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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 654 में से

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  • उत्तरपर्व *

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शास्त्रों तथा नृत्य, गीत-कलाओंको पढ़ाता है, उसके समान पुण्यात्मा कौन है ? जो पढ़ानेवालेको वृत्ति देकर विद्यार्थियोंको पढ़वाता है, उसने कौन-सा दान नहीं किया ? विद्यार्थियोंको भोजन, वस्त्र, भिक्षा एवं पुस्तक आदि देनेसे मनुष्योंके सभी मनोरथ निःसंदेह सिद्ध होते हैं। वह विवेकवान्, दीर्घजीवी होता है तथा धर्म, अर्थ, काम आदि सब कुछ प्राप्त कर लेता है। राजन् ! जो भी व्यक्ति शास्त्रविद्या, शस्त्रविद्या, चॉसठ कलाई, ज्ञान-विज्ञान आदिको सीखना चाहता है, उसकी यथाशक्ति सहायता करनी चाहिये और उसके उपकारके लिये सदा तत्पर रहना चाहिये१; क्योंकि उससे पारमार्थिक लाभ होता है। हजार वाजपेय-यज्ञ करनेसे जो

फल प्राप्त होता है, वही फल सद्भिद्यादानसे प्राप्त हो जाता है। शिव, विष्णु, अथवा सूर्यके मन्दिरोंमें जो व्यक्ति प्रतिदिन पुराण आदिके वाचनकी व्यवस्था करवाता है, वह प्रतिदिन गौ, भूमि, सुवर्ण और वस्त्रके दानका फल प्राप्त करता है। विद्याहीन व्यक्ति धर्म तथा अधर्मका निर्णय नहीं कर सकता, इसलिये सदा विद्यादानमें तत्पर रहना चाहिये। ब्रह्मा आदि सभी देवता विद्यादानमें प्रतिष्ठित रहते हैं। विद्यादान करनेवाला व्यक्ति एक कल्पतक विष्णुलोकमें पूजित होता है और पुनः भूलोकमें जन्म लेकर दाता, भोगी, रूपसौभाग्ययुक्त, दीर्घायु, नीरोग और पुत्र-पौत्रयुक्त धर्मात्मा राजा होता है२। (अध्याय १७४)

तुलापुरुषदानकी विधि३

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महारज ! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामके एक बड़े प्रतापी और धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उन्होंने तीस हजार वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया और पृथ्वीको सात द्वीपोंमें बाँटकर उनमें अपने सातों पुत्रोंको प्रतिष्ठित कर दिया। तदनन्तर वे विषयोंसे विरत होकर तप करनेके लिये वनमें चले गये। राजा प्रियव्रतको तपोवनमें आया जानकर बड़े-बड़े महात्मा, तपस्वी और मुनिगण राजाका दर्शन करनेकी इच्छासे उनके पास आये। राजाने भी पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदिसे उनका पूजन किया तथा मधुर वाणीसे कुशल-क्षेम पूछकर बैठनेके लिये आसन

दिया। उसी समय सूर्यके समान देदीप्यमान ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यमुनिने वहाँ पदार्पण किया। पुलस्त्यजीको आये देखकर राजासहित सभी मुनि उठ खड़े हुए और उन्होंने अतीव सत्कारपूर्वक आसन देकर पाद्यादिसे पूजन किया। तदनन्तर सभी लोग सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये। फिर शास्त्र-चर्चा होने लगी।

इसी प्रसंगमें मुनियोंने संसारके कल्याणकी कामनासे पुलस्त्यमुनिसे पूछा—‘मुनिसत्तम ! पुरुष और स्त्रियोंको किस दान, व्रत, नियम आदिसे सद्गति प्राप्त होती है। आप उनका वर्णन करें। आपके मुखसे मधुर वचन सुननेकी अभिलाषा हमलोगोंसहित राजा प्रियव्रतको भी है।’

१-शास्त्रं शस्त्रकलाशिल्पं यो यदिच्छेदुपाजितुम्। तस्योपकारकरणे पार्थ कार्यं सदा मनः ॥ (उत्तरपर्व १७४। २०)

२-प्राचीन भारतके विद्यादान और प्रचारमें भगवान् शिव-विष्णुकी भक्ति, सदाचार और परोपकार आदि प्राण थे। यह इस अध्यायसे तथा दानसागर, दानकल्पतरु आदि निबन्ध-ग्रन्थोंसे भी स्पष्ट है। इससे भगवत्प्राप्ति कर प्राणी कृतार्थ हो जाते थे। पर आजके शिक्षालय प्रायः ठीक इसके विपरीत हैं। उनमें धर्म, सदाचारका कोई स्थान नहीं है। धार्मिक शिक्षा विद्यालयोंसे बहिष्कृत हो गयी है और जब शासन ही धर्मनिरपेक्ष है तो कहना ही क्या ?

३-यह प्रकरण मत्स्यपुराणके २७४वें अध्यायमें प्रायः इसी प्रकार प्राप्त होता है। इसीके साथ-साथ वहाँ षोडश महादानका भी वर्णन हुआ है।

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