भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- उत्तरपर्व *
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कुशल हो, दासियों अपने-अपने काममें तत्पर हों और सेवक सदा उद्यमी हों, उस घरमें धर्म, अर्थ एवं कामका निवास होता है। वेदोंमें कहा गया है कि जो स्वयंको प्रिय हों, उन पदार्थोंका
दान देना चाहिये। इस बातका विचारकर पर्वकाल, सौम्यग्रहयुक्त स्थिर नक्षत्रोंमें श्रेष्ठ दासीका ब्राह्मणको दान करना चाहिये। दासी-दान करनेवाला अप्सरालोकमें निवास करता है। (अध्याय १७१)
प्रपा (पौंसला) और अग्नीष्टिका (अँगीठी)-दानकी महिमा
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—देवकीनन्दन! अब आप प्रपा (पौंसला)-दानके माहात्म्यको बतलायें। किस समय और किस विधिसे यह दान होता है? उसके दानका क्या फल है, आप इन सबका वर्णन कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! चैत्र मासके आरम्भमें ब्राह्मणद्वारा उत्तम मुहूर्तकी जानकारी कर नगरके मध्यमें, रास्तेके किनारे, देवालयमें, चैत्य (पीपल या गाँवके किसी प्रसिद्ध)-वृक्षके नीचे अथवा निर्जल स्थानमें या वनमें घनी और शीतल छायायुक्त एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डपके बीचमें गीले वस्त्रसे ढककर शीतल जलसे भरे हुए बड़े-बड़े मटके रखने चाहिये। जलपात्र भी रखे। सुशील और गृहस्थ ब्राह्मणको नियुक्त करे, जो निरन्तर थके-प्यासे लोगोंको जल पिलाता रहे। उस ब्राह्मणके निर्वाहयोग्य जीविकाकी व्यवस्थाकर द्रव्य, अन्न आदि जो भी वह चाहे उसे देना चाहिये। इस प्रकार उत्तम मुहूर्तमें प्रपा बनाकर यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन कराना चाहिये। तदनन्तर इस मन्त्रको पढ़कर प्रपाका दान करना चाहिये—
प्रपेयं सर्वसामान्या भूतेभ्यः प्रतिपादिता ॥
अस्याः प्रदानात् पितरस्तुष्यन्तु च पितामहाः।
(उत्तरपर्व १७२।१-१०)
‘इस प्रपाको मैंने सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये बनवाया है, इसके दान करनेसे मेरे पितर तुम हो जायें।’ उस दिनसे लेकर चार मासतक निरन्तर जल
पिलाना चाहिये और यथाशक्ति अन्न भी देना चाहिये। सुगन्ध, शीतल, उत्तम सुस्वादु जल उत्तम पात्रमें रखकर सबको पिलाना चाहिये और यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी नित्य कराना चाहिये।
इस विधिसे जो व्यक्ति ग्रीष्म-ऋतुमें जलदान करता है, वह सभी तीर्थों और सभी दानोंका फल प्राप्त कर लेता है तथा देवताओंद्वारा पूजित होता है। वह पूर्णचन्द्रके समान दिव्य कुम्भाकार विमानमें बैठकर स्वर्गमें जाता है, बीस करोड़ वर्षपर्यन्त वहाँ सुख भोगता है और यक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि सब उसकी सेवामें तत्पर रहते हैं। पुनः भूमिपर जन्म लेकर चारों वेदोंका मर्मज्ञ ब्राह्मण होता है और उत्तम कर्मोंके अनुष्ठानसे मुक्ति प्राप्त कर लेता है। प्रपादान करनेका सामर्थ्य न हो तो ग्रीष्मकालमें शीतल जलसे पूर्ण धर्मघट प्रतिदिन ब्राह्मणोंके घर देना चाहिये और प्रतिमास उसका उद्यापन करना चाहिये। अनेक प्रकारके पक्वान्न और वस्त्र, दक्षिणादिसे युक्त उस धर्मघटका दान करना चाहिये। वह घट ब्रह्मा, विष्णु एवं शंकरस्वरूप कहा गया है। इस रूपमें उस घटकी इस प्रकार प्रार्थना करे—
एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः।
अस्य प्रदानात् सफलता मम सन्तु मनोरथाः ॥
(उत्तरपर्व १७२।२१)
इस मन्त्रको पढ़कर ब्राह्मणको जलपूर्ण घट देना चाहिये। इस विधिसे जो धर्मघटका दान करता है, वह प्रपादानका फल प्राप्त कर लेता है। यदि
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
धर्मघट भी न दे सके तो उसे चाहिये कि ग्रीष्ममें चार मास नित्य पीपल वृक्षका सेवन करे और 'अश्वत्थरूपी भगवान् प्रीयतां मे जनार्दनः' ऐसा कहकर प्रदक्षिणापूर्वक अश्वत्थको नमस्कार करना चाहिये। अश्वत्थ-सेवनसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और उसे प्रपादानका फल प्राप्त हो जाता है।
भगवन्! इसी प्रकार शीतकालमें दयालु व्यक्तिको अग्नीष्टिका अर्थात् अँगीठीका दान करना चाहिये।
मार्गशीर्ष मासके आरम्भमें उत्तम मुहूर्त देखकर देवालय, मठ, घर अथवा बड़े चौराहेपर सार्य-प्रातः बहुत-सा सूखा काष्ठ एकत्रकर अग्नि प्रज्वलित कर व्याहतियोंसे हवन करना चाहिये। इस प्रकार शीतकालमें दोनों समय अग्नि जलानी
चाहिये। जिससे दीन, अनाथ, वस्त्रहीन वहाँ अग्निका सेवनकर लाभ प्राप्त कर सकें। यदि कोई भूखा हो तो उसको भोजन भी देना चाहिये। आग तापते समय परस्पर भगवच्चर्चा आदि करते रहना चाहिये। इससे महान् पुण्य होता है। यदि स्वेच्छासे कोई राजचर्चा तथा जनचर्चा आदि परोपकारकी बातें करे तो रोकना नहीं चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति अग्नीष्टिकाका दान करता है, वह सूर्यके समान दिव्य विमानमें बैठकर ब्रह्मलोक जाता है। वहाँ वह छाछठ हजार वर्षतक सुख भोगकर पुनः यहाँ जन्म लेता है और चतुर्दिवेता, याज्ञिक, नीरोग, धनवान् और तेजस्वी ब्राह्मण होता है। (अध्याय १७२-१७३)
विद्यादानकी महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अनेक प्रकारके गोदान और भूमिदानकी विधि एवं माहात्म्य आदि सुननेके बाद अब मैं विद्यादानकी महिमा सुनना चाहता हूँ, उसे आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! जिस प्रकार विद्याका दान करना चाहिये तथा उससे जो फल प्राप्त होता है, उसका मैं वर्णन कर रहा हूँ—
शुभ मुहूर्तमें स्वस्तिक, फूलमालासे भूषित एक चौकोर मण्डल बनाकर उसके मध्यमें पुस्तकको स्थापित कर गन्ध, अक्षत, पुष्प आदिसे उसका पूजन करे। लेखकका पूजनकर सुवर्णकी लेखनी और चाँदीका मसिपात्र (दावात) बनाकर लेखकको देना चाहिये। लेखकको सुशील और अप्रमत्त होना चाहिये। अनन्तर लेखक पुस्तक लिखना आरम्भ करे। उसे एकाग्रचित्त होकर मात्रा, अनुस्वार, संयुक्त अक्षरोंको साफ-साफ और पर्दाको अलग-अलग लिखना चाहिये। अक्षर गोल-गोल सुन्दर,
एक समान और शीर्षरेखायुक्त हों। इस विधिसे शिवभक्तिपरक या विष्णुभक्तिपरक पुराण, आगम, धर्मशास्त्र आदि लिखवाकर अन्तमें वस्त्र और आभूषण आदिसे लेखकका पूजन करनेके बाद उस पुस्तकको दो वस्त्रोंसे आवेष्टित कर दक्षिणासहित व्युत्पन्नमति, प्रियंवद और उत्तम वाचक ब्राह्मणको अथवा सबके कल्याणके लिये मठ, मन्दिर या सामान्य गृह आदिमें स्थापित करे*। इस विधिसे जो व्यक्ति पुस्तकदान करता है, वह यज्ञ और तीर्थयात्रा करनेसे भी कोटिगुना अधिक फल प्राप्त करता है। एक हजार कपिला गायका विधिपूर्वक दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, वह एक पुस्तकके दान करनेसे हो जाता है। फिर पुराण, रामायण और महाभारत, गीता आदि पवित्र ग्रन्थोंके दान करनेसे जो फल प्राप्त होता है, उसका वर्णन कौन कर सकता है?
प्रातःकाल उठकर जो अपने शिष्योंको वेदादि
- वस्त्रयुग्मेन संवीतं पुस्तकं प्रतिपादयेत्। सामान्यं सर्वलोकानां स्थापयेदथ वा मठे ॥ (उत्तरपर्व १७४।११)
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- उत्तरपर्व *
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शास्त्रों तथा नृत्य, गीत-कलाओंको पढ़ाता है, उसके समान पुण्यात्मा कौन है ? जो पढ़ानेवालेको वृत्ति देकर विद्यार्थियोंको पढ़वाता है, उसने कौन-सा दान नहीं किया ? विद्यार्थियोंको भोजन, वस्त्र, भिक्षा एवं पुस्तक आदि देनेसे मनुष्योंके सभी मनोरथ निःसंदेह सिद्ध होते हैं। वह विवेकवान्, दीर्घजीवी होता है तथा धर्म, अर्थ, काम आदि सब कुछ प्राप्त कर लेता है। राजन् ! जो भी व्यक्ति शास्त्रविद्या, शस्त्रविद्या, चॉसठ कलाई, ज्ञान-विज्ञान आदिको सीखना चाहता है, उसकी यथाशक्ति सहायता करनी चाहिये और उसके उपकारके लिये सदा तत्पर रहना चाहिये१; क्योंकि उससे पारमार्थिक लाभ होता है। हजार वाजपेय-यज्ञ करनेसे जो
फल प्राप्त होता है, वही फल सद्भिद्यादानसे प्राप्त हो जाता है। शिव, विष्णु, अथवा सूर्यके मन्दिरोंमें जो व्यक्ति प्रतिदिन पुराण आदिके वाचनकी व्यवस्था करवाता है, वह प्रतिदिन गौ, भूमि, सुवर्ण और वस्त्रके दानका फल प्राप्त करता है। विद्याहीन व्यक्ति धर्म तथा अधर्मका निर्णय नहीं कर सकता, इसलिये सदा विद्यादानमें तत्पर रहना चाहिये। ब्रह्मा आदि सभी देवता विद्यादानमें प्रतिष्ठित रहते हैं। विद्यादान करनेवाला व्यक्ति एक कल्पतक विष्णुलोकमें पूजित होता है और पुनः भूलोकमें जन्म लेकर दाता, भोगी, रूपसौभाग्ययुक्त, दीर्घायु, नीरोग और पुत्र-पौत्रयुक्त धर्मात्मा राजा होता है२। (अध्याय १७४)
तुलापुरुषदानकी विधि३
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महारज ! पूर्वकालमें स्वायम्भुव मनुके पुत्र प्रियव्रत नामके एक बड़े प्रतापी और धर्मात्मा राजा हो गये हैं। उन्होंने तीस हजार वर्षतक धर्मपूर्वक राज्य किया और पृथ्वीको सात द्वीपोंमें बाँटकर उनमें अपने सातों पुत्रोंको प्रतिष्ठित कर दिया। तदनन्तर वे विषयोंसे विरत होकर तप करनेके लिये वनमें चले गये। राजा प्रियव्रतको तपोवनमें आया जानकर बड़े-बड़े महात्मा, तपस्वी और मुनिगण राजाका दर्शन करनेकी इच्छासे उनके पास आये। राजाने भी पाद्य, अर्घ्य और आचमन आदिसे उनका पूजन किया तथा मधुर वाणीसे कुशल-क्षेम पूछकर बैठनेके लिये आसन
दिया। उसी समय सूर्यके समान देदीप्यमान ब्रह्माजीके पुत्र पुलस्त्यमुनिने वहाँ पदार्पण किया। पुलस्त्यजीको आये देखकर राजासहित सभी मुनि उठ खड़े हुए और उन्होंने अतीव सत्कारपूर्वक आसन देकर पाद्यादिसे पूजन किया। तदनन्तर सभी लोग सुखपूर्वक आसनपर बैठ गये। फिर शास्त्र-चर्चा होने लगी।
इसी प्रसंगमें मुनियोंने संसारके कल्याणकी कामनासे पुलस्त्यमुनिसे पूछा—‘मुनिसत्तम ! पुरुष और स्त्रियोंको किस दान, व्रत, नियम आदिसे सद्गति प्राप्त होती है। आप उनका वर्णन करें। आपके मुखसे मधुर वचन सुननेकी अभिलाषा हमलोगोंसहित राजा प्रियव्रतको भी है।’
१-शास्त्रं शस्त्रकलाशिल्पं यो यदिच्छेदुपाजितुम्। तस्योपकारकरणे पार्थ कार्यं सदा मनः ॥ (उत्तरपर्व १७४। २०)
२-प्राचीन भारतके विद्यादान और प्रचारमें भगवान् शिव-विष्णुकी भक्ति, सदाचार और परोपकार आदि प्राण थे। यह इस अध्यायसे तथा दानसागर, दानकल्पतरु आदि निबन्ध-ग्रन्थोंसे भी स्पष्ट है। इससे भगवत्प्राप्ति कर प्राणी कृतार्थ हो जाते थे। पर आजके शिक्षालय प्रायः ठीक इसके विपरीत हैं। उनमें धर्म, सदाचारका कोई स्थान नहीं है। धार्मिक शिक्षा विद्यालयोंसे बहिष्कृत हो गयी है और जब शासन ही धर्मनिरपेक्ष है तो कहना ही क्या ?
३-यह प्रकरण मत्स्यपुराणके २७४वें अध्यायमें प्रायः इसी प्रकार प्राप्त होता है। इसीके साथ-साथ वहाँ षोडश महादानका भी वर्णन हुआ है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
पुलस्त्यमुनिने कहा—मुनीश्वरो ! मैं सभी दानोंमें उत्तम, सुगुप्त और सर्वपापहारी तुलादानकी विधि बता रहा हूँ। जिसके करनेसे स्त्री अथवा पुरुष ब्रह्महत्या, गोहत्या, पितृहत्या, गुरुपलीगमन, कूटसाक्ष्य (झूठी गवाही) आदि अनेक पापोंसे छूटकर विशुद्ध-शरीर हो जाता है। यदि मनुष्यको ब्रह्मलोक-प्राप्तिकी इच्छा है तो वह कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत तथा तुलापुरुषदान करे। मुनियो ! कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रत वनवासी ब्राह्मणों, भिक्षुओं और विधवा नारियोंके लिये कहे गये हैं, ये व्रत शरीरको कष्ट देनेसे ही सिद्ध होते हैं। राजा, धनवान्, गृहस्थ इस कृच्छ्रसाध्य धर्मको नहीं सम्पादित कर सकते। धन मानो मनुष्योंका बाहर रहनेवाला प्राण ही है। इसलिये धनवान् व्यक्तियोंको इन्हें धर्ममें लगाकर सार्थक बनाना चाहिये। संसारमें सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाला, सभी द्रव्योंमें श्रेष्ठ स्वर्ण है, यह देवताओंके प्रधान अग्निदेवका ही पुत्र है। विद्वान् व्यक्तिको चाहिये कि उस स्वर्णसे अपनेको तौल ले फिर उसके दानसे सभी पाप दूर हो जाते हैं और दिव्य शरीरकी प्राप्ति होती है। महाराज ! इस प्रकार पुलस्त्यमुनिने ऋषियों और राजा प्रियव्रतसे तुलादानके माहात्म्यको बतलाया। वही विधि ऋषियोंने मुझसे कही और मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सावधान होकर सुनें।
व्यतीपात, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण, ग्रहपीडा होनेपर, दुःस्वप्न देखनेपर, कार्तिकी अथवा माघी पूर्णिमा आदि पर्वके दिनोंमें या जब पर्याप्त धन उपलब्ध हो, उस समय तुलापुरुषदान करना चाहिये। मनुष्यको निरन्तर यही विचार करना चाहिये कि जीवन अनित्य है, सम्पत्ति
अत्यन्त चञ्चल है, मृत्युने केशोंको पकड़ रखा है, शरीरका कब अन्त हो जाय, यह निश्चित नहीं है, अतः सदा धर्माचरण ही करना चाहिये। इसलिये जब भी श्रद्धा हो, उसी समय दान आदि करना चाहिये, वही दान देनेका उचित समय है। श्रद्धासे ही फल होता है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा अपने घरमें दान करना चाहिये। अपने घरके अथवा देवालयके प्राङ्गणमें सोलह हाथ लम्बे-चौड़े पताका आदिसे सुसज्जित एक सुन्दर मण्डपकी रचनाकर उसके बीचमें सात हाथ लम्बी-चौड़ी और एक हाथ ऊँची चौरस वेदी बनाये। फिर उसके मध्यमें विधिपूर्वक दिव्य तुलाको स्थापित करे। दो स्तम्भोंको जो चार हाथ ऊँचे हों, दो हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसमें सुदृढ़ कर दे। चन्दन, खदिर, बिल्व, शाल, इंगुदी, तिलुदक, देवदारु और श्रीपर्ण—इन आठ वृक्षोंमेंसे किसी भी वृक्षके लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये अथवा किसी मजबूत काष्ठवाले याज्ञिक वृक्षकी लकड़ीका स्तम्भ बनाना चाहिये। स्तम्भके ऊपर उसी काष्ठका चार हाथ लम्बा एक तिरछा काष्ठ रखकर उसमें छानबे अङ्गुल लम्बी लौह-शुद्धला लगानी चाहिये। उसमें लोहेके दो पलड़े भी बनाने चाहिये। मध्यमें तुलापुरुषकी प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करे। इस प्रकारकी तुलाको रत्न, वस्त्र, आभूषण, चन्दन तथा पुष्पमाला आदिसे अलंकृत करे।
तीन मेखला और योनिसे युक्त हस्तप्रमाणवाले चार कुण्ड बनाकर ईशानकोणमें एक हाथ लम्बी-चौड़ी वेदी बनाये। उसके ऊपर ग्रह और दिक्पालोंका पूजन करे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप,
१-यदेतद् द्रविणं नाम प्राणाक्षैते बहिश्चराः ॥ तस्माद् बहिश्चरैः प्राणैरात्मा योज्यः सदा वृष्टैः । (उत्तरपर्व १७५।११-२०)
२-यदा वा जायते वित्तं तदा देयमिदं भवेत्। अनित्यं जीवितं यस्माद्वसुश्रातीव चञ्चलम् ॥
केशेषु च गृहीतः सन्मृत्युना धर्ममाचरेत् । (उत्तरपर्व १७५।२७-२८)
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- उत्तरपर्व *
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अक्षत, चन्दन, फल और वस्त्रादिसे ब्रह्मा, विष्णु तथा शंकरका पूजन करे। क्षीर-वृक्षके पत्तोसे तोरण बनाये और मण्डपके चारों द्वारोंपर पुष्पमाला तथा पल्लव आदिसे सुशोभित कलशोंको सप्तधान्यके ऊपर स्थापित करे। ऋग्वेद जाननेवाले दो ब्राह्मणोंको पूर्व कुण्डपर, यजुर्वेदके ज्ञाता दो ब्राह्मणोंको दक्षिण कुण्डपर, सामवेदके जाननेवाले दो ब्राह्मणोंको पश्चिम कुण्डपर और अथर्ववेदी दो ब्राह्मणोंको उत्तर दिशाके कुण्डपर हवनके लिये नियुक्त करे। इनके अतिरिक्त एक नवें धर्मोपदेशक ब्राह्मणका भी वरण करे। कुछ ऋषियोंका मत है कि सोलह ऋत्विक् हवनके लिये नियुक्त करने चाहिये। वरणके समय प्रत्येक ऋत्विक्को दो ताम्रपात्र और एक आसन दे। तिल, घी, समिधा, विष्टर, पुष्प, कुश, स्तुक् तथा स्तुव आदि सभी हवनकी सामग्रियोंको एकत्रित कर लोकपालोंके रंगकी पताका उनकी दिशामें लगानी चाहिये और बीचमें महाध्वज खड़ा करना चाहिये तथा पाँच रंगोंवाला वितान भी बाँधना चाहिये।
इस प्रकार सभी सामग्रियोंको सम्पादित कर सभी शिल्पकार्योंमें निपुण शिल्पकार (बर्द्ध) ब्राह्मणोंके साथ बनाये गये उस मण्डपको यजमानको दिखलाये। यज्ञकी रक्षाके लिये यजमान ज्ञानकर श्वेत वस्त्र पहनकर इन्द्रादि दिक्पालोंका आवाहन करे तथा उन्हें बलि प्रदान करे और प्रार्थना करे। उस समय अनेक प्रकारके शङ्ख-तूर्य आदि वाद्य बजते रहें और मङ्गल-वेदध्वनि होती रहे। आवाहन आदिके मन्त्रोंका भावार्थ इस प्रकार है—
‘इन्द्रदेव! आप देवताओंके स्वामी और व्रज धारण करनेवाले हैं, सभी अमर, सिद्ध और साध्य आपकी स्तुति करते हैं तथा अप्सराओंके समूह आपपर पंखा झलते हैं। आप यहाँ पधारिये और हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। इन्द्रदेवताको
नमस्कार है। ऐसा कहकर इन्द्रका आवाहन करना चाहिये। अग्निदेव! आप सभी देवताओंके हव्यवाहक हैं, मुनिवरगण सब ओरसे आपकी सेवा करते हैं, आप अपने तेजस्वी लोकगणोंके साथ यहाँ आयें और मेरे यज्ञकी रक्षा करें, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर अग्निदेवका आवाहन करना चाहिये। सूर्यपुत्र धर्मराज! आप सभी देवताओंद्वारा पूजित, दिव्य शरीरधारी और शुभ एवं अशुभ तथा आनन्द एवं यज्ञके अधीश्वर हैं, हमारे कल्याणके लिये हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर यमका आवाहन करना चाहिये। निर्वृतिदेव! आप लोकोंके अधीश्वर तथा राक्षससमूहके नायक हैं। पिशाचनाथ! आप वैतालों और पिशाचोंके विशाल समूहके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर निर्वृतिका आवाहन करना चाहिये। वरुणदेव! विद्याधर और इन्द्र आदि देवता आपका गुण-गान करते हैं, आप समस्त जलचरों, समुद्रों, बादलों एवं अप्सराओंके साथ यहाँ आइये तथा हमारी रक्षा कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वरुणका आवाहन करना चाहिये। वायुदेव! आप कालाग्निके सहायक और प्राणोंके अधीश्वर हैं, आप मृगपर आरूढ़ हो सिद्ध-समूहोंके साथ मेरी रक्षा करनेके लिये यज्ञमें पधारिये तथा मेरी पूजा स्वीकार कीजिये। आपको नमस्कार है। ऐसा कहकर वायुका आवाहन करना चाहिये। सोमदेव! आप नक्षत्रगणों, सभी ओषधियों तथा पितरोंके साथ यहाँ आइये और मेरे यज्ञकी रक्षा कीजिये। भगवन्! आप मेरी पूजा स्वीकार कीजिये, आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर सोमका आवाहन करना चाहिये। सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी विश्वेश्वर! विश्वमूर्ति! ईशानदेव! आप त्रिशूल, कपाल, खट्वाङ्ग धारण करनेवाले अपने गणोंके साथ हमारे यज्ञमें
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
सिद्धि प्रदान करनेके लिये उपस्थित होइये और लोकेश! मेरी पूजा ग्रहण कीजिये। भगवन्! आपको अभिवादन है। ऐसा कहकर ईशानका आवाहन करना चाहिये। अनन्तदेव! आप पाताल एवं पृथ्वीको धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ हैं तथा नागपत्नियों और किंनर आपका गुणगान करते हैं। आप यक्षों, नागेन्द्रों और देवगणोंके साथ यहाँ आइये तथा हमारे यज्ञकी रक्षा कीजिये। ऐसा कहकर अनन्तका आवाहन करना चाहिये। विश्वाधिपते! आप समस्त जगत्के विधाता हैं। मुनीन्द्र! आप पितर, देवता एवं लोकपालोंके साथ यहाँ पधारिये। पितामह ब्रह्मन्! आप कल्याण करनेके लिये हमारे यज्ञमें प्रविष्ट होइये। भगवन्! आपको प्रणाम है। ऐसा कहकर ब्रह्माका आवाहन करना चाहिये। त्रिलोकियों जितने स्थावर-जंगम प्राणी हैं, वे सभी ब्रह्मा, विष्णु और शिवके साथ मेरी रक्षा करें। देवता, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, सर्प, ऋषिगण, मनु, गौर्ण, देवमाताएँ—ये सभी हर्षपूर्वक मेरे यज्ञकी रक्षा करें।'
इस प्रकार देवताओंका आवाहन कर ऋत्विजोंको सुवर्णका आभूषण, कुण्डल, जंजीर, कङ्कण, पवित्र अँगूठी, वस्त्र तथा शय्याका दान करना चाहिये। गुरुको ये आभूषण और वस्त्र दूना देना चाहिये। सर्वप्रथम आधार और आज्यभागसे हवन करे। जिन ग्रहों, लोकपालों तथा देवताओंकी प्रतिष्ठा की जाय, सबके तत्तद् मन्त्रोंसे हवन करना चाहिये। तत्पश्चात् माङ्गलिक शब्दोंका उच्चारण करते हुए वेदज्ञोंद्वारा अभिषिक्त यजमान श्वेत वस्त्र धारणकर अङ्गलियोंमें पुष्प ले उस तुलाकी तीन बार प्रदक्षिणा कर उसे इस प्रकार अभिमन्त्रित करे—
नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमास्थिता ॥
साक्षिभूता जगद्वात्रि निर्मिता विश्वयोनिना ।
एकतः सर्वसत्यानि तथानृतशतानि च ॥
धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते। त्वं तुले सर्वभूतानां प्रमाणमिह कीर्तिता ॥ मां तोलयन्ती संसारादुद्भरस्व नमोऽस्तु ते। योऽसी तत्त्वाधिपो देवः पुरुषः पञ्चविंशकः ॥ स एकोऽधिष्ठितो देवि त्वयि तस्मान्नमो नमः। नमो नमस्ते गोविन्द तुलापुरुषसंज्ञक ॥ त्वं हरे तारयस्वास्मानस्मात् संसारसागरात्।
(उत्तरपर्व १७५।७१—७६)
'तुले! तुम सभी देवताओंकी शक्तिस्वरूपा हो, तुम्हें नमस्कार है। हे जगद्वात्रि! तुम सत्यकी आश्रयभूता, साक्षिस्वरूपा और विश्वयोनि ब्रह्माद्वारा निर्मित की गयी हो, जगत्की कल्याणकारिणी! तुम्हारी एक तुलापर सभी सत्य हैं, दूसरीपर सौ असत्य हैं। धर्मात्मा और पापियोंके बीच तुम्हारी स्थापना हुई है। तुम भूतलपर सभी जीवोंके लिये प्रमाणरूप बतलायी गयी हो। मुझे तोलती हुई तुम इस संसारसे मेरा उद्धार कर दो, तुम्हें नमस्कार है। देवि! जो ये तत्त्वोंके अधीश्वर पचीसवें पुरुष भगवान् हैं, वे एकमात्र तुम्हींमें अधिष्ठित हैं, इसलिये तुम्हें बारम्बार प्रणाम है। तुलापुरुषरूप गोविन्द! आपको बारम्बार अभिवादन है। हरे! आप इस संसाररूपी सागरसे हमारा उद्धार करें।'
इस प्रकार बुद्धिमान् पुरुष पुण्यकालमें अधिवासन कर भक्तिपूर्वक प्रणाम कर तुलापर आरोहण करे। उस समय वह खड्ग, ढाल, कवच एवं सभी आभरणोंसे अलंकृत रहे। वह सुवर्णनिर्मित सूर्यसहित धर्मराजको बँधी हुई मुट्ठीवाले दोनों हाथोंसे पकड़कर विष्णुके मुखकी ओर देखता हुआ स्थित रहे।
तदनन्तर ब्राह्मणोंको चाहिये कि वे तुलाकी दूसरी ओर यजमानकी तोलसे कुछ अधिक अत्यन्त निर्मल स्वर्ण रखें। पुष्टिकामी श्रेष्ठ मनुष्य जबतक स्वर्णकी तुला भूमिपर स्पर्श न कर ले,
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- उत्तरपर्व *
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तबतक स्वर्ण रखे। फिर क्षणमात्र चुप रहकर इस प्रकार निवेदन करे—
नमस्ते सर्वभूतानां साक्षिभूते सनातने। पितामहेन देवि त्वं निर्मिता परमेष्ठिना॥ त्वया धृतं जगत्सर्वं सहस्थावरजंगमम्। सर्वभूतात्मभूतस्थे नमस्ते विश्वधारिणि॥
(उत्तरपर्व १७५।८१-८२)
‘सभी जीवोंकी साक्षिभूता सनातनी देवि! तुम पितामह ब्रह्माद्वारा निर्मित हुई हो, तुम्हें नमस्कार है। तुले! तुम समस्त स्थावर-जंगमरूप जगत्को धारण करनेवाली हो, सभी जीवोंको आत्मभूत करनेवाली विश्वधारिणि! तुम्हें नमस्कार है।’
तत्पश्चात् तुलासे उतरकर स्वर्णका आधा भाग पहले गुरुको देना चाहिये एवं बचे हुए आधे भागको हाथमें जल लेकर संकल्पपूर्वक ऋत्विजोंको दे देना चाहिये। पुनः उनकी आज्ञा लेकर अन्य ब्राह्मणोंको भी दान दे। विशेषतया दीनों एवं अनार्थोंको भी ब्राह्मणोंके साथ दान देना चाहिये। बुद्धिमान् पुरुष उस तोले गये स्वर्णको अधिक देरतक अपने घरमें न रखे। क्योंकि यदि वह घरमें रह जाता है तो मनुष्योंको भय देनेवाला,
शोक और व्याधिको बढ़ानेवाला होता है, उसे शीघ्र ही दूसरेको दे देनेसे मनुष्य श्रेयका भागी हो जाता है।
इसी विधिसे चाँदी और कपूरसे भी तुलादान किया जाता है। सौभाग्यकी इच्छा रखनेवाली स्त्रीको कृष्ण पक्षकी तृतीयाको कुंकुम, लवण और गुड़का तुलादान करना चाहिये। इसमें मन्त्र और हवनकी अपेक्षा नहीं रहती। इस विधिसे जो स्त्री अथवा पुरुष तुलादान करते हैं, वे श्रेष्ठ सुन्दर विमानमें बैठकर सूर्यलोकको जाते हैं। वहाँ एक कल्पतक निवासकर वह विष्णुलोक, शिवलोक, विश्वेदेवलोक, इन्द्रलोक, धर्मराजलोक, वरुणलोक, कुबेरलोक आदिमें अनेकों कल्पोंतक निवासकर पुनः मनुष्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा, दानी और शत्रुओंका क्षय करनेवाला राजाका पद प्राप्त करता है। जो व्यक्ति इस महादानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी त्रिविध पापोंसे मुक्त हो जाता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे कोई उत्तम पूजनीय देवता नहीं है, अश्वमेधके समान कोई यज्ञ नहीं, गङ्गाके समान कोई पवित्र नदी नहीं और तुलादानके समान कोई अन्य दान नहीं है। (अध्याय १७५)
हिरण्यगर्भ-दानकी विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! आप किसी ऐसे व्रत अथवा दानकी विधि बतलायें, जिसके करनेसे आयु, यश और ऐश्वर्यकी वृद्धि हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! मैं आपके स्नेहेके वशीभूत होकर संसारका कल्याण करनेकी इच्छासे हिरण्यगर्भ-दानकी विधि बता रहा हूँ, जिसके करनेसे मनुष्य मेरी समताको प्राप्त कर लेता है। राजन्! सुवर्ण अग्निदेवका ज्येष्ठ पुत्र है, वह सभी धातुओंमें श्रेष्ठ और परम पवित्र है।
उसीका दूसरा नाम हिरण्य है। वही जलके गर्भमें प्रविष्ट होकर पृथ्वीपर उत्पन्न हुआ। जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक ब्राह्मणको सुवर्णका दान देता है, वह मेरे तुल्य हो जाता है।
महाराज! अब उसके दानकी विधि सुनिये। किसी पर्वकाल, अयनसंक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहणकाल, व्यतीपात, कार्तिकी पूर्णिमा, जन्मनक्षत्र, ग्रहपीड़ा, दुःस्वप्नदर्शन आदि कालोंमें प्रयाग, नैमिष, कुरुक्षेत्र, अर्बुद, गङ्गा, यमुना, गङ्गासागर-संगम और पुण्य
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६००
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
नदियोंके तटपर हिरण्यगर्भका दान करना चाहिये अथवा घर, देवालय, बाग, तड़ाग आदि पवित्र स्थानोंमें यह दान करना चाहिये। सर्वप्रथम भूमिशोधनकर बारह हाथ लम्बा-चौड़ा एक मण्डप बनाकर उसे स्तम्भ, तोरण, पताका आदिसे अलंकृत करे। मण्डपके बीचमें पाँच हाथकी वेदी बनाकर उसमें वितान लगाकर उसे फूलमाला आदिसे सजा दे। वेदीपर हिरण्यगर्भ-कलशको स्थापित करना चाहिये। सर्वप्रथम वस्त्र तथा आभूषणसे शिल्पीका पूजनकर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कार्य आरम्भ करे। शिल्पी उत्तम सुवर्णसे हिरण्यमय माङ्गलिक कलशकी रचना करे। उसकी ऊँचाई चौंसठ अङ्गुल कही गयी है और मुख ऊँचाईका तीसरा भाग हो। कलशकी पेंदी मुख-परिमापसे आधा रहे। उसकी गोलाई कर्णिकाके समान हो। यह कलश सुन्दर, ग्रन्थिविहीन होना चाहिये। कलशका ढक्कन मुखके परिमापसे एक अङ्गुल अधिक रहे और उसके समीप दस अस्त्र सुवर्णनाल, सूर्यमूर्ति, स्वर्णमय सूची, क्षुर तथा कमण्डलु, छत्र, पादुका आदि सभी सामग्रियोंके साथ ब्रह्माकी मूर्ति स्थापित करनेके बाद वेदध्वनि एवं शङ्ख आदिकी मङ्गलध्वनि करते हुए ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भ-कलशको हाथी अथवा रथसे मण्डपमें ले आये। वहाँ वेदीके ऊपर एक द्रोण तिल रखकर उसपर उसे स्थापित करना चाहिये। उसके बाद हिरण्यगर्भको कुंकुमसे उपलिसकर तथा रेशमी वस्त्रसे ढककर पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे। तदनन्तर धूप, दीप आदिसे उसकी पूजा करे और यह कहकर नमस्कार करे—
भूलोकप्रमुखालोकास्तव गर्भे व्यवस्थिताः ॥
ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते भुवनोद्भव ।
नमस्ते भुवनाधार नमस्ते भुवनेश्वर ॥
नमो हिरण्यगर्भाय गर्भे यस्य पितामहः ।
(उत्तरपर्व १७६ । ३०—३२)
‘भुवनोद्भव ! भूलोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं। अतः विश्वाधार ! विश्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, अतः हिरण्यगर्भको प्रणाम है।’
इस प्रकार पूजा करनेके बाद एक रात्रिक उसका अधिवासन करना चाहिये। वेदीके चारों ओर चौरस चार कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदवेत्ता ब्राह्मण क्रमसे मौन होकर हवन करें। वे ब्राह्मण उत्तम वस्त्र आदिसे अलंकृत हों तथा उनकी गन्ध, धूप आदिसे पूजा कर दो-दो ताम्रपात्र देने चाहिये। वेदीके ईशानकोणमें ग्रहवेदी बनाकर उसपर नवग्रह, दस दिक्पाल और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवकी सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित कर गन्ध, पुष्प, अक्षत तथा वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करे। पताका—तोरण आदिसे मण्डपको अलंकृत करे। मण्डपके द्वारोंपर रत्नयुक्त दो-दो कलश स्थापित कर तुलापुरुषदानकी रीतिसे लोकपालोंका आवाहन कर नैवेद्यादि बलि देनी चाहिये। इस यज्ञमें पलाशकी समिधा हवनके लिये उत्तम होती है। चरु, तिल एवं गायके घृतसे व्याहृति और ग्रहों तथा देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे बीस हजार आहुतियाँ दे। शुभ मुहूर्तमें यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र धारण कर हिरण्यगर्भका पूजन करनेके बाद इस प्रकार प्रार्थना और प्रदक्षिणा करे—
नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः ।
चराचरस्य जगतो गृहभूताय ते नमः ॥
मात्राहं जनितः पूर्व मर्त्यधर्मा सुरोत्तम ।
त्वद्भर्तसम्भवादद्य दिव्यदेहो भवाम्यहम् ॥
(उत्तरपर्व १७६ । ४२-४३)
‘हिरण्यगर्भको नमस्कार है। विश्वगर्भको प्रणाम है। हे चराचरजगत्के गृहभूत ! आपको नमस्कार
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- उत्तरपर्व *
६०१
है। हे सुरोत्तम! पहले मुझे माताने जन्म दिया है। मैं मृत्युधर्मा हूँ, वही मैं आपके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण दिव्य शरीरयुक्त हो जाऊँ।'
तदनन्तर दूध, दही तथा घृतसे परिपूर्ण उस कलशको मण्डपमें प्रवेश कराये। बायें हाथमें सुवर्णनिर्मित धर्मराजकी प्रतिमा और दाहिने हाथमें सूर्यकी सुवर्णप्रतिमा लेकर मुट्ठी बाँधकर दोनों घुटनोंके बीच सिर करके पाँच बार साँस लेकर शिवका ध्यान करते हुए स्थित रहे। उस समय ब्राह्मण हिरण्यगर्भप्रतिमाका गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन और जातकर्म आदि संस्कार करें। अनन्तर आचार्य यजमानको उठाये। संस्कारके समय यजमान किसी व्यक्तिके मुखको न देखे। उसके बाद उठकर प्रदक्षिणा कर वेदध्वनिपूर्वक यजमानको स्नान कराना चाहिये और सुवर्ण, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके आठ कलशोंके अभिमन्त्रित जलसे 'देवस्य त्वा' इस मन्त्रद्वारा आठ ब्राह्मण यजमानको एक पीठपर बैठाकर उसका अभिषेक करें और कहें— अद्य जातस्य तेऽङ्कानि अभिषेक्ष्यामहे वयम्। दिव्येनानेन वपुषा चिरं जीव सुरखी भव॥
(उत्तरपर्व १७६।५४)
'आज उत्पन्न हुए तुम्हारे इन अङ्गोंका हमलोग अभिषेक कर रहे हैं। अब तुम इस दिव्य शरीरसे चिरकालतक जीवित रहो और आनन्दका उपभोग करो।' इसके बाद यजमान संकल्पपूर्वक उस हिरण्यगर्भ-प्रतिमाको ब्राह्मणोंको दान कर दे, अन्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। यज्ञकी अन्य सभी सामग्रियाँ गुरुको अर्पणकर पादुका, छत्र, वस्त्र, आसन आदि सामग्री सभासद ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। दीन, अन्ध, कृपण आदिको भोजनसे संतुष्ट करना चाहिये। उस दिन अन्न-सत्र करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति हिरण्यगर्भका दान करता है, वह अपने कुलका उद्धार करते हुए स्वयं भी दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। वहाँ एक सौ मन्वन्तरपर्यन्त इन्द्रके समान सुख भोगकर भूलोकमें जन्म लेकर पराक्रमी, धार्मिक, सत्यवादी, ब्राह्मण-गुरुओंका भक्त और शत्रुओंको जीतनेवाला सम्पूर्ण जम्बुद्वीपका राजा होता है। जो व्यक्ति इस विधिको सुनता है, वह भी सौ वर्षसे अधिक स्वर्गसुखका भोग करता है।
(अध्याय १७६)
ब्रह्माण्डदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं महर्षि अगस्त्यजीद्वारा बतायी गयी ब्रह्माण्डदानकी विधि बता रहा हूँ। इससे शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक तीनों प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं और यश, धन, आयु, मङ्गल तथा सद्गति प्राप्त होती है।
अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे लेकर एक हजार पलतककी ब्रह्माण्डकी सुवर्ण-प्रतिमा
बनाये*। उसकी लम्बाई-चौड़ाई बारह अङ्गुलसे लेकर सौ अङ्गुलतक होनी चाहिये। उसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, नदी, सरोवर, समुद्र, पर्वत, दिग्गज आदि चित्रित करे। बीचमें मेरु पर्वतके शिखरोंपर पत्तियोंसहित ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भी अङ्कित करे। उसमें आठों दिग्गजों और चौदह भुवनोंको भी चित्रित करे। इस प्रकारके सुवर्णमय ब्रह्माण्डका श्रेष्ठ शिल्पीद्वारा निर्माण करवाये।
- ब्रह्माण्ड-निर्माण एवं दानकी संस्कल्प पूरी विधि दानसागर, दान-मयुख, दानचन्द्रिका, दानकल्पतरुमें है। अधिक जाननेकी इच्छा रखनेवाले सज्जनोंको इसे वहाँ देखना चाहिये। मत्स्यपुराण अध्याय २७६ में भी यह अध्याय इसी प्रकार प्राप्त होता है।
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६०२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण आदिके समयोंमें तथा अन्य पर्वोंमें पुष्पसे एक मण्डप बनाकर उसमें एक द्रोण (बत्तीस सेर) परिमाणवाले तिलोंके ऊपर ब्रह्माण्डको स्थापित करना चाहिये। कुंकुमचूर्णसे चर्चित कर दो वस्त्रोंसे ढककर गन्ध, धूप आदिसे उस ब्रह्माण्डकी पूजा करनी चाहिये। उसके चारों ओर पूर्ण कलशकी स्थापना कर अठारह प्रकारके धान्य एक-एक द्रोणके परिमाणमें रखे। खड़ाऊँ, जूता, छता, पात्र, आसन, दर्पण, भोजन आदि सभी सामग्रियोंको भी वहाँ रखे। इस विधिसे घरमें अथवा मण्डपमें ब्रह्माण्डकी प्रतिमा स्थापित कर एक हस्त प्रमाणवाला एक चौरस कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदोंको जाननेवाले चारणिक ब्राह्मणोंसे जो वस्त्रादि आभूषणोंसे अलंकृत हों, हवन कराना चाहिये। उपाध्याय और राजाके पुरोहित भी हवन करें। ग्रहयज्ञविधिसे हवन करना चाहिये। विष्णु, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओंके नाममन्त्रोंसे तिलोंकी आहुति देकर दस हजार आहुति महाव्याहृतियोंसे दे और ब्राह्मण रुद्रिका पाठ भी करें। उसके बाद यजमान स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण कर सभी उपचारोंसे ब्रह्माण्डका पूजनकर पुष्पाञ्जलि लेकर इस प्रकार प्रार्थना करे—
नमो जगत्प्रतिष्ठाय विश्वधाम्ने नमोऽस्तु ते ॥
वाइमनोऽतीतरूपाय ब्रह्माण्ड शुभकृद्भव।
ब्रह्माण्डोदरवतीनि यानि सत्त्वानि कानिचित् ॥
तानि सर्वाणि मे तुष्टिं प्रयच्छन्वतुलां सदा।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपालास्तथा ग्रहाः ॥
नक्षत्राणि तथा नागा ऋषयो मरुतस्तथा।
सर्वे भवन्तु संतुष्टाः सप्तजन्मान्तराणि मे ॥
(उत्तरपर्व १७७।१९—२२)
‘जगत्की प्रतिष्ठा करनेवाले विश्वधामन्! आपको नमस्कार है। वाणी एवं मनसे अतीत रूपवाले
ब्रह्माण्ड! आप मेरे लिये कल्याण करनेवाले हों। ब्रह्माण्डके उदरमें रहनेवाले जितने भी सत्त्व हैं, वे सभी मुझे अतुल तुष्टि प्रदान करें। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल, ग्रह, नक्षत्रमण्डल, नागगण, ऋषि तथा मरुद्गण सात जन्मोंतक मुझपर संतुष्ट रहें।’
इस प्रकार पुष्पाञ्जलि देकर दक्षिणासहित ब्रह्माण्ड-प्रतिमा ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये।
राजन्! इस दानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें। सत्ययुगमें ऐश्वर्यवान्, धनवान्, शक्तिशाली, दस हजार हाथियोंके बराबर बलवाला सुद्युम्न नामका एक राजा हुआ है। वह तीस हजार वर्षोंतक निष्कण्टक राज्य करनेके बाद अपने पुत्रको राज्यभार सौंपकर विरक्त हो वनमें तपस्या करने चला गया। वहाँ उसने घोर तपस्या की। अन्त-समयमें वह दिव्य विमानपर चढ़कर इन्द्रादि लोकोंको पार करता हुआ ब्रह्मलोक चला गया। वहाँ ब्रह्माजीने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया और श्रेष्ठ आसन देकर बैठाया। वह वहाँ निवास करने लगा। यद्यपि वहाँ सभी आनन्दकी सामग्रियाँ उपलब्ध थीं; किंतु वह दिव्य भोगोंको भोगनेमें असमर्थ रहता। ब्रह्मलोकमें रहते हुए भी वह भूख-प्याससे दुःखी रहता था। एक बार उसने हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे प्रार्थना की—‘भगवन्! यह ब्रह्मलोक सभी दोषोंसे रहित है, फिर भी यहाँ रहते हुए मुझे भूख-प्यास सता रही है, आप कृपाकर बतलाइये कि यह मेरे किस कर्मका कुफल है।’
ब्रह्माजी बोले—राजन्! तुमने भलीभाँति राज्यका भोग किया। प्रजाओंका पालन किया। यद्यपि तुम अध्यात्मवादी थे, पर दानादि सत्कर्म नहीं किये और उन्हें प्रतिबन्धक रूपमें समझा। तुम ज्ञानी हो, तुमने तप किया है, इस कारण तुम्हें यह ब्रह्मलोक प्राप्त हुआ, किंतु दान आदि सत्कर्म न करनेके कारण
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- उत्तरपर्व *
६०३
यहाँ रहते हुए भी तुम भूख-प्याससे व्याकुल हो।
राजाने कहा—प्रभो! यदि ऐसी बात है तो मुझपर कृपाकर मेरी भूख-प्यास दूर करनेके लिये कोई उपाय बतलाइये।
ब्रह्माजी बोले—राजन्! अब तुम भूलोकमें जाओ और सम्पूर्ण कामनाओंको सफल बनानेवाले ब्राह्मणोंको ब्रह्माण्डकी प्रतिमा दान करो, उससे तुम्हें तृप्ति हो जायगी। ब्रह्माजीके उपदेशसे राजाने पृथ्वीलोकमें आकर ब्राह्मणोंको ब्रह्माण्ड-दान किया। फलस्वरूप उसने पुनः स्वर्गमें शाश्वती तृप्ति प्राप्त की।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! यह मैंने
ब्रह्माण्डके महादानका फल बतलाया। जिसने ब्रह्माण्डका दान किया उसने मानो सम्पूर्ण चराचर जगत्का दान कर लिया। वह अपने कुलोंका उद्धार कर देता है और छत्तीस मन्वन्तरोंतक ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः मनुष्यलोकमें आकर धार्मिक कुलमें जन्म लेता है। उसे न दरिद्रता सताती है, न व्याधि होती है और न अपने इष्टजनोंसे वियोग होता है। जो इस दानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है अथवा सुनाता है, वह भी सद्गति प्राप्त करता है। फिर जो इस ब्रह्माण्ड-दानको करता है, उसके विषयमें क्या कहना। (अध्याय १७७)
कल्पवृक्ष एवं कल्पलतादानकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! जब भगवान् शंकरका माता पार्वतीके साथ विवाह हुआ तो उनके अपत्यकी कल्पनाकर देवगण भयभीत हो गये। वे सभी भगवान् शंकरके पास गये और उनसे ऊर्ध्वरेता रहनेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान् शंकर कुछ खिन्न-से होकर कहने लगे—‘देवगण! आपलोग भयभीत न हों, मैं स्थाणुके रूपमें स्थित रहूँगा। इसपर माता पार्वतीने क्रुद्ध होकर देवताओंको शाप दे डाला कि जिस प्रकार आपलोगोंने मुझे पुत्रसे रहित किया है, उसी प्रकार आप सबको भी पुत्रोंकी प्राप्ति नहीं होगी।’ देवताओंको इस प्रकार शाप देकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे कहा—‘जगत्पते! अब तो हमें पुत्र उत्पन्न होगा नहीं। अपुत्रकी गति नहीं होती है ऐसा श्रुति कहती है। अतः हे महाभाग! दोनों लोकोंमें जैसे उद्धार हो, वैसा कोई आप उपाय बतलायें।’
भगवान्ने कहा—देवि! पुत्ररहित पुरुष अथवा
नारीको चाहिये कि सुवर्णका एक कल्पवृक्ष बनाकर उसका दान करे। इससे सद्गति प्राप्त होगी अथवा किसी वृक्षमें कल्पवृक्षकी कल्पनाकर उसमें पुत्रत्वकी भावना करनी चाहिये। इससे अपुत्रवान् पुत्रवान् हो जाता है। देवि! इसमें कोई संदेह नहीं है। अतः कल्पवृक्षका दान करना चाहिये। कल्पवृक्ष शुद्ध सुवर्णका होना चाहिये। उसमें बहुत-सी शाखाएँ और पत्र-पुष्प हों। उसे रत्नोंसे अलंकृत तथा फलोंसे सुसज्जित करना चाहिये। नृपसत्तम! वह कल्पवृक्ष अपनी शक्तिके अनुसार बीस पल सुवर्णसे अधिकका होना चाहिये। इसी प्रकार चाँदीसे भी बनाया जा सकता है। नदीके तटपर, घरपर या देवालयमें पूर्व आदि दिशामें एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डप दस हाथ प्रमाणका होना चाहिये। दस हाथकी वेदी भी निर्मित करनी चाहिये। मण्डपके अग्निकोणमें मेखलायुक्त प्रामाणिक एक अग्निकुण्ड भी बनवाये। वैदिक ब्राह्मणोंका वरण
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६०४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करे। एक उपदेश ब्राह्मणका भी वरण करे। उस कल्पवृक्षको एक प्रस्थ प्रमाणवाले गुडराशिपर स्थापित करे। उस वृक्षकी पाँच शाखाओंपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सूर्यका चित्राङ्कन करे। वृक्षके नीचेकी शाखामें स्त्रीसहित कामदेवके चित्रकी रचना करनी चाहिये। कल्पवृक्षके पूर्वभागमें नमकके ऊपर संतानवृक्षको स्थापित करे और संतानवृक्षपर गायत्रीकी स्थापना करे। कल्पवृक्षके दक्षिण भागमें घृतके ऊपर श्रीदेवीके साथ मन्दार नामक देववृक्षकी स्थापना करे। इसी प्रकार उसी वृक्षके पश्चिम भागमें (जीराके ऊपर) उमाके साथ पारिजात वृक्षकी और उत्तर दिशामें तिलोंके ऊपर सुरभी (गौ)-के साथ हरिचन्दनवृक्षको स्थापित करे। पुनः रेशमी वस्त्रसे वेष्टित, ईख, पुष्पमाला और फलोंसे संयुक्त आठ पूर्ण कलशोंको चारों ओर स्थापित करे। अग्निप्रणयन करके वृक्षोंका अधिवासन करे। अनेक प्रकारके धान्य तथा भक्ष्य-भोज्य नैवेद्योंको भी स्थापित करे। चारों ओर दीपमाला प्रज्वलित कर दे। अनन्तर कल्पवृक्षकी पूजा कर प्रार्थना करे —
कामदस्त्वं हि देवानां कामवृक्षस्ततः स्मृतः ।
मया सम्पूजितो भक्त्या पूरयस्व मनोरथान् ॥
(उत्तरपर्व १७८। ३१)
‘कल्पवृक्ष! आप देवताओंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसीलिये आपको कामवृक्ष कहा गया है। मैंने भक्तिपूर्वक आपकी पूजा की है, आप मेरे मनोरथोंको पूर्ण करें।’ इस प्रकार पूजन करनेके बाद रात्रिमें महोत्सवपूर्वक जागरण करे। ब्राह्मण हवन करें। सभी स्थापित देवताओंको हवनसे आप्यायित करे। प्रातःकाल उठकर स्नानादि कर श्वेत वस्त्र धारण कर शुभ मुहूर्तमें उस कल्पवृक्षका दक्षिणाके साथ दान कर देना चाहिये। कल्पवृक्षकी तीन बार प्रदक्षिणा कर
प्रणाम करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे— नमस्ते कल्पवृक्षाय वित्तार्थप्रदाय च। विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये॥ यस्मात् त्वमेव विश्वान्मा ब्रह्मस्थानुदिवाकराः । मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन॥
(उत्तरपर्व १७८। ३७-३८)
‘कल्पवृक्ष! आप प्रचुरमात्रामें अर्थ प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। देव! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले विश्वमूर्ति हैं, आपको प्रणाम है। सनातन! चूँकि आप विश्वान्मा, ब्रह्मा, शिव, दिवाकर, मूर्त, अमूर्त तथा इस चराचर विश्वके परम कारणरूप हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये।’
इस प्रकार आमन्त्रित कर उस कल्पवृक्षको गुरुको समर्पित कर दे एवं चार संतान आदि देववृक्षोंको ऋत्विजोंको समर्पित करे। इस विधिसे दान करनेवाला सूर्यके तेजके समान कान्तिमान्, अप्सराओंसे परिव्याप्त, किंकिणीजालसे अलंकृत सुन्दर विमानपर चढ़कर सभी बाधाओंसे रहित निर्विघ्न इन्द्रलोकको जाता है। पुण्यकर्मके समाप्त होनेके बाद वह पुनः पृथ्वीपर आकर श्रोत्रिय-कुलमें उत्पन्न होता है तथा पराक्रमी, विद्वान्, यज्ञकर्ता एवं धार्मिक राजा होता है। अन्तमें वह भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त करता है।
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! संसारका कल्याण करनेके लिये किसी ऐसे दान, व्रत आदिको बतलायें, जिससे मनुष्य यश और लक्ष्मीसम्पन्न, निष्पाप और दीर्घायु हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—संसारके हितकी इच्छासे मैं वह उपाय बतला रहा हूँ, जिससे मानव भाग्यशाली होता है। कनक-कल्पलताके दानसे मनुष्य सौभाग्यशाली हो जाता है। कल्पवृक्ष-दानकी विधिसे ही इसका भी दान करना
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- उत्तरपर्व *
६०५
चाहिये। विधिपूर्वक दिक्पाल-होम, आधार-आज्यभाग-हवन, ग्रहयाग तथा व्याहृतियोंसे भी हवन करना चाहिये। हवन आदिके अनन्तर किसी पुण्य पर्वमें स्नानादिसे पवित्र होकर फल, अक्षत, वस्त्र, पुष्प, धूप आदिसे कल्पलताकी अर्चना करनी चाहिये। तदनन्तर प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंसे उसकी प्रार्थना करनी चाहिये—
नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो
ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालनीभ्यः ।
आशाशताधिक्यफलप्रदाभ्यो
दिग्भ्यस्तथा कल्पलतावधूभ्यः ॥
या यस्य शक्तिः परमा प्रदिष्टा
वेदे पुराणे सुरसन्तमस्य ।
तां पूजयामीह परेण साम्रा
सा मे शुभं यच्छतु तां नतोऽस्मि ॥
(उत्तरपर्व १७९।१०-११)
‘पापोंका विनाश करनेवाली, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और लोकेश्वरोंका पालन करनेवाली एवं आशासे
अधिक सैकड़ों फल प्रदान करनेवाली दिग्बधूरूपी कल्पलता देवियो! आपको बार-बार नमस्कार है। वेदों तथा पुराणोंमें आप देवताओंकी परम शक्ति कही गयी हैं, अतः शक्तिस्वरूपा कल्पलते! मैंने सामध्वनिसे आपका पूजन किया है, आप मेरा कल्याण करें, आपको नमस्कार है।’
इस प्रकार प्रार्थनाकर दस दिशारूपी दस कल्पलताएँ ब्राह्मणोंको दान कर दे और क्षमा-याचना करे। इस विधिके अनुसार दान करनेवाला इस लोकमें विजयी, धनवान् और पुत्रवान् होता है। मरनेके बाद इन्द्रलोकमें मन्वन्तरपर्यन्त निवास करता है। अनन्तर पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। जो नारी यह दान देती है, वह शक्तिसमन्वित चक्रवर्ती पुत्रको जन्म देती है। जो इस कल्पलताके* दानको देखता है, अनुमोदन करता है अथवा इसके माहात्म्यको सुनता है वह भी मुक्त हो जाता है।
(अध्याय १७८-१७९)
गजरथ-अश्वरथदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अपनी शक्तिके द्वारा प्राप्त सम्पत्तिसे राजाओंको तथा अधर्मसे डरे हुए, ग्रहपीडासे संतप्त एवं दुःस्वप्न आदिसे दुःखित पुरुषोंको कौन-सा दान देना चाहिये, जो ऐहिक तथा पारलौकिक कामनाओंको पूर्ण करनेवाला हो, ऐसे किसी विशिष्ट दानका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! ऐसे कल्याणकारी श्रेष्ठ दानको आप सुनें, जो विशेषरूपसे राजाओंका हितसाधक है। शास्त्रोंमें गोदान आदि अनेक श्रेष्ठ दान बतलाये गये हैं, किंतु उनमें राजाओंके लिये जो प्रधान दान है, उसे मैं
आपको बतला रहा हूँ, जिसे शुक्राचार्यने दैत्यराज बलिको बतलाया था, वह दान गजरथाश्वरथदान है। शुक्राचार्यजीने बलिले कहा था—‘दैत्यपते! जिस गजरथाश्वरथदानसे सभी पाप, भयंकर आधि-व्याधियाँ एवं ग्रहपीडाएँ नष्ट हो जाती हैं और श्रेष्ठ पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे आप सुनें।’
कार्तिककी पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, विषुवयोग और सूर्यकी संक्रान्तिमें अथवा किसी पुण्य दिनमें यह दान करना चाहिये। काष्ठका एक दिव्य रथ बनाकर उसे स्वर्णसे मण्डित करे। वह रथ सुन्दर चक्के, धुरे, नेमि, जूआ आदिसे
- मत्स्यपुराण अ० २८६ में कनककल्पलता-दानको स्पष्ट विधि निर्दिष्ट है। वहाँ स्वर्णनिर्मित इन्द्राणी, आग्रेयी, नैऋती, वारुणी, वायवी, कौबेरी आदि दस दिशा-देवियों तथा कल्पलताओंके निर्माणकी विधि भी दी गयी है।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
समन्वित हो। उसे स्वर्णध्वज तथा सफेद एवं कृष्ण पताकाओं और पुष्पमालाओंसे मण्डित करना चाहिये। ऐसा रथ बनाकर किसी शुभ दिनमें जलमय स्थान अथवा नदीके किनारे, गोशाला या घरके आँगनमें एक श्रेष्ठ वेदीपर पुराण और वेदविद्याके ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मण उसे स्थापित करे। रथके मध्यमें ब्रह्माकी स्थापना करे और प्रणवद्वारा उनकी पूजा करे। उत्तरमें विष्णुकी स्थापना कर पुरुषसूक्तसे उनकी पूजा करे। दक्षिणमें भगवान् रुद्रकी स्थापना कर रुद्रसूक्तद्वारा उनका पूजन करे। सूर्यादिग्रहोंकी पुष्प, गन्ध, फल, नैवेद्य, दीप, वस्त्र और मालाओंद्वारा पूजा करे। शङ्खु, भेरी और मृदंगोंके शब्द एवं ब्रह्मघोषके द्वारा महान् उत्सव कराये।
अनिकोणमें एक हाथ प्रमाणवाला एक कुण्ड बनाकर विभिन्न वैदिक शाखाओंके अध्येता ब्राह्मणोंकी पूजा करे। चार या आठ ब्राह्मणों तथा एक आचार्यका वरण करे। तिल एवं घृतके द्वारा हवन करे। इस प्रकार द्विजोंके साथ यजमान यज्ञविधि सम्पन्न कर शुभ लक्षणोंसे समन्वित दो श्रेष्ठ हाथियोंको रथमें नियोजित करे। वे हाथी घण्टा, हेमपट्ट, सुन्दर तिलक, शङ्खु, चामरसे सुशोभित हों, दिव्य मुक्ता-मालाओंसे परिव्याप्त हों, दिव्य अंकुशसे समन्वित दो महावत भी रहें। इस प्रकार दिव्य रथ बनवाकर सभी श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण एवं माला आदिसे सत्कृत तथा धनुष-बाण, कवच आदि आयुधोंसे सुसज्जितकर ब्राह्मणको रथपर बिठलाये। अनन्तर श्वेत वस्त्रधारी यजमान रथकी परिक्रमा कर पुष्पाञ्जलि लेकर सभी पापोंका नाश करनेवाले इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—
कुमुदैरावणौ पद्मः पुष्यदन्तोऽथ वामनः।
सुप्रतीकोऽञ्जनः सार्वभौमोऽष्टौ देवयोनयः॥
तेषां वंशप्रसूतौ तु बलरूपसमन्वितौ।
तद्युत्तरथदानेन मम स्यातां वरप्रदौ॥
रथोऽयं यज्ञपुरुषो ब्राह्मणोऽत्र शिवः स्वयम्।
ममेभरथदानेन प्रीयेतां शिवकेशवौ॥
(उत्तरपर्व १८०।२१—३१)
‘कुमुद, ऐरावण (ऐरावत), पद्म, पुष्यदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन तथा सार्वभौम—ये आठ गज देवयोनियें उत्पन्न हैं। इनके वंशमें उत्पन्न ये दो गज अत्यन्त बलवान् और रूपवान् हैं। इस रथमें इनको नियोजित कर देनेसे और गजयुक्त रथका दान करनेसे ये गज मेरे लिये वर प्रदान करनेवाले हों। यह रथ यज्ञपुरुष साक्षात् विष्णुरूप है और इसपर बैठे ब्राह्मण शिवस्वरूप हैं। इसलिये इन गजोंसे युक्त रथके दान करनेसे भगवान् विष्णु तथा शंकर मुझपर प्रसन्न हों।’
ऐसा कहकर उस रथपर बैठे ब्राह्मणकी रथसहित पुनः प्रदक्षिणा कर वह रथ उन ब्राह्मणको दान कर दे। रथको ब्राह्मणदेवताके द्वारतक पहुँचाकर पुनः अपने घर वापस आ जाय। इस प्रकार दान-कार्यके पूर्ण होनेपर अंधे, दीन, मूक, बधिर, अनाथोंको वस्त्र और भोजन आदिसे संतुष्ट करे, गोदान करे।
राजन्! इसी प्रकार एक दूसरा रथ बनाकर उसमें जीन, लगाम आदिसे संयुक्त दो शुभ लक्षणोंवाले घोड़ोंको अलंकृत कर जोतना चाहिये। पूर्वरीतिसे हवन आदि कार्य करने चाहिये। उस उत्तम रथपर ब्राह्मणको बिठाकर उसकी भी पूजा करनी चाहिये और रथकी प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक उस अश्वरथका दान करना चाहिये—
नमोऽस्तु ते वेदतुरङ्गमाय
त्रयीमयाय त्रिगुणात्मकाय।
सुदुर्गमार्गे सुखयानपात्रे
नमोऽस्तु ते वाजिधराय नित्यम्॥
रथोऽयं सविता साक्षाद् वेदाश्चामी तुरङ्गमाः।
अरुणो ब्राह्मणश्चायं प्रयच्छन्तु सुखं मम॥
(उत्तरपर्व १८०।४०-४१)
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- उत्तरपर्व *
६०७
‘वेदरूपी अश्वोंसे युक्त, वेदत्रयीस्वरूप, त्रिगुणात्मक, कठिन-से-कठिन मार्गोंमें सुखपूर्वक वहन कर ले जानेवाले अश्वरथ! आपको नित्य नमस्कार है। यह रथ साक्षात् भगवान् सूर्यका रूप है और ये घोड़े साक्षात् वेदरूप हैं तथा इसमें बैठे हुए ब्राह्मण अरुणरूप हैं। ये सभी मुझे सुख प्रदान करें।’
तदनन्तर उसके साथ ब्राह्मणके घरतक जाय।
इस विधिसे जो बुद्धिमान् व्यक्ति अश्वरथका दान करता है, वह सभी पापों तथा रोगोंसे रहित होकर सौ मन्वन्तरपर्यन्त दिव्य भोगोंसे समन्वित सूर्यके समान देदीप्यमान विमानपर आरूढ़ होकर श्रीसम्पन्न हो स्वर्गलोकमें निवास करता है। पुनः पुण्यक्षीण होनेपर पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रसमन्वित, चिरजीवी, अतिथिसेवक एवं धार्मिक राजा होता है। (अध्याय १८०)
कालपुरुषदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने कहा—यदुश्रेष्ठ! सभी पापोंके नाश करनेवाले, मङ्गलप्रद पवित्र अन्य दानोंको आप मुझसे कहें, क्योंकि ज्ञान-विज्ञानके एकमात्र आश्रय और संसार-सागरसे उद्धार करनेवाला आपके अतिरिक्त कोई नहीं है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! मैंने अनेक प्रकारके दानोंकी आपसे चर्चा की, फिर भी यदि आपको उत्कण्ठा है तो मैं पुनः कह रहा हूँ। आप सबसे पहले दस महादानोंके विषयमें सुनें। उनमेंसे पहला दान है—कालपुरुषदान, दूसरा है सप्तसागरदान, इसी प्रकार महाभूतघटदान, शय्यादान, आत्मप्रतिकृतिदान, सुवर्णाश्वदान, सुवर्णाश्वरथदान, कृष्णाजिनदान, विश्वचक्रदान तथा हेमगजरथदान—ये दस महादान हैं। नृपश्रेष्ठ! आप दान करनेमें अपनी सदबुद्धि लगायें और अन्य लोगोंको भी दान-कर्ममें प्रेरित करें। धनीके लिये दानसे अतिरिक्त और कोई भी उपकार नहीं है। देनेवाले व्यक्तिका धन घटता नहीं है, अपितु देनेसे बढ़ता ही रहता है।
राजन्! अब आप कालपुरुषदानके विषयमें सुनें। कालपुरुषकी एक प्रतिमा बनानी चाहिये। चतुर्थी, चतुर्दशी अथवा विष्टिमें यह प्रतिमा काले तिलोंसे एक समतल भूमिपर पुरुषके आकारकी
बनवाये। उसके दाँत चाँदीके, आँखें सोनेकी बनाये, उसके हाथमें भयंकर तलवार हो, जपाकुसुमके समान उसके कानोंमें कुण्डल हों, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हो, शङ्खकी भी माला पहने हो। धनुष-बाण लिये हो। जूते पहने हो तथा बगलमें काला कम्बल लिये हो। इस प्रकार कालपुरुषकी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे उसकी अर्चना करे। ‘त्र्यम्बकं’ (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे स्वर्गह्योक्त विधानसे तिल और घृतद्वारा १०८ आहुतियाँ दे। अनन्तर प्रसन्नहृदयसे यजमान इस मन्त्रका उच्चारण करे —
सर्वं कलयसे यस्मात् कालस्त्वं तेन भण्यसे। ब्रह्मविष्णुशिवादीनां त्वमसाध्योऽसि सुव्रत ॥ पूजितस्त्वं मया भक्त्या प्रार्थितश्च तथा सुखम्। यदुच्यते तव विभो तत् कुरुष्व नमो नमः ॥
(उत्तरपर्व १८१।२१-२२)
‘कालपुरुष! सब कुछ आपसे ही घटित होता है। इसलिये आप काल कहे जाते हैं। सुव्रत! ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे भी आप असाध्य हैं। आपकी मैंने भक्तिपूर्वक आनन्दके साथ पूजा की है। विभो! मुझे आपसे सुखकी कामना है। आप उसे कृपापूर्वक पूर्ण करें, आपको बार-बार नमस्कार है।’
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६०८
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
‘इस प्रकार पूजाकर वह प्रतिमा ब्राह्मणको समर्पित करे। वस्त्र और अलंकारोंसे ब्राह्मणकी पूजाकर उसे यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करे। इस विधिसे कालपुरुषका दान करनेवालेको मृत्यु एवं व्याधिका भय नहीं रहता। वह सभी बाधाओंसे
रहित होकर अपार सम्पत्ति और अन्तमें सूर्यलोकका भेदनकर परमपदको प्राप्त करता है। पुण्य-क्षीण होनेपर वह पुनः यहाँ आकर पुत्र-पौत्र तथा लक्ष्मीसे सम्पन्न धार्मिक राजा होता है।’
(अध्याय १८१)
सप्तसागरदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं सम्पूर्ण पापोंके विनाशक परमोत्तम सप्तसागर-दानकी विधि बतला रहा हूँ। बुद्धिमान् पुरुष युगादि तिथियों तथा ग्रहण आदिके समय स्वर्णनिर्मित सात स्वतन्त्र कुण्डोंका निर्माण करे। ये कुण्ड एक बिता चौड़े तथा एक अरलि अर्थात् बँधी हुई मुट्ठीवाले हाथ-जितने लम्बे होने चाहिये। इन्हें अपनी आर्थिक शक्तिके अनुसार सात पल सोनेसे ऊपर एक हजार पलतकका बनवाना चाहिये। इन सभी कुण्डोंको कृष्णमृगके चर्मपर रखे गये तिलोंके ऊपर स्थापित करना चाहिये। विद्वान् पुरुषको पहले कुण्डको लवणसे, दूसरे कुण्डको दुग्धसे, तीसरेको घृतसे, चौथेको गुडसे पाँचवेंको दहीसे, छठेको चीनीसे तथा सातवेंको तीर्थोंके पवित्र जलसे पूर्ण करना चाहिये। फिर लवणकुण्डमें सुवर्णनिर्मित ब्रह्मकी, दुग्धकुण्डके मध्यमें भगवान् विष्णुकी, घृतकुण्डमें भगवान् शिवकी, गुडकुण्डमें भगवान् भास्करकी, दधिकुण्डमें सुराधिपकी, शर्कराकुण्डमें लक्ष्मीकी और जलकुण्डमें पार्वतीकी स्थापना करनी चाहिये। सभी कुण्डोंको सभी ओरसे रलों तथा अत्रोंद्वारा अलंकृत करना चाहिये। जब पुण्यपर्व आ जाय, यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र धारण कर सुखपूर्वक जो पदार्थ मिल सके उन्हें भी वहाँ स्थापित कर ले। फिर इन
कुण्डों (सागरों)-की तीन प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—
नमो वः सर्वसिन्धूनामाधारेभ्यः सनातनाः ॥ जन्तूनां प्राणदेभ्यश्च समुद्रेभ्यो नमो नमः। पूर्णाः सर्वे भवन्तो वै क्षारक्षीरघृतैक्ष्वैः ॥ दधा शर्करया तद्भूतं तीर्थवारिभिरेव च। तस्मादघौघविध्वंसं कुरुध्वं मम मानदाः ॥ अलक्ष्मीः प्रशमं यातु लक्ष्मीश्चास्तु गृहे मम।
(उत्तरपर्व १८२। १०—१३)
‘सभी नदियोंके एकमात्र आश्रयस्थान सप्तसागरो! आप सनातन हैं, आपको नमस्कार है। सभी प्रणियोंको जीवनदान देनेवाले समुद्रोंको नमस्कार है। आप लवण, क्षीर, घृत, इक्षुस, दही, शर्करा तथा तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण हैं, आप मान-सम्मान देनेवाले हैं, आप मेरे सम्पूर्ण पापसमूहोंका विनाश करें। मेरे घरसे अलक्ष्मी दूर हो जाय और उसमें लक्ष्मीका निवास हो।’
इस प्रकार कहकर उन सप्तसागरोंको ब्राह्मणोंको दान कर दे। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! इस सप्तसागरके दान करनेवालेके घरसे आठ पीढ़ीतक लक्ष्मी दूर नहीं होती, वह सात मन्वन्तरोंतक देवलोकमें पूजित होता है और फिर अन्तमें ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है।
(अध्याय १८२)
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- उत्तरपर्व *
६०९
महाभूतघटदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं महापातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम महाभूतघटदानकी विधि बता रहा हूँ। पुण्य दिनमें आँगनको लीपकर रलोंसे समन्वित सुवर्ण-कुम्भका निर्माण करे। कलशको प्रादेशमात्रसे सौ अङ्गुलपर्यन्त अपनी शक्तिके अनुसार पाँच पलसे सौ पलतक बनाना चाहिये। उस घटको दुग्ध और घृतसे पूर्ण करके उसके समीप कल्पवृक्षको स्थापित करे। वहीं पद्मासनपर आसीन ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरको स्थापित करे। लोकपाल और इन्द्रादिको अपने-अपने वाहनोंसे युक्त करके स्थापित करना चाहिये। अक्षसूत्रके साथ ऋग्वेद, कमलके साथ यजुर्वेद, वीणा लिये हुए सामवेद, सुक् लिये तथा सुन्दर माला पहने अथर्ववेद और पञ्चम वेद पुराणको अक्षसूत्र, कमण्डलु तथा वरदमुद्रायुक्त प्रतिमारूपमें स्थापित करना चाहिये। घटके चारों ओर सप्तध्यान्य, चरणपादुका, जूता, छाता, चामर, शय्या आदिको भी स्थापित करना चाहिये। पुष्पमाला और अन्य उपचारोंद्वारा स्थापित घटकी पूजा करे। शुभ मुहूर्तमें स्नानकर तीन बार उस घटकी तथा वेदादि प्रतिमाओंकी प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—
यस्मान्न किंचिदप्यस्ति महाभूतैर्विना कृतम्। महाभूतमयश्चायं तस्माच्छान्तिं ददातु मे॥ अत्र सन्निहिता देवाः स्थापिता विश्वकर्माणा। ते मे शान्तिं प्रयच्छन्तु भक्तिभावेन पूजिताः॥
(उत्तरपर्व १८३। १०-११)
‘चूँकि महाभूतोंके बिना इस संसारमें अन्य कुछ भी नहीं है, सब महाभूतमय ही है। इसलिये महाभूतमय यह घट मुझे शान्ति प्रदान करे। सभी देवगण विश्वकर्माके द्वारा इसमें स्थापित हैं, भक्तिभावसे पूजित वे सब मुझे शान्ति प्रदान करें।’
इस प्रकार महाभूतघटकी पूजाकर वस्त्र तथा अलंकारादिसे ब्राह्मणकी भी पूजा करे और पुण्यकालमें महाभूतघट ब्राह्मणको प्रदान कर दे। अनन्तर प्रदक्षिणाकर ब्राह्मणसे क्षमा-याचना करे। इस विधिसे जो व्यक्ति महाभूतमयघटका दान करता है, वह अपने इक्कीस कुलके साथ शिवलोकमें जाता है। पुण्यक्षीण होनेपर वह इस लोकमें आकर धार्मिक राजा होता है और शत्रुसे अजेय, पराक्रमी, क्षत्रियधर्ममें निरत, विद्वान् एवं देवताओं और ब्राह्मणोंका भक्त होता है।
(अध्याय १८३)
शय्यादान एवं मृतशय्यादान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पाण्डुकुलोद्भव! अब मैं शय्यादानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे व्यक्ति इस लोकमें और परलोकमें सुखभागी होता है, यह जीवन अनित्य है, इसलिये शय्यादान करना चाहिये। मृत्युके अनन्तर यह दान कैसे हो पायेगा, इसलिये अपने जीवनमें ही कर लेना चाहिये। भारत! जबतक जीवन रहता है, तभीतक मनुष्य भाई, पिता, बन्धु आदिका स्नेह प्राप्त करता
है, पुनः उसीको मर गया समझकर सबका स्नेह छूट जाता है। इसलिये शय्या, भोजन तथा जल आदिका स्वयं दान कर लेना चाहिये, क्योंकि यह मनमें निश्चित ध्यान रखना चाहिये कि आत्मा ही मेरा बन्धु है अर्थात् स्वयं ही स्वयंका बन्धु है। जिसने दान तथा भोगादिके द्वारा अपनी आत्माको संतुष्ट नहीं कर लिया, उसके लिये स्वयंसे बड़ा और कौन अहितकर होगा? मर जानेपर कौन
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६१० * संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उसकी पूजा करेगा ? इसलिये मानवको चाहिये कि श्रेष्ठ काष्ठकी एक दृढ़ शय्याका निर्माण करे, उसे हाथी-दाँत और हेमपत्रसे अलंकृतकर सुशोभित करे। गद्दा, चादर तथा तकियेसे संयुक्त कर गन्ध तथा धूपसे अधिवासित करे। ऐसी उस उत्तम शय्यापर लक्ष्मीसमन्वित भगवान् श्रीहरिकी सुवर्णकी प्रतिमाकी स्थापना करे और शय्याके सिरहाने कलश स्थापित करे। विद्वान् व्यक्तिको यह समझना चाहिये कि शय्यापर भगवान् निद्रामें स्थित हैं। शय्याके समीप ही कुंकुमचूर्ण, कर्पूर, अगरु, चन्दन, ताम्बूल, दीपक, जूता, छाता, चामर, आसन, भोजन तथा ससधान्यको यथाशक्ति स्थापित करे। अन्य भी उपकारक वस्तुओंको वहाँ स्थापित करे। वितानसे शय्याको सुशोभित कर ले। इस प्रकार उपस्कारोंसे मण्डित शय्याकी सपत्नीक ब्राह्मणकी विधिपूर्वक पूजाकर प्रदान कर दे और इस मन्त्रको पढ़े—
नमस्ते सर्वदेवेश शय्यादानं कृतं मया।
देहि तस्माच्छान्तिफलं नमस्ते पुरुषोत्तम॥
यथा न कृष्ण शयनं शून्यं सागरजातया।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥
(उत्तरपर्व १८४। १३-१४)
‘सर्वदेवेश! मैंने शय्यादान किया है, आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप मुझे शान्ति प्रदान करें, आपको नमस्कार है। भगवन्! जैसे आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, वैसे ही जन्म-जन्मान्तरमें मेरी शय्या भी शून्य न रहे।' इस प्रकार उस सुन्दर पवित्र शय्याका दान कर विसर्जन करे।
व्यक्तिके मर जानेपर एकादशाहमें भी शय्यादानमें प्रायः यही विधि कही गयी है। बान्धवके मरनेपर धर्मके लिये यदि शय्यादान करता है तो उसे विशेष शान्ति मिलती है। राजेन्द्र! इसमें कुछ विशेष बातें भी मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सुनें। मृत व्यक्तिने अपने जीवनकालमें जिन वस्तुओंका उपयोग किया था, जैसे कपड़े पहने थे, जैसा उसका वाहन था, जो वस्तु खाता था, जो वस्तु उसे प्रिय लगती थी, उन सबका भी शय्याके साथ दान करना चाहिये। इसे ‘मृतशय्यादान’ कहा जाता है। मृत व्यक्तिकी सुवर्णकी प्रतिमा भी वहाँ स्थापित करनी चाहिये। अनन्तर पूजा करके वह मृतशय्या प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार इस शय्यादानके प्रभावसे वह मृत जीव स्वर्गलोक, इन्द्रलोक तथा सूर्यलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है। भयंकर मुखवाले यमराजके दूत उसे कष्ट नहीं दे पाते। धूप और शीतसे उसे कभी भी कष्ट नहीं होता। वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है तथा प्रलयपर्यन्त वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है। (अध्याय १८४)
आत्मप्रतिकृतिदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं आत्मप्रतिकृतिकी दान-विधि बता रहा हूँ। यह दान मान-सम्मान बढ़ानेवाला है। यह किसी समय किया जा सकता है। पार्थ! अपने स्वरूपकी लोहेकी एक मूर्ति बनाकर अपना जो अभीष्ट वाहन हो उसपर स्थापित करे। अपने मित्रों, बन्धुओं और सभी उपकरणोंसे युक्त होना चाहिये। वह मूर्ति रत्नों तथा वस्त्रादिसे अलंकृत हो। उसे कुंकुमसे अनुलिस कर कर्पूर तथा अगरुसे सुवासित कर दे। अगर स्त्री आत्मप्रतिकृतिदान करे तो उसे अपनेको शय्यामें सोती हुई रूपमें चित्रित करे और अपने अभीष्ट पदार्थोंको पासमें रखे। अपने और अपनी स्त्रीके लिये उपकारी वस्तुओंको भी वहाँ रखे। सभी वस्तुओंको यथास्थान रखकर स्नान कर श्वेत
- उत्तरपर्व *
६११
वस्त्र धारण करे और लोकपाल, ग्रहों, गौरी, विनायककी पूजाकर हाथमें पुष्पाञ्जलि ग्रहण कर ब्राह्मणके सम्मुख इस मन्त्रका उच्चारण करे— आत्मनः प्रतिमा चैवं सर्वोपकरणैर्युता ॥ सर्वैरन्तसमायुक्ता तव विप्र निवेदिता। आत्माशम्भुः शिवः शौरिः शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥ तस्मादात्मप्रदानेन ममात्मा सुप्रसीदतु।
(उत्तरपर्व १८५।९-११)
‘ब्राह्मणदेवता! सभी उपकरणों और सभी रलोंसे युक्त यह मेरी प्रतिमा है, इसे मैं आपको समर्पित करता हूँ। मेरा आत्मा शम्भु, शिव, विष्णु तथा शक्र इस प्रतिकृतिमें अधिष्ठित है, अतः आत्मप्रतिकृतिके दानसे मेरा आत्मा प्रसन्न
हो। ऐसा उच्चारण कर प्रतिमा ब्राह्मणको समर्पित करे। ब्राह्मण भी ‘कोऽदात्कस्मा’ (यजु० ७।४८) इस मन्त्रका पाठ करते हुए प्रतिमा ग्रहण करे। यजमान प्रदक्षिणा कर नमस्कारपूर्वक उसका विसर्जन करे। राजन्! इस विधानके साथ जो आत्मप्रतिकृति-दान देता है, वह देवताओंसे आवृत होकर दिव्य सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। पुण्य क्षीण होनेके बाद वह पुरुष कामनाओंके फलको भोगते हुए राजाके रूपमें रहता है, अभीष्ट बन्धुओंके साथ उसका कभी भी वियोग नहीं होता और वह स्वर्गमें अनन्तकालतक सुख प्राप्त करता है। (अध्याय १८५)
हिरण्याश्वदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं परम श्रेष्ठ सुवर्णमय अश्वके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसके दानसे मनुष्य अनन्त फलको प्राप्त करता है। किसी पुण्यतिथिमें उसे अपनी शक्तिके अनुरूप तीन पलसे लेकर एक सौ पलतकके सोनेका अश्व बनवाना चाहिये। वह लगामके काँटिसे युक्त हो। अश्वके कंधे उन्नत, जानुप्रदेश दृढ़ और पूँछ सुन्दर हो। उसे रेशमी वस्त्रसे आच्छादित एवं कुंकुमसे लिप्तकर वेदीके ऊपर फैलाये गये काले मृगचर्मपर रखी हुई तिल-राशिपर स्थापित करना चाहिये। श्वेत पुष्पोंसे उसकी पूजाकर चनेका नैवेद्य भोगके रूपमें निवेदित करना चाहिये। तत्पश्चात् शुभ मुहूर्तमें अञ्जलिमें पुष्प लेकर व्रती इस पुराणोक्त मन्त्रका उच्चारण करे—
नमस्ते सर्वदेवेश वेदाहरणलम्पट ॥ वाजिरूपेण मामस्मात् पाहि संसारसागरात्। त्वमेव सप्तधा भूत्वा छन्दोरूपेण भास्करम् ॥
यस्माद् धारयसे लोकानतः पाहि सनातन।
(उत्तरपर्व १८६।६-८)
‘सभी देवोंके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। वेदोंको लानेके लिये इच्छुक देव! आप अश्वरूपसे इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! चूँकि आप ही छन्दोरूपसे सात भागोंमें विभक्त होकर सभी लोकोंको धारण करते हैं, अतः सनातन! आप मेरी रक्षा कीजिये।’ ऐसा कहकर उसकी प्रदक्षिणा करे तथा वह अश्व ब्राह्मणको प्रदान कर दे। राजन्! इस दानको देनेसे मनुष्य भगवान् सूर्यके अक्षयलोकको प्राप्त करता है। तदुपरान्त वह तैलरहित अन्नका भोजन करे और भोजनके बाद पुराणोंका श्रवण करे। जो मनुष्य पुण्य दिन आनेपर इस हिरण्याश्व-विधिको सम्पन्न करता है, वह पापोंसे मुक्त हो सिद्धोद्धार प्राप्त होता हुआ मुरारिके पुर—वैकुण्ठको प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस सुवर्णाश्वके दानकी विधिको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर अश्वसमन्वित
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६१२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
राजा होता है और सुवर्णमय विमानद्वारा सूर्यके लोकको जाता है और वहाँ देवाङ्गनाओंद्वारा पूजित होता है। जो अल्पवित्त पुरुष हिरण्याश्वदानकी इस विधिको सुनता या स्मरण करता है अथवा
लोकमें इसका अभिनन्दन करता है, वह भी पापोंके नष्ट हो जानेसे विशुद्ध शरीरवाला हो पुरन्दर एवं महेश्वरसेवित स्थानको जाता है।
(अध्याय १८६)
हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पाण्डुकुलोद्भव महाराज युधिष्ठिर! अब इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ, पुण्यप्रद एवं महापातकोंके विनाशक हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि बतला रहा हूँ। इस दानमें भी पुण्य पर्वदिन आनेपर अपने घरके आँगनको गोबरसे उपलिस कर वेदीपर कृष्णमृगचर्मको फैलाकर उसके ऊपर रखे हुए तिलोंकी राशिपर स्वर्णमय रथकी स्थापना करे। वह रथ चार घोड़ोंसे युक्त हो। उसमें चार चक्के होने चाहिये और उसमें बैठनेकी जगह हो। लगामके साथ ब्रह्माको अग्र-भागपर बैठाये। उसे इन्द्रनीलमणिके कलश और ध्वजासे सुशोभित करना चाहिये। उसपर पद्मरागमणिके दलसे युक्त आठों लोकपालोंकी मूर्ति रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, जलसे भरे हुए चार कलश तथा अठारह धान्य हों और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। उसे पुष्प-माला, ईख और फलसे संयुक्त तथा पुरुषसे समन्वित होना चाहिये। जो पुरुष जिस देवताका भक्त हो, वह उसीके नामका उच्चारण कर अधिवासन करे। अनन्तर उस हिरण्यरथकी पूजा करनी चाहिये। घोड़ेपर सवार दोनों अश्विनीकुमारोंको उसके चक्ररक्षकके रूपमें स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार पुण्यकाल आनेपर ब्राह्मणोंद्वारा पूर्ववत् स्नानकर देवताओंकी पूजा करके यजमान श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे तथा अञ्जलिमें पुष्प लेकर (उस रथकी) तीन बार प्रदक्षिणा कर दान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—
नमो नमः पापविनाशनाय
विश्वान्मने देवतुरङ्गमाय।
धाम्नामधीशाय भवाभवाय
रथस्य दानान्मम देहि शान्तिम्॥
वस्वष्टकादित्यमरुद्रणानां
त्वमेव धाता परमं निधानम्।
यतस्ततो मे हृदयं प्रयातु
धर्मैकतान्तवमघौघनाशात्॥
(उत्तरपर्व १८७।१०-११)
‘पापसमूहके लिये दावाग्रिवस्वरूप देव! आप पापोंके विनाशक, विश्वान्मा, वेदरूपी घोड़ोंसे युक्त, तेजोंके अधीश्वर और सूर्यरूप हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। इस हेमरथ-दानसे आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये। चूँकि आप ही आठों वसुओं, आदित्यगणों और मरुद्रणोंके भरण-पोषण करनेवाले और परम निधान हैं। अतः आपकी कृपासे पापसमूहके नष्ट हो जानेसे मेरा हृदय धर्मकी एकतान्ताको प्राप्त हो।’ इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें भव-भयनाशक इस अश्वरथका दान करता है, उसका शरीर पापसमूहसे मुक्त हो जाता है और वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है तथा ब्रह्माके साथ चिरकालतक निवास करता है। जो प्राणी इस लोकमें सुवर्णतुरगरथ नामक महादानकी विधिको पढ़ता या सुनता है, वह कभी नरकमें नहीं जाता।
(अध्याय १८७)
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