भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 613, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें६०२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण आदिके समयोंमें तथा अन्य पर्वोंमें पुष्पसे एक मण्डप बनाकर उसमें एक द्रोण (बत्तीस सेर) परिमाणवाले तिलोंके ऊपर ब्रह्माण्डको स्थापित करना चाहिये। कुंकुमचूर्णसे चर्चित कर दो वस्त्रोंसे ढककर गन्ध, धूप आदिसे उस ब्रह्माण्डकी पूजा करनी चाहिये। उसके चारों ओर पूर्ण कलशकी स्थापना कर अठारह प्रकारके धान्य एक-एक द्रोणके परिमाणमें रखे। खड़ाऊँ, जूता, छता, पात्र, आसन, दर्पण, भोजन आदि सभी सामग्रियोंको भी वहाँ रखे। इस विधिसे घरमें अथवा मण्डपमें ब्रह्माण्डकी प्रतिमा स्थापित कर एक हस्त प्रमाणवाला एक चौरस कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदोंको जाननेवाले चारणिक ब्राह्मणोंसे जो वस्त्रादि आभूषणोंसे अलंकृत हों, हवन कराना चाहिये। उपाध्याय और राजाके पुरोहित भी हवन करें। ग्रहयज्ञविधिसे हवन करना चाहिये। विष्णु, शिव, ब्रह्मा आदि देवताओंके नाममन्त्रोंसे तिलोंकी आहुति देकर दस हजार आहुति महाव्याहृतियोंसे दे और ब्राह्मण रुद्रिका पाठ भी करें। उसके बाद यजमान स्नान कर श्वेत वस्त्र धारण कर सभी उपचारोंसे ब्रह्माण्डका पूजनकर पुष्पाञ्जलि लेकर इस प्रकार प्रार्थना करे—
नमो जगत्प्रतिष्ठाय विश्वधाम्ने नमोऽस्तु ते ॥
वाइमनोऽतीतरूपाय ब्रह्माण्ड शुभकृद्भव।
ब्रह्माण्डोदरवतीनि यानि सत्त्वानि कानिचित् ॥
तानि सर्वाणि मे तुष्टिं प्रयच्छन्वतुलां सदा।
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च लोकपालास्तथा ग्रहाः ॥
नक्षत्राणि तथा नागा ऋषयो मरुतस्तथा।
सर्वे भवन्तु संतुष्टाः सप्तजन्मान्तराणि मे ॥
(उत्तरपर्व १७७।१९—२२)
‘जगत्की प्रतिष्ठा करनेवाले विश्वधामन्! आपको नमस्कार है। वाणी एवं मनसे अतीत रूपवाले
ब्रह्माण्ड! आप मेरे लिये कल्याण करनेवाले हों। ब्रह्माण्डके उदरमें रहनेवाले जितने भी सत्त्व हैं, वे सभी मुझे अतुल तुष्टि प्रदान करें। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, लोकपाल, ग्रह, नक्षत्रमण्डल, नागगण, ऋषि तथा मरुद्गण सात जन्मोंतक मुझपर संतुष्ट रहें।’
इस प्रकार पुष्पाञ्जलि देकर दक्षिणासहित ब्रह्माण्ड-प्रतिमा ब्राह्मणको दानमें देनी चाहिये।
राजन्! इस दानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें। सत्ययुगमें ऐश्वर्यवान्, धनवान्, शक्तिशाली, दस हजार हाथियोंके बराबर बलवाला सुद्युम्न नामका एक राजा हुआ है। वह तीस हजार वर्षोंतक निष्कण्टक राज्य करनेके बाद अपने पुत्रको राज्यभार सौंपकर विरक्त हो वनमें तपस्या करने चला गया। वहाँ उसने घोर तपस्या की। अन्त-समयमें वह दिव्य विमानपर चढ़कर इन्द्रादि लोकोंको पार करता हुआ ब्रह्मलोक चला गया। वहाँ ब्रह्माजीने उसका बड़ा आदर-सत्कार किया और श्रेष्ठ आसन देकर बैठाया। वह वहाँ निवास करने लगा। यद्यपि वहाँ सभी आनन्दकी सामग्रियाँ उपलब्ध थीं; किंतु वह दिव्य भोगोंको भोगनेमें असमर्थ रहता। ब्रह्मलोकमें रहते हुए भी वह भूख-प्याससे दुःखी रहता था। एक बार उसने हाथ जोड़कर ब्रह्माजीसे प्रार्थना की—‘भगवन्! यह ब्रह्मलोक सभी दोषोंसे रहित है, फिर भी यहाँ रहते हुए मुझे भूख-प्यास सता रही है, आप कृपाकर बतलाइये कि यह मेरे किस कर्मका कुफल है।’
ब्रह्माजी बोले—राजन्! तुमने भलीभाँति राज्यका भोग किया। प्रजाओंका पालन किया। यद्यपि तुम अध्यात्मवादी थे, पर दानादि सत्कर्म नहीं किये और उन्हें प्रतिबन्धक रूपमें समझा। तुम ज्ञानी हो, तुमने तप किया है, इस कारण तुम्हें यह ब्रह्मलोक प्राप्त हुआ, किंतु दान आदि सत्कर्म न करनेके कारण
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth