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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 609, कुल 654 में से

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पृष्ठ 609

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। अनन्तदेव! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागपत्नियों और किंनर आपका गुणगान करते हैं। आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणोंके साथ यहाँ आइये तथा हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपते! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ पधारिये। पितामह ब्रह्मन्! आप कल्याण करनेके लिये हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकियों जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, मनु, गौर्ण, देवमाताएँ—ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें।'

इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अँगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। गुरुको ये आभूषण और वस्त्र दूना देना चाहिये। सर्वप्रथम आधार और आज्यभागसे हवन करे। जिन ग्रहों, लोकपालों तथा देवताओंकी प्रतिष्ठा की जाय, सबके तत्तद् मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अङ्गलियोंमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—

नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता ॥

साक्षिभूता जगद्वात्रि निर्मिता विश्वयोनिना ।

एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च ॥

धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता ॥ मां तोलयन्ती संसारादुद्भरस्व नमोऽस्तु ते। योऽसी तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः। नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक ॥ त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्।

(उत्तरपर्व १७५।७१—७६)

'तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। हे जगद्वात्रि! तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारम्बार प्रणाम है। तुलापुरुषरूप गोविन्द! आपको बारम्बार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी सागरसे हमारा उद्धार करें।'

इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, ढाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे। वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्ठीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके मुखकी ओर देखता हुआ स्थित रहे।

तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे तुलाकी दूसरी ओर यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्णकी तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले,

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