भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
धर्मघट भी न दे सके तो उसे चाहिये कि ग्रीष्ममें चार मास नित्य पीपल वृक्षका सेवन करे और 'अश्वत्थरूपी भगवान् प्रीयतां मे जनार्दनः' ऐसा कहकर प्रदक्षिणापूर्वक अश्वत्थको नमस्कार करना चाहिये। अश्वत्थ-सेवनसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और उसे प्रपादानका फल प्राप्त हो जाता है।
भगवन्! इसी प्रकार शीतकालमें दयालु व्यक्तिको अग्नीष्टिका अर्थात् अँगीठीका दान करना चाहिये।
मार्गशीर्ष मासके आरम्भमें उत्तम मुहूर्त देखकर देवालय, मठ, घर अथवा बड़े चौराहेपर सार्य-प्रातः बहुत-सा सूखा काष्ठ एकत्रकर अग्नि प्रज्वलित कर व्याहतियोंसे हवन करना चाहिये। इस प्रकार शीतकालमें दोनों समय अग्नि जलानी
चाहिये। जिससे दीन, अनाथ, वस्त्रहीन वहाँ अग्निका सेवनकर लाभ प्राप्त कर सकें। यदि कोई भूखा हो तो उसको भोजन भी देना चाहिये। आग तापते समय परस्पर भगवच्चर्चा आदि करते रहना चाहिये। इससे महान् पुण्य होता है। यदि स्वेच्छासे कोई राजचर्चा तथा जनचर्चा आदि परोपकारकी बातें करे तो रोकना नहीं चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति अग्नीष्टिकाका दान करता है, वह सूर्यके समान दिव्य विमानमें बैठकर ब्रह्मलोक जाता है। वहाँ वह छाछठ हजार वर्षतक सुख भोगकर पुनः यहाँ जन्म लेता है और चतुर्दिवेता, याज्ञिक, नीरोग, धनवान् और तेजस्वी ब्राह्मण होता है। (अध्याय १७२-१७३)
विद्यादानकी महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अनेक प्रकारके गोदान और भूमिदानकी विधि एवं माहात्म्य आदि सुननेके बाद अब मैं विद्यादानकी महिमा सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जिस प्रकार विद्याका दान करना चाहिये तथा उससे जो फल प्राप्त होता है, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ—
शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिक, फूलमालासे भूषित एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यमें पुस्तकको स्थापित कर गन्ध, अक्षत, पुष्प आदिसे उसका पूजन करे। लेखकका पूजनकर सुवर्णकी लेखनी और चाँदीका मसिपात्र (दावात) बनाकर लेखकको देना चाहिये। लेखकको सुशील और अप्रमत्त होना चाहिये। अनन्तर लेखक पुस्तक लिखना आरम्भ करे। उसे एकाग्रचित्त होकर मात्रा, अनुस्वार, संयुक्त अक्षरोंको साफ-साफ और पर्दाको अलग-अलग लिखना चाहिये। अक्षर गोल-गोल सुन्दर,
एक समान और शीर्षरेखायुक्त हों। इस विधिसे शिवभक्तिपरक या विष्णुभक्तिपरक पुराण, आगम, धर्मशास्त्र आदि लिखवाकर अन्तमें वस्त्र और आभूषण आदिसे लेखकका पूजन करनेके बाद उस पुस्तकको दो वस्त्रोंसे आवेष्टित कर दक्षिणासहित व्युत्पन्नमति, प्रियंवद और उत्तम वाचक ब्राह्मणको अथवा सबके कल्याणके लिये मठ, मन्दिर या सामान्य गृह आदिमें स्थापित करे*। इस विधिसे जो व्यक्ति पुस्तकदान करता है, वह यज्ञ और तीर्थयात्रा करनेसे भी कोटिगुना अधिक फल प्राप्त करता है। एक हजार कपिला गायका विधिपूर्वक दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह एक पुस्तकके दान करनेसे हो जाता है। फिर पुराण, रामायण और महाभारत, गीता आदि पवित्र ग्रन्थोंके दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका वर्णन कौन कर सकता है?
प्रातःकाल उठकर जो अपने शिष्योंको वेदादि
- वस्त्रयुग्मेन संवीतं पुस्तकं प्रतिपादयेत्। सामान्यं सर्वलोकानां स्थापयेदथ वा मठे ॥ (उत्तरपर्व १७४।११)
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