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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 608, कुल 654 में से

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पृष्ठ 608
  • उत्तरपर्व *

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अक्षत, चन्दन, फल और वस्त्रादिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरका पूजन करे। क्षीर-वृक्षके पत्तोसे तोरण बनाये और मण्डपके चारों द्वारोंपर पुष्पमाला तथा पल्लव आदिसे सुशोभित कलशोंको सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। ऋग्वेद जाननेवाले दो ब्राह्मणोंको पूर्व कुण्डपर, यजुर्वेदके ज्ञाता दो ब्राह्मणोंको दक्षिण कुण्डपर, सामवेदके जाननेवाले दो ब्राह्मणोंको पश्चिम कुण्डपर और अथर्ववेदी दो ब्राह्मणोंको उत्तर दिशाके कुण्डपर हवनके लिये नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त एक नवें धर्मोपदेशक ब्राह्मणका भी वरण करे। कुछ ऋषियोंका मत है कि सोलह ऋत्विक् हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। वरणके समय प्रत्येक ऋत्विक्को दो ताम्रपात्र और एक आसन दे। तिल, घी, समिधा, विष्टर, पुष्प, कुश, स्तुक् तथा स्तुव आदि सभी हवनकी सामग्रियोंको एकत्रित कर लोकपालोंके रंगकी पताका उनकी दिशामें लगानी चाहिये और बीचमें महाध्वज खड़ा करना चाहिये तथा पाँच रंगोंवाला वितान भी बाँधना चाहिये।

इस प्रकार सभी सामग्रियोंको सम्पादित कर सभी शिल्पकार्योंमें निपुण शिल्पकार (बर्द्ध) ब्राह्मणोंके साथ बनाये गये उस मण्डपको यजमानको दिखलाये। यज्ञकी रक्षाके लिये यजमान ज्ञानकर श्वेत वस्त्र पहनकर इन्द्रादि दिक्पालोंका आवाहन करे तथा उन्हें बलि प्रदान करे और प्रार्थना करे। उस समय अनेक प्रकारके शङ्ख-तूर्य आदि वाद्य बजते रहें और मङ्गल-वेदध्वनि होती रहे। आवाहन आदिके मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—

‘इन्द्रदेव! आप देवताओंके स्वामी और व्रज धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं। आप यहाँ पधारिये और हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। इन्द्रदेवताको

नमस्कार है। ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये। अग्निदेव! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ यहाँ आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर अग्निदेवका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं यज्ञके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये। निर्वृतिदेव! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षससमूहके नायक हैं। पिशाचनाथ! आप वैतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर निर्वृतिका आवाहन करना चाहिये। वरुणदेव! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों एवं अप्सराओंके साथ यहाँ आइये तथा हमारी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। वायुदेव! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृगपर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये तथा मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। सोमदेव! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी विश्वेश्वर! विश्वमूर्ति! ईशानदेव! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें

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