भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 610, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे—
नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातने। पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना॥ त्वया धृतं जगत्सर्वं सहस्थावरजंगमम्। सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि॥
(उत्तरपर्व १७५।८१-८२)
‘सभी जीवोंकी साक्षिभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्को धारण करनेवाली हो, सभी जीवोंको आत्मभूत करनेवाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है।’
तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिये एवं बचे हुए आधे भागको हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिये। पुनः उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान दे। विशेषतया दीनों एवं अनार्थोंको भी ब्राह्मणोंके साथ दान देना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे। क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला,
शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है।
इसी विधिसे चाँदी और कपूरसे भी तुलादान किया जाता है। सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको कृष्ण पक्षकी तृतीयाको कुंकुम, लवण और गुड़का तुलादान करना चाहिये। इसमें मन्त्र और हवनकी अपेक्षा नहीं रहती। इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष तुलादान करते हैं, वे श्रेष्ठ सुन्दर विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाते हैं। वहाँ एक कल्पतक निवासकर वह विष्णुलोक, शिवलोक, विश्वेदेवलोक, इन्द्रलोक, धर्मराजलोक, वरुणलोक, कुबेरलोक आदिमें अनेकों कल्पोंतक निवासकर पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा, दानी और शत्रुओंका क्षय करनेवाला राजाका पद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति इस महादानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे कोई उत्तम पूजनीय देवता नहीं है, अश्वमेधके समान कोई यज्ञ नहीं, गङ्गाके समान कोई पवित्र नदी नहीं और तुलादानके समान कोई अन्य दान नहीं है। (अध्याय १७५)
हिरण्यगर्भ-दानकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आप किसी ऐसे व्रत अथवा दानकी विधि बतलायें, जिसके करनेसे आयु, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं आपके स्नेहेके वशीभूत होकर संसारका कल्याण करनेकी इच्छासे हिरण्यगर्भ-दानकी विधि बता रहा हूँ, जिसके करनेसे मनुष्य मेरी समताको प्राप्त कर लेता है। राजन्! सुवर्ण अग्निदेवका ज्येष्ठ पुत्र है, वह सभी धातुओंमें श्रेष्ठ और परम पवित्र है।
उसीका दूसरा नाम हिरण्य है। वही जलके गर्भमें प्रविष्ट होकर पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको सुवर्णका दान देता है, वह मेरे तुल्य हो जाता है।
महाराज! अब उसके दानकी विधि सुनिये। किसी पर्वकाल, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहणकाल, व्यतीपात, कार्तिकी पूर्णिमा, जन्मनक्षत्र, ग्रहपीड़ा, दुःस्वप्नदर्शन आदि कालोंमें प्रयाग, नैमिष, कुरुक्षेत्र, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, गङ्गासागर-संगम और पुण्य
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