सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 604, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 604
  • उत्तरपर्व *

५९३

कुशल हो, दासियों अपने-अपने काममें तत्पर हों और सेवक सदा उद्यमी हों, उस घरमें धर्म, अर्थ एवं कामका निवास होता है। वेदोंमें कहा गया है कि जो स्वयंको प्रिय हों, उन पदार्थोंका

दान देना चाहिये। इस बातका विचारकर पर्वकाल, सौम्यग्रहयुक्त स्थिर नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ दासीका ब्राह्मणको दान करना चाहिये। दासी-दान करनेवाला अप्सरालोकमें निवास करता है। (अध्याय १७१)

प्रपा (पौंसला) और अग्नीष्टिका (अँगीठी)-दानकी महिमा

महाराज युधिष्ठिरने पूछा—देवकीनन्दन! अब आप प्रपा (पौंसला)-दानके माहात्म्यको बतलायें। किस समय और किस विधिसे यह दान होता है? उसके दानका क्या फल है, आप इन सबका वर्णन कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके आरम्भमें ब्राह्मणद्वारा उत्तम मुहूर्तकी जानकारी कर नगरके मध्यमें, रास्तेके किनारे, देवालयमें, चैत्य (पीपल या गाँवके किसी प्रसिद्ध)-वृक्षके नीचे अथवा निर्जल स्थानमें या वनमें घनी और शीतल छायायुक्त एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपके बीचमें गीले वस्त्रसे ढककर शीतल जलसे भरे हुए बड़े-बड़े मटके रखने चाहिये। जलपात्र भी रखे। सुशील और गृहस्थ ब्राह्मणको नियुक्त करे, जो निरन्तर थके-प्यासे लोगोंको जल पिलाता रहे। उस ब्राह्मणके निर्वाहयोग्य जीविकाकी व्यवस्थाकर द्रव्य, अन्न आदि जो भी वह चाहे उसे देना चाहिये। इस प्रकार उत्तम मुहूर्तमें प्रपा बनाकर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर इस मन्त्रको पढ़कर प्रपाका दान करना चाहिये—

प्रपेयं सर्वसामान्या भूतेभ्यः प्रतिपादिता ॥

अस्याः प्रदानात् पितरस्तुष्यन्तु च पितामहाः।

(उत्तरपर्व १७२।१-१०)

‘इस प्रपाको मैंने सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये बनवाया है, इसके दान करनेसे मेरे पितर तुम हो जायें।’ उस दिनसे लेकर चार मासतक निरन्तर जल

पिलाना चाहिये और यथाशक्ति अन्न भी देना चाहिये। सुगन्ध, शीतल, उत्तम सुस्वादु जल उत्तम पात्रमें रखकर सबको पिलाना चाहिये और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी नित्य कराना चाहिये।

इस विधिसे जो व्यक्ति ग्रीष्म-ऋतुमें जलदान करता है, वह सभी तीर्थों और सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है तथा देवताओंद्वारा पूजित होता है। वह पूर्णचन्द्रके समान दिव्य कुम्भाकार विमानमें बैठकर स्वर्गमें जाता है, बीस करोड़ वर्षपर्यन्त वहाँ सुख भोगता है और यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि सब उसकी सेवामें तत्पर रहते हैं। पुनः भूमिपर जन्म लेकर चारों वेदोंका मर्मज्ञ ब्राह्मण होता है और उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। प्रपादान करनेका सामर्थ्य न हो तो ग्रीष्मकालमें शीतल जलसे पूर्ण धर्मघट प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घर देना चाहिये और प्रतिमास उसका उद्यापन करना चाहिये। अनेक प्रकारके पक्वान्न और वस्त्र, दक्षिणादिसे युक्त उस धर्मघटका दान करना चाहिये। वह घट ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकरस्वरूप कहा गया है। इस रूपमें उस घटकी इस प्रकार प्रार्थना करे—

एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः।

अस्य प्रदानात् सफलता मम सन्तु मनोरथाः ॥

(उत्तरपर्व १७२।२१)

इस मन्त्रको पढ़कर ब्राह्मणको जलपूर्ण घट देना चाहिये। इस विधिसे जो धर्मघटका दान करता है, वह प्रपादानका फल प्राप्त कर लेता है। यदि

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth