प्रकार शाक, जलपात्र, घीका पात्र रखे और पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र आदिसे उसका पूजन करे और इस प्रकार उस पात्रकी प्रार्थना करे—

ज्वलज्वलनपाश्र्वस्थैस्तण्डुलैः सजलैरपि। न भवेद्भोज्यसंसिद्धिर्भूतानां पिठरीं विना॥ त्वंसिद्धिः सिद्धिकामानांत्वंपुष्टिः पुष्टिमिच्छताम्। अतस्त्वां प्रणामाम्याशु सत्यं कुरु वचो मम॥ ज्ञातिबन्धुसुहृद्वर्गं विप्रे प्रेय्यजने तथा। अभुक्तवति नाश्रीयात् तथा भव वरप्रदा॥

(उत्तरपर्व १७०। २२—२४)

इसका भाव यह है कि समीप ही प्रज्वलित अग्नि हो, चावल हो तथा जल भी हो, किंतु यदि स्थाली (बटलौड़) न हो तो भोजन नहीं पकाया

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५९२

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जा सकता। स्थाली! तुम सिद्धि चाहनेवालोंके लिये सिद्धि तथा पुष्टि चाहनेवालोंके लिये पुष्टिस्वरूप हो। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। मेरी बातको सत्य करो। मेरे ज्ञातिवर्ग, सुहृद्वर्ग, बन्धुवर्ग तथा भृत्यवर्ग आदि जबतक भोजन न कर लें, तबतक तुममें-से भोजन घटे नहीं—ऐसा वर प्रदान करो।

यह मन्त्र पढ़कर वह पात्र द्विजश्रेष्ठको दान कर दे। यह दान रविवार, संक्रान्ति, चतुर्दशी, अष्टमी, एकादशी अथवा तृतीयाको करना चाहिये। वसिष्ठजीका यह उपदेश मानकर वह ब्राह्मणी नित्य ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित स्थालीपात्र देने लगी। पार्थ! उसी पुण्यके प्रभावसे जन्मान्तरमें वही ब्राह्मणी द्रौपदीरूपमें तुम्हारी भार्या हुई है और दान देनेमें द्रौपदीका हाथ कभी शून्य नहीं रहेगा; क्योंकि यह द्रौपदी, सती, शची, स्वाहा, सावित्री, भू, अरुन्धती तथा लक्ष्मीके रूपमें जहाँ

रह रही हो, वहाँ फिर कौन-सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता है। इतना कहकर मैत्रेयमुनिने कहा कि महाराज युधिष्ठिर! यह द्रौपदी अपनी स्थालीसे अन्न दे तो सम्पूर्ण जगत्को तृप्त कर सकती है, फिर इन थोड़े-से ब्राह्मणोंके भोजन आदिके विषयमें आप क्यों चिन्तित होते हैं?

मैत्रेयजीका ऐसा वचन सुनकर भगवान्! हमलोगोंने भी वैसा ही किया और सभी परिजनोंके साथ ब्राह्मणोंको नित्य भोजन कराने लगे। प्रभो! अन्नदानके प्रसंगसे यह स्थालीदानकी विधि मैंने कही, इसलिये आप मेरी धृष्टताको क्षमा करें। जो व्यक्ति सुन्दर ताम्रकी स्थाली बनाकर चावलोंसे उसे भरकर पर्व-दिनमें इस विधिसे ब्राह्मणको देता है, उसके घर सुहृद्, सम्बन्धी, बान्धव, मित्र, भृत्य और अतिथि नित्य भोजन करें तो भी भोजनकी कमी नहीं होती। (अध्याय १७०)

दासीदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं भक्ति और स्नेहसे दासीदानकी विधि बता रहा हूँ। चारों आश्रमोंमें गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ है। इसमें गृह ही मुख्य है, गृहमें भी गृहिणीकी प्रधानता है। वह स्त्री भी यदि शील तथा विनय आदिसे सम्पन्न और सदाचारिणी हो तो फिर क्या कहना? जिस घरमें स्त्रियोंका आदर-सत्कार होता है, वहाँ देवगण आनन्दमग्न होकर निवास करते हैं और जहाँ इनका अनादर होता है, वह घर नष्ट हो जाता है। अपमानित नारी जिस घरको शाप देती है, वह घर मानो कृत्याके द्वारा शीघ्र ही पराभवको प्राप्त हो जाता है*। सदाचारिणी श्रेष्ठ

स्त्रीको कोई पुण्यवान् ही प्राप्त करता है। जिस घरमें सुवर्ण, श्रेष्ठ दासी, अन्न, बालक और दही, दूध आदि गव्य पदार्थ न हों, उस घरको साक्षात् नरक ही जानना चाहिये। अधिपतिके बिना गाँव, दासीके बिना घर और घीके बिना भोजन—ये तीनों व्यर्थ हैं। जिस घरमें दासियाँ सत्कृत होती हों, वहाँ साक्षात् कमलहस्ता लक्ष्मीका वास होता है। जिस घरमें शौच, आचार, व्यवहार शुद्ध हो, दास-दासियोंका भलीभाँति पोषण होता हो, उस घरमें लक्ष्मी निवास करती हैं। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है, उसका चित्त कभी आकुल नहीं होता। जिस घरमें भार्या गृहस्थ-व्यवहारमें

  • जामयो यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते विनश्यत्याशु तद् गृहम् ॥

जामयो यानि गैहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव सद्यो यानि पराभवम् ॥ (उत्तरपर्व १७१।४-५)

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  • उत्तरपर्व *

५९३

कुशल हो, दासियों अपने-अपने काममें तत्पर हों और सेवक सदा उद्यमी हों, उस घरमें धर्म, अर्थ एवं कामका निवास होता है। वेदोंमें कहा गया है कि जो स्वयंको प्रिय हों, उन पदार्थोंका

दान देना चाहिये। इस बातका विचारकर पर्वकाल, सौम्यग्रहयुक्त स्थिर नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ दासीका ब्राह्मणको दान करना चाहिये। दासी-दान करनेवाला अप्सरालोकमें निवास करता है। (अध्याय १७१)

प्रपा (पौंसला) और अग्नीष्टिका (अँगीठी)-दानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—देवकीनन्दन! अब आप प्रपा (पौंसला)-दानके माहात्म्यको बतलायें। किस समय और किस विधिसे यह दान होता है? उसके दानका क्या फल है, आप इन सबका वर्णन कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके आरम्भमें ब्राह्मणद्वारा उत्तम मुहूर्तकी जानकारी कर नगरके मध्यमें, रास्तेके किनारे, देवालयमें, चैत्य (पीपल या गाँवके किसी प्रसिद्ध)-वृक्षके नीचे अथवा निर्जल स्थानमें या वनमें घनी और शीतल छायायुक्त एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपके बीचमें गीले वस्त्रसे ढककर शीतल जलसे भरे हुए बड़े-बड़े मटके रखने चाहिये। जलपात्र भी रखे। सुशील और गृहस्थ ब्राह्मणको नियुक्त करे, जो निरन्तर थके-प्यासे लोगोंको जल पिलाता रहे। उस ब्राह्मणके निर्वाहयोग्य जीविकाकी व्यवस्थाकर द्रव्य, अन्न आदि जो भी वह चाहे उसे देना चाहिये। इस प्रकार उत्तम मुहूर्तमें प्रपा बनाकर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर इस मन्त्रको पढ़कर प्रपाका दान करना चाहिये—

प्रपेयं सर्वसामान्या भूतेभ्यः प्रतिपादिता ॥

अस्याः प्रदानात् पितरस्तुष्यन्तु च पितामहाः।

(उत्तरपर्व १७२।१-१०)

‘इस प्रपाको मैंने सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये बनवाया है, इसके दान करनेसे मेरे पितर तुम हो जायें।’ उस दिनसे लेकर चार मासतक निरन्तर जल

पिलाना चाहिये और यथाशक्ति अन्न भी देना चाहिये। सुगन्ध, शीतल, उत्तम सुस्वादु जल उत्तम पात्रमें रखकर सबको पिलाना चाहिये और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी नित्य कराना चाहिये।

इस विधिसे जो व्यक्ति ग्रीष्म-ऋतुमें जलदान करता है, वह सभी तीर्थों और सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है तथा देवताओंद्वारा पूजित होता है। वह पूर्णचन्द्रके समान दिव्य कुम्भाकार विमानमें बैठकर स्वर्गमें जाता है, बीस करोड़ वर्षपर्यन्त वहाँ सुख भोगता है और यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि सब उसकी सेवामें तत्पर रहते हैं। पुनः भूमिपर जन्म लेकर चारों वेदोंका मर्मज्ञ ब्राह्मण होता है और उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। प्रपादान करनेका सामर्थ्य न हो तो ग्रीष्मकालमें शीतल जलसे पूर्ण धर्मघट प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घर देना चाहिये और प्रतिमास उसका उद्यापन करना चाहिये। अनेक प्रकारके पक्वान्न और वस्त्र, दक्षिणादिसे युक्त उस धर्मघटका दान करना चाहिये। वह घट ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकरस्वरूप कहा गया है। इस रूपमें उस घटकी इस प्रकार प्रार्थना करे—

एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः।

अस्य प्रदानात् सफलता मम सन्तु मनोरथाः ॥

(उत्तरपर्व १७२।२१)

इस मन्त्रको पढ़कर ब्राह्मणको जलपूर्ण घट देना चाहिये। इस विधिसे जो धर्मघटका दान करता है, वह प्रपादानका फल प्राप्त कर लेता है। यदि

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

धर्मघट भी न दे सके तो उसे चाहिये कि ग्रीष्ममें चार मास नित्य पीपल वृक्षका सेवन करे और 'अश्वत्थरूपी भगवान् प्रीयतां मे जनार्दनः' ऐसा कहकर प्रदक्षिणापूर्वक अश्वत्थको नमस्कार करना चाहिये। अश्वत्थ-सेवनसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और उसे प्रपादानका फल प्राप्त हो जाता है।

भगवन्! इसी प्रकार शीतकालमें दयालु व्यक्तिको अग्नीष्टिका अर्थात् अँगीठीका दान करना चाहिये।

मार्गशीर्ष मासके आरम्भमें उत्तम मुहूर्त देखकर देवालय, मठ, घर अथवा बड़े चौराहेपर सार्य-प्रातः बहुत-सा सूखा काष्ठ एकत्रकर अग्नि प्रज्वलित कर व्याहतियोंसे हवन करना चाहिये। इस प्रकार शीतकालमें दोनों समय अग्नि जलानी

चाहिये। जिससे दीन, अनाथ, वस्त्रहीन वहाँ अग्निका सेवनकर लाभ प्राप्त कर सकें। यदि कोई भूखा हो तो उसको भोजन भी देना चाहिये। आग तापते समय परस्पर भगवच्चर्चा आदि करते रहना चाहिये। इससे महान् पुण्य होता है। यदि स्वेच्छासे कोई राजचर्चा तथा जनचर्चा आदि परोपकारकी बातें करे तो रोकना नहीं चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति अग्नीष्टिकाका दान करता है, वह सूर्यके समान दिव्य विमानमें बैठकर ब्रह्मलोक जाता है। वहाँ वह छाछठ हजार वर्षतक सुख भोगकर पुनः यहाँ जन्म लेता है और चतुर्दिवेता, याज्ञिक, नीरोग, धनवान् और तेजस्वी ब्राह्मण होता है। (अध्याय १७२-१७३)

विद्यादानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अनेक प्रकारके गोदान और भूमिदानकी विधि एवं माहात्म्य आदि सुननेके बाद अब मैं विद्यादानकी महिमा सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जिस प्रकार विद्याका दान करना चाहिये तथा उससे जो फल प्राप्त होता है, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ—

शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिक, फूलमालासे भूषित एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यमें पुस्तकको स्थापित कर गन्ध, अक्षत, पुष्प आदिसे उसका पूजन करे। लेखकका पूजनकर सुवर्णकी लेखनी और चाँदीका मसिपात्र (दावात) बनाकर लेखकको देना चाहिये। लेखकको सुशील और अप्रमत्त होना चाहिये। अनन्तर लेखक पुस्तक लिखना आरम्भ करे। उसे एकाग्रचित्त होकर मात्रा, अनुस्वार, संयुक्त अक्षरोंको साफ-साफ और पर्दाको अलग-अलग लिखना चाहिये। अक्षर गोल-गोल सुन्दर,

एक समान और शीर्षरेखायुक्त हों। इस विधिसे शिवभक्तिपरक या विष्णुभक्तिपरक पुराण, आगम, धर्मशास्त्र आदि लिखवाकर अन्तमें वस्त्र और आभूषण आदिसे लेखकका पूजन करनेके बाद उस पुस्तकको दो वस्त्रोंसे आवेष्टित कर दक्षिणासहित व्युत्पन्नमति, प्रियंवद और उत्तम वाचक ब्राह्मणको अथवा सबके कल्याणके लिये मठ, मन्दिर या सामान्य गृह आदिमें स्थापित करे*। इस विधिसे जो व्यक्ति पुस्तकदान करता है, वह यज्ञ और तीर्थयात्रा करनेसे भी कोटिगुना अधिक फल प्राप्त करता है। एक हजार कपिला गायका विधिपूर्वक दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह एक पुस्तकके दान करनेसे हो जाता है। फिर पुराण, रामायण और महाभारत, गीता आदि पवित्र ग्रन्थोंके दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका वर्णन कौन कर सकता है?

प्रातःकाल उठकर जो अपने शिष्योंको वेदादि

  • वस्त्रयुग्मेन संवीतं पुस्तकं प्रतिपादयेत्। सामान्यं सर्वलोकानां स्थापयेदथ वा मठे ॥ (उत्तरपर्व १७४।११)

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  • उत्तरपर्व *

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शास्त्रों तथा नृत्य, गीत-कलाओंको पढ़ाता है, उसके समान पुण्यात्मा कौन है ? जो पढ़ानेवालेको वृत्ति देकर विद्यार्थियोंको पढ़वाता है, उसने कौन-सा दान नहीं किया ? विद्यार्थियोंको भोजन, वस्त्र, भिक्षा एवं पुस्तक आदि देनेसे मनुष्योंके सभी मनोरथ निःसंदेह सिद्ध होते हैं। वह विवेकवान्, दीर्घजीवी होता है तथा धर्म, अर्थ, काम आदि सब कुछ प्राप्त कर लेता है। राजन् ! जो भी व्यक्ति शास्त्रविद्या, शस्त्रविद्या, चॉसठ कलाई, ज्ञान-विज्ञान आदिको सीखना चाहता है, उसकी यथाशक्ति सहायता करनी चाहिये और उसके उपकारके लिये सदा तत्पर रहना चाहिये१; क्योंकि उससे पारमार्थिक लाभ होता है। हजार वाजपेय-यज्ञ करनेसे जो

फल प्राप्त होता है, वही फल सद्भिद्यादानसे प्राप्त हो जाता है। शिव, विष्णु, अथवा सूर्यके मन्दिरोंमें जो व्यक्ति प्रतिदिन पुराण आदिके वाचनकी व्यवस्था करवाता है, वह प्रतिदिन गौ, भूमि, सुवर्ण और वस्त्रके दानका फल प्राप्त करता है। विद्याहीन व्यक्ति धर्म तथा अधर्मका निर्णय नहीं कर सकता, इसलिये सदा विद्यादानमें तत्पर रहना चाहिये। ब्रह्मा आदि सभी देवता विद्यादानमें प्रतिष्ठित रहते हैं। विद्यादान करनेवाला व्यक्ति एक कल्पतक विष्णुलोकमें पूजित होता है और पुनः भूलोकमें जन्म लेकर दाता, भोगी, रूपसौभाग्ययुक्त, दीर्घायु, नीरोग और पुत्र-पौत्रयुक्त धर्मात्मा राजा होता है२। (अध्याय १७४)

तुलापुरुषदानकी विधि३

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महारज ! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामके एक बड़े प्रतापी और धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उन्होंने तीस हजार वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया और पृथ्वीको सात द्वीपोंमें बाँटकर उनमें अपने सातों पुत्रोंको प्रतिष्ठित कर दिया। तदनन्तर वे विषयोंसे विरत होकर तप करनेके लिये वनमें चले गये। राजा प्रियव्रतको तपोवनमें आया जानकर बड़े-बड़े महात्मा, तपस्वी और मुनिगण राजाका दर्शन करनेकी इच्छासे उनके पास आये। राजाने भी पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदिसे उनका पूजन किया तथा मधुर वाणीसे कुशल-क्षेम पूछकर बैठनेके लिये आसन

दिया। उसी समय सूर्यके समान देदीप्यमान ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यमुनिने वहाँ पदार्पण किया। पुलस्त्यजीको आये देखकर राजासहित सभी मुनि उठ खड़े हुए और उन्होंने अतीव सत्कारपूर्वक आसन देकर पाद्यादिसे पूजन किया। तदनन्तर सभी लोग सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये। फिर शास्त्र-चर्चा होने लगी।

इसी प्रसंगमें मुनियोंने संसारके कल्याणकी कामनासे पुलस्त्यमुनिसे पूछा—‘मुनिसत्तम ! पुरुष और स्त्रियोंको किस दान, व्रत, नियम आदिसे सद्गति प्राप्त होती है। आप उनका वर्णन करें। आपके मुखसे मधुर वचन सुननेकी अभिलाषा हमलोगोंसहित राजा प्रियव्रतको भी है।’

१-शास्त्रं शस्त्रकलाशिल्पं यो यदिच्छेदुपाजितुम्। तस्योपकारकरणे पार्थ कार्यं सदा मनः ॥ (उत्तरपर्व १७४। २०)

२-प्राचीन भारतके विद्यादान और प्रचारमें भगवान् शिव-विष्णुकी भक्ति, सदाचार और परोपकार आदि प्राण थे। यह इस अध्यायसे तथा दानसागर, दानकल्पतरु आदि निबन्ध-ग्रन्थोंसे भी स्पष्ट है। इससे भगवत्प्राप्ति कर प्राणी कृतार्थ हो जाते थे। पर आजके शिक्षालय प्रायः ठीक इसके विपरीत हैं। उनमें धर्म, सदाचारका कोई स्थान नहीं है। धार्मिक शिक्षा विद्यालयोंसे बहिष्कृत हो गयी है और जब शासन ही धर्मनिरपेक्ष है तो कहना ही क्या ?

३-यह प्रकरण मत्स्यपुराणके २७४वें अध्यायमें प्रायः इसी प्रकार प्राप्त होता है। इसीके साथ-साथ वहाँ षोडश महादानका भी वर्णन हुआ है।

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

पुलस्त्यमुनिने कहा—मुनीश्वरो ! मैं सभी दानोंमें उत्तम, सुगुप्त और सर्वपापहारी तुलादानकी विधि बता रहा हूँ। जिसके करनेसे स्त्री अथवा पुरुष ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपलीगमन, कूटसाक्ष्य (झूठी गवाही) आदि अनेक पापोंसे छूटकर विशुद्ध-शरीर हो जाता है। यदि मनुष्यको ब्रह्मलोक-प्राप्तिकी इच्छा है तो वह कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत तथा तुलापुरुषदान करे। मुनियो ! कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत वनवासी ब्राह्मणों, भिक्षुओं और विधवा नारियोंके लिये कहे गये हैं, ये व्रत शरीरको कष्ट देनेसे ही सिद्ध होते हैं। राजा, धनवान्, गृहस्थ इस कृच्छ्रसाध्य धर्मको नहीं सम्पादित कर सकते। धन मानो मनुष्योंका बाहर रहनेवाला प्राण ही है। इसलिये धनवान् व्यक्तियोंको इन्हें धर्ममें लगाकर सार्थक बनाना चाहिये। संसारमें सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, सभी द्रव्योंमें श्रेष्ठ स्वर्ण है, यह देवताओंके प्रधान अग्निदेवका ही पुत्र है। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि उस स्वर्णसे अपनेको तौल ले फिर उसके दानसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और दिव्य शरीरकी प्राप्ति होती है। महाराज ! इस प्रकार पुलस्त्यमुनिने ऋषियों और राजा प्रियव्रतसे तुलादानके माहात्म्यको बतलाया। वही विधि ऋषियोंने मुझसे कही और मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनें।

व्यतीपात, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण, ग्रहपीडा होनेपर, दुःस्वप्न देखनेपर, कार्तिकी अथवा माघी पूर्णिमा आदि पर्वके दिनोंमें या जब पर्याप्त धन उपलब्ध हो, उस समय तुलापुरुषदान करना चाहिये। मनुष्यको निरन्तर यही विचार करना चाहिये कि जीवन अनित्य है, सम्पत्ति

अत्यन्त चञ्चल है, मृत्युने केशोंको पकड़ रखा है, शरीरका कब अन्त हो जाय, यह निश्चित नहीं है, अतः सदा धर्माचरण ही करना चाहिये। इसलिये जब भी श्रद्धा हो, उसी समय दान आदि करना चाहिये, वही दान देनेका उचित समय है। श्रद्धासे ही फल होता है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा अपने घरमें दान करना चाहिये। अपने घरके अथवा देवालयके प्राङ्गणमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े पताका आदिसे सुसज्जित एक सुन्दर मण्डपकी रचनाकर उसके बीचमें सात हाथ लम्बी-चौड़ी और एक हाथ ऊँची चौरस वेदी बनाये। फिर उसके मध्यमें विधिपूर्वक दिव्य तुलाको स्थापित करे। दो स्तम्भोंको जो चार हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। चन्दन, खदिर, बिल्व, शाल, इंगुदी, तिलुदक, देवदारु और श्रीपर्ण—इन आठ वृक्षोंमेंसे किसी भी वृक्षके लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये अथवा किसी मजबूत काष्ठवाले याज्ञिक वृक्षकी लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये। स्तम्भके ऊपर उसी काष्ठका चार हाथ लम्बा एक तिरछा काष्ठ रखकर उसमें छानबे अङ्गुल लम्बी लौह-शुद्धला लगानी चाहिये। उसमें लोहेके दो पलड़े भी बनाने चाहिये। मध्यमें तुलापुरुषकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। इस प्रकारकी तुलाको रत्न, वस्त्र, आभूषण, चन्दन तथा पुष्पमाला आदिसे अलंकृत करे।

तीन मेखला और योनिसे युक्त हस्तप्रमाणवाले चार कुण्ड बनाकर ईशानकोणमें एक हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये। उसके ऊपर ग्रह और दिक्पालोंका पूजन करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,

१-यदेतद् द्रविणं नाम प्राणाक्षैते बहिश्चराः ॥ तस्माद् बहिश्चरैः प्राणैरात्मा योज्यः सदा वृष्टैः । (उत्तरपर्व १७५।११-२०)

२-यदा वा जायते वित्तं तदा देयमिदं भवेत्। अनित्यं जीवितं यस्माद्वसुश्रातीव चञ्चलम् ॥

केशेषु च गृहीतः सन्मृत्युना धर्ममाचरेत् । (उत्तरपर्व १७५।२७-२८)

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  • उत्तरपर्व *

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अक्षत, चन्दन, फल और वस्त्रादिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरका पूजन करे। क्षीर-वृक्षके पत्तोसे तोरण बनाये और मण्डपके चारों द्वारोंपर पुष्पमाला तथा पल्लव आदिसे सुशोभित कलशोंको सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। ऋग्वेद जाननेवाले दो ब्राह्मणोंको पूर्व कुण्डपर, यजुर्वेदके ज्ञाता दो ब्राह्मणोंको दक्षिण कुण्डपर, सामवेदके जाननेवाले दो ब्राह्मणोंको पश्चिम कुण्डपर और अथर्ववेदी दो ब्राह्मणोंको उत्तर दिशाके कुण्डपर हवनके लिये नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त एक नवें धर्मोपदेशक ब्राह्मणका भी वरण करे। कुछ ऋषियोंका मत है कि सोलह ऋत्विक् हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। वरणके समय प्रत्येक ऋत्विक्को दो ताम्रपात्र और एक आसन दे। तिल, घी, समिधा, विष्टर, पुष्प, कुश, स्तुक् तथा स्तुव आदि सभी हवनकी सामग्रियोंको एकत्रित कर लोकपालोंके रंगकी पताका उनकी दिशामें लगानी चाहिये और बीचमें महाध्वज खड़ा करना चाहिये तथा पाँच रंगोंवाला वितान भी बाँधना चाहिये।

इस प्रकार सभी सामग्रियोंको सम्पादित कर सभी शिल्पकार्योंमें निपुण शिल्पकार (बर्द्ध) ब्राह्मणोंके साथ बनाये गये उस मण्डपको यजमानको दिखलाये। यज्ञकी रक्षाके लिये यजमान ज्ञानकर श्वेत वस्त्र पहनकर इन्द्रादि दिक्पालोंका आवाहन करे तथा उन्हें बलि प्रदान करे और प्रार्थना करे। उस समय अनेक प्रकारके शङ्ख-तूर्य आदि वाद्य बजते रहें और मङ्गल-वेदध्वनि होती रहे। आवाहन आदिके मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—

‘इन्द्रदेव! आप देवताओंके स्वामी और व्रज धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं। आप यहाँ पधारिये और हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। इन्द्रदेवताको

नमस्कार है। ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये। अग्निदेव! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ यहाँ आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर अग्निदेवका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं यज्ञके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये। निर्वृतिदेव! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षससमूहके नायक हैं। पिशाचनाथ! आप वैतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर निर्वृतिका आवाहन करना चाहिये। वरुणदेव! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों एवं अप्सराओंके साथ यहाँ आइये तथा हमारी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। वायुदेव! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृगपर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये तथा मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। सोमदेव! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी विश्वेश्वर! विश्वमूर्ति! ईशानदेव! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। अनन्तदेव! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागपत्नियों और किंनर आपका गुणगान करते हैं। आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणोंके साथ यहाँ आइये तथा हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपते! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ पधारिये। पितामह ब्रह्मन्! आप कल्याण करनेके लिये हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकियों जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, मनु, गौर्ण, देवमाताएँ—ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें।'

इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अँगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। गुरुको ये आभूषण और वस्त्र दूना देना चाहिये। सर्वप्रथम आधार और आज्यभागसे हवन करे। जिन ग्रहों, लोकपालों तथा देवताओंकी प्रतिष्ठा की जाय, सबके तत्तद् मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अङ्गलियोंमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—

नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता ॥

साक्षिभूता जगद्वात्रि निर्मिता विश्वयोनिना ।

एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च ॥

धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता ॥ मां तोलयन्ती संसारादुद्भरस्व नमोऽस्तु ते। योऽसी तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः। नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक ॥ त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्।

(उत्तरपर्व १७५।७१—७६)

'तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। हे जगद्वात्रि! तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारम्बार प्रणाम है। तुलापुरुषरूप गोविन्द! आपको बारम्बार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी सागरसे हमारा उद्धार करें।'

इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, ढाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे। वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्ठीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके मुखकी ओर देखता हुआ स्थित रहे।

तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे तुलाकी दूसरी ओर यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्णकी तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले,

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  • उत्तरपर्व *

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तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे—

नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातने। पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना॥ त्वया धृतं जगत्सर्वं सहस्थावरजंगमम्। सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि॥

(उत्तरपर्व १७५।८१-८२)

‘सभी जीवोंकी साक्षिभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्को धारण करनेवाली हो, सभी जीवोंको आत्मभूत करनेवाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है।’

तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिये एवं बचे हुए आधे भागको हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिये। पुनः उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान दे। विशेषतया दीनों एवं अनार्थोंको भी ब्राह्मणोंके साथ दान देना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे। क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला,

शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है।

इसी विधिसे चाँदी और कपूरसे भी तुलादान किया जाता है। सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको कृष्ण पक्षकी तृतीयाको कुंकुम, लवण और गुड़का तुलादान करना चाहिये। इसमें मन्त्र और हवनकी अपेक्षा नहीं रहती। इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष तुलादान करते हैं, वे श्रेष्ठ सुन्दर विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाते हैं। वहाँ एक कल्पतक निवासकर वह विष्णुलोक, शिवलोक, विश्वेदेवलोक, इन्द्रलोक, धर्मराजलोक, वरुणलोक, कुबेरलोक आदिमें अनेकों कल्पोंतक निवासकर पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा, दानी और शत्रुओंका क्षय करनेवाला राजाका पद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति इस महादानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे कोई उत्तम पूजनीय देवता नहीं है, अश्वमेधके समान कोई यज्ञ नहीं, गङ्गाके समान कोई पवित्र नदी नहीं और तुलादानके समान कोई अन्य दान नहीं है। (अध्याय १७५)

हिरण्यगर्भ-दानकी विधि

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आप किसी ऐसे व्रत अथवा दानकी विधि बतलायें, जिसके करनेसे आयु, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि हो।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं आपके स्नेहेके वशीभूत होकर संसारका कल्याण करनेकी इच्छासे हिरण्यगर्भ-दानकी विधि बता रहा हूँ, जिसके करनेसे मनुष्य मेरी समताको प्राप्त कर लेता है। राजन्! सुवर्ण अग्निदेवका ज्येष्ठ पुत्र है, वह सभी धातुओंमें श्रेष्ठ और परम पवित्र है।

उसीका दूसरा नाम हिरण्य है। वही जलके गर्भमें प्रविष्ट होकर पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको सुवर्णका दान देता है, वह मेरे तुल्य हो जाता है।

महाराज! अब उसके दानकी विधि सुनिये। किसी पर्वकाल, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहणकाल, व्यतीपात, कार्तिकी पूर्णिमा, जन्मनक्षत्र, ग्रहपीड़ा, दुःस्वप्नदर्शन आदि कालोंमें प्रयाग, नैमिष, कुरुक्षेत्र, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, गङ्गासागर-संगम और पुण्य

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नदियोंके तटपर हिरण्यगर्भका दान करना चाहिये अथवा घर, देवालय, बाग, तड़ाग आदि पवित्र स्थानोंमें यह दान करना चाहिये। सर्वप्रथम भूमिशोधनकर बारह हाथ लम्बा-चौड़ा एक मण्डप बनाकर उसे स्तम्भ, तोरण, पताका आदिसे अलंकृत करे। मण्डपके बीचमें पाँच हाथकी वेदी बनाकर उसमें वितान लगाकर उसे फूलमाला आदिसे सजा दे। वेदीपर हिरण्यगर्भ-कलशको स्थापित करना चाहिये। सर्वप्रथम वस्त्र तथा आभूषणसे शिल्पीका पूजनकर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कार्य आरम्भ करे। शिल्पी उत्तम सुवर्णसे हिरण्यमय माङ्गलिक कलशकी रचना करे। उसकी ऊँचाई चौंसठ अङ्गुल कही गयी है और मुख ऊँचाईका तीसरा भाग हो। कलशकी पेंदी मुख-परिमापसे आधा रहे। उसकी गोलाई कर्णिकाके समान हो। यह कलश सुन्दर, ग्रन्थिविहीन होना चाहिये। कलशका ढक्कन मुखके परिमापसे एक अङ्गुल अधिक रहे और उसके समीप दस अस्त्र सुवर्णनाल, सूर्यमूर्ति, स्वर्णमय सूची, क्षुर तथा कमण्डलु, छत्र, पादुका आदि सभी सामग्रियोंके साथ ब्रह्माकी मूर्ति स्थापित करनेके बाद वेदध्वनि एवं शङ्ख आदिकी मङ्गलध्वनि करते हुए ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भ-कलशको हाथी अथवा रथसे मण्डपमें ले आये। वहाँ वेदीके ऊपर एक द्रोण तिल रखकर उसपर उसे स्थापित करना चाहिये। उसके बाद हिरण्यगर्भको कुंकुमसे उपलिसकर तथा रेशमी वस्त्रसे ढककर पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे। तदनन्तर धूप, दीप आदिसे उसकी पूजा करे और यह कहकर नमस्कार करे—

भूलोकप्रमुखालोकास्तव गर्भे व्यवस्थिताः ॥

ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते भुवनोद्भव ।

नमस्ते भुवनाधार नमस्ते भुवनेश्वर ॥

नमो हिरण्यगर्भाय गर्भे यस्य पितामहः ।

(उत्तरपर्व १७६ । ३०—३२)

‘भुवनोद्भव ! भूलोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं। अतः विश्वाधार ! विश्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, अतः हिरण्यगर्भको प्रणाम है।’

इस प्रकार पूजा करनेके बाद एक रात्रिक उसका अधिवासन करना चाहिये। वेदीके चारों ओर चौरस चार कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदवेत्ता ब्राह्मण क्रमसे मौन होकर हवन करें। वे ब्राह्मण उत्तम वस्त्र आदिसे अलंकृत हों तथा उनकी गन्ध, धूप आदिसे पूजा कर दो-दो ताम्रपात्र देने चाहिये। वेदीके ईशानकोणमें ग्रहवेदी बनाकर उसपर नवग्रह, दस दिक्पाल और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवकी सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित कर गन्ध, पुष्प, अक्षत तथा वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करे। पताका—तोरण आदिसे मण्डपको अलंकृत करे। मण्डपके द्वारोंपर रत्नयुक्त दो-दो कलश स्थापित कर तुलापुरुषदानकी रीतिसे लोकपालोंका आवाहन कर नैवेद्यादि बलि देनी चाहिये। इस यज्ञमें पलाशकी समिधा हवनके लिये उत्तम होती है। चरु, तिल एवं गायके घृतसे व्याहृति और ग्रहों तथा देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे बीस हजार आहुतियाँ दे। शुभ मुहूर्तमें यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र धारण कर हिरण्यगर्भका पूजन करनेके बाद इस प्रकार प्रार्थना और प्रदक्षिणा करे—

नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः ।

चराचरस्य जगतो गृहभूताय ते नमः ॥

मात्राहं जनितः पूर्व मर्त्यधर्मा सुरोत्तम ।

त्वद्भर्तसम्भवादद्य दिव्यदेहो भवाम्यहम् ॥

(उत्तरपर्व १७६ । ४२-४३)

‘हिरण्यगर्भको नमस्कार है। विश्वगर्भको प्रणाम है। हे चराचरजगत्के गृहभूत ! आपको नमस्कार

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