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भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 654 में से

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पृष्ठ 603

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जा सकता। स्थाली! तुम सिद्धि चाहनेवालोंके लिये सिद्धि तथा पुष्टि चाहनेवालोंके लिये पुष्टिस्वरूप हो। मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। मेरी बातको सत्य करो। मेरे ज्ञातिवर्ग, सुहृद्वर्ग, बन्धुवर्ग तथा भृत्यवर्ग आदि जबतक भोजन न कर लें, तबतक तुममें-से भोजन घटे नहीं—ऐसा वर प्रदान करो।

यह मन्त्र पढ़कर वह पात्र द्विजश्रेष्ठको दान कर दे। यह दान रविवार, संक्रान्ति, चतुर्दशी, अष्टमी, एकादशी अथवा तृतीयाको करना चाहिये। वसिष्ठजीका यह उपदेश मानकर वह ब्राह्मणी नित्य ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित स्थालीपात्र देने लगी। पार्थ! उसी पुण्यके प्रभावसे जन्मान्तरमें वही ब्राह्मणी द्रौपदीरूपमें तुम्हारी भार्या हुई है और दान देनेमें द्रौपदीका हाथ कभी शून्य नहीं रहेगा; क्योंकि यह द्रौपदी, सती, शची, स्वाहा, सावित्री, भू, अरुन्धती तथा लक्ष्मीके रूपमें जहाँ

रह रही हो, वहाँ फिर कौन-सा पदार्थ दुर्लभ हो सकता है। इतना कहकर मैत्रेयमुनिने कहा कि महाराज युधिष्ठिर! यह द्रौपदी अपनी स्थालीसे अन्न दे तो सम्पूर्ण जगत्को तृप्त कर सकती है, फिर इन थोड़े-से ब्राह्मणोंके भोजन आदिके विषयमें आप क्यों चिन्तित होते हैं?

मैत्रेयजीका ऐसा वचन सुनकर भगवान्! हमलोगोंने भी वैसा ही किया और सभी परिजनोंके साथ ब्राह्मणोंको नित्य भोजन कराने लगे। प्रभो! अन्नदानके प्रसंगसे यह स्थालीदानकी विधि मैंने कही, इसलिये आप मेरी धृष्टताको क्षमा करें। जो व्यक्ति सुन्दर ताम्रकी स्थाली बनाकर चावलोंसे उसे भरकर पर्व-दिनमें इस विधिसे ब्राह्मणको देता है, उसके घर सुहृद्, सम्बन्धी, बान्धव, मित्र, भृत्य और अतिथि नित्य भोजन करें तो भी भोजनकी कमी नहीं होती। (अध्याय १७०)

दासीदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं भक्ति और स्नेहसे दासीदानकी विधि बता रहा हूँ। चारों आश्रमोंमें गृहस्थ आश्रम श्रेष्ठ है। इसमें गृह ही मुख्य है, गृहमें भी गृहिणीकी प्रधानता है। वह स्त्री भी यदि शील तथा विनय आदिसे सम्पन्न और सदाचारिणी हो तो फिर क्या कहना? जिस घरमें स्त्रियोंका आदर-सत्कार होता है, वहाँ देवगण आनन्दमग्न होकर निवास करते हैं और जहाँ इनका अनादर होता है, वह घर नष्ट हो जाता है। अपमानित नारी जिस घरको शाप देती है, वह घर मानो कृत्याके द्वारा शीघ्र ही पराभवको प्राप्त हो जाता है*। सदाचारिणी श्रेष्ठ

स्त्रीको कोई पुण्यवान् ही प्राप्त करता है। जिस घरमें सुवर्ण, श्रेष्ठ दासी, अन्न, बालक और दही, दूध आदि गव्य पदार्थ न हों, उस घरको साक्षात् नरक ही जानना चाहिये। अधिपतिके बिना गाँव, दासीके बिना घर और घीके बिना भोजन—ये तीनों व्यर्थ हैं। जिस घरमें दासियाँ सत्कृत होती हों, वहाँ साक्षात् कमलहस्ता लक्ष्मीका वास होता है। जिस घरमें शौच, आचार, व्यवहार शुद्ध हो, दास-दासियोंका भलीभाँति पोषण होता हो, उस घरमें लक्ष्मी निवास करती हैं। जिसकी बुद्धि धर्ममें लगी हुई है, उसका चित्त कभी आकुल नहीं होता। जिस घरमें भार्या गृहस्थ-व्यवहारमें

  • जामयो यत्र पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते विनश्यत्याशु तद् गृहम् ॥

जामयो यानि गैहानि शपन्त्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव सद्यो यानि पराभवम् ॥ (उत्तरपर्व १७१।४-५)

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