भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 607, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पुलस्त्यमुनिने कहा—मुनीश्वरो ! मैं सभी दानोंमें उत्तम, सुगुप्त और सर्वपापहारी तुलादानकी विधि बता रहा हूँ। जिसके करनेसे स्त्री अथवा पुरुष ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपलीगमन, कूटसाक्ष्य (झूठी गवाही) आदि अनेक पापोंसे छूटकर विशुद्ध-शरीर हो जाता है। यदि मनुष्यको ब्रह्मलोक-प्राप्तिकी इच्छा है तो वह कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत तथा तुलापुरुषदान करे। मुनियो ! कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत वनवासी ब्राह्मणों, भिक्षुओं और विधवा नारियोंके लिये कहे गये हैं, ये व्रत शरीरको कष्ट देनेसे ही सिद्ध होते हैं। राजा, धनवान्, गृहस्थ इस कृच्छ्रसाध्य धर्मको नहीं सम्पादित कर सकते। धन मानो मनुष्योंका बाहर रहनेवाला प्राण ही है। इसलिये धनवान् व्यक्तियोंको इन्हें धर्ममें लगाकर सार्थक बनाना चाहिये। संसारमें सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, सभी द्रव्योंमें श्रेष्ठ स्वर्ण है, यह देवताओंके प्रधान अग्निदेवका ही पुत्र है। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि उस स्वर्णसे अपनेको तौल ले फिर उसके दानसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और दिव्य शरीरकी प्राप्ति होती है। महाराज ! इस प्रकार पुलस्त्यमुनिने ऋषियों और राजा प्रियव्रतसे तुलादानके माहात्म्यको बतलाया। वही विधि ऋषियोंने मुझसे कही और मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनें।
व्यतीपात, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण, ग्रहपीडा होनेपर, दुःस्वप्न देखनेपर, कार्तिकी अथवा माघी पूर्णिमा आदि पर्वके दिनोंमें या जब पर्याप्त धन उपलब्ध हो, उस समय तुलापुरुषदान करना चाहिये। मनुष्यको निरन्तर यही विचार करना चाहिये कि जीवन अनित्य है, सम्पत्ति
अत्यन्त चञ्चल है, मृत्युने केशोंको पकड़ रखा है, शरीरका कब अन्त हो जाय, यह निश्चित नहीं है, अतः सदा धर्माचरण ही करना चाहिये। इसलिये जब भी श्रद्धा हो, उसी समय दान आदि करना चाहिये, वही दान देनेका उचित समय है। श्रद्धासे ही फल होता है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा अपने घरमें दान करना चाहिये। अपने घरके अथवा देवालयके प्राङ्गणमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े पताका आदिसे सुसज्जित एक सुन्दर मण्डपकी रचनाकर उसके बीचमें सात हाथ लम्बी-चौड़ी और एक हाथ ऊँची चौरस वेदी बनाये। फिर उसके मध्यमें विधिपूर्वक दिव्य तुलाको स्थापित करे। दो स्तम्भोंको जो चार हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। चन्दन, खदिर, बिल्व, शाल, इंगुदी, तिलुदक, देवदारु और श्रीपर्ण—इन आठ वृक्षोंमेंसे किसी भी वृक्षके लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये अथवा किसी मजबूत काष्ठवाले याज्ञिक वृक्षकी लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये। स्तम्भके ऊपर उसी काष्ठका चार हाथ लम्बा एक तिरछा काष्ठ रखकर उसमें छानबे अङ्गुल लम्बी लौह-शुद्धला लगानी चाहिये। उसमें लोहेके दो पलड़े भी बनाने चाहिये। मध्यमें तुलापुरुषकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। इस प्रकारकी तुलाको रत्न, वस्त्र, आभूषण, चन्दन तथा पुष्पमाला आदिसे अलंकृत करे।
तीन मेखला और योनिसे युक्त हस्तप्रमाणवाले चार कुण्ड बनाकर ईशानकोणमें एक हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये। उसके ऊपर ग्रह और दिक्पालोंका पूजन करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
१-यदेतद् द्रविणं नाम प्राणाक्षैते बहिश्चराः ॥ तस्माद् बहिश्चरैः प्राणैरात्मा योज्यः सदा वृष्टैः । (उत्तरपर्व १७५।११-२०)
२-यदा वा जायते वित्तं तदा देयमिदं भवेत्। अनित्यं जीवितं यस्माद्वसुश्रातीव चञ्चलम् ॥
केशेषु च गृहीतः सन्मृत्युना धर्ममाचरेत् । (उत्तरपर्व १७५।२७-२८)
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