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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 614, कुल 654 में से

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पृष्ठ 614
  • उत्तरपर्व *

६०३

यहाँ रहते हुए भी तुम भूख-प्याससे व्याकुल हो।

राजाने कहा—प्रभो! यदि ऐसी बात है तो मुझपर कृपाकर मेरी भूख-प्यास दूर करनेके लिये कोई उपाय बतलाइये।

ब्रह्माजी बोले—राजन्! अब तुम भूलोकमें जाओ और सम्पूर्ण कामनाओंको सफल बनानेवाले ब्राह्मणोंको ब्रह्माण्डकी प्रतिमा दान करो, उससे तुम्हें तृप्ति हो जायगी। ब्रह्माजीके उपदेशसे राजाने पृथ्वीलोकमें आकर ब्राह्मणोंको ब्रह्माण्ड-दान किया। फलस्वरूप उसने पुनः स्वर्गमें शाश्वती तृप्ति प्राप्त की।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! यह मैंने

ब्रह्माण्डके महादानका फल बतलाया। जिसने ब्रह्माण्डका दान किया उसने मानो सम्पूर्ण चराचर जगत्का दान कर लिया। वह अपने कुलोंका उद्धार कर देता है और छत्तीस मन्वन्तरोंतक ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है। पुनः मनुष्यलोकमें आकर धार्मिक कुलमें जन्म लेता है। उसे न दरिद्रता सताती है, न व्याधि होती है और न अपने इष्टजनोंसे वियोग होता है। जो इस दानके माहात्म्यको भक्तिपूर्वक सुनता है अथवा सुनाता है, वह भी सद्गति प्राप्त करता है। फिर जो इस ब्रह्माण्ड-दानको करता है, उसके विषयमें क्या कहना। (अध्याय १७७)

कल्पवृक्ष एवं कल्पलतादानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! जब भगवान् शंकरका माता पार्वतीके साथ विवाह हुआ तो उनके अपत्यकी कल्पनाकर देवगण भयभीत हो गये। वे सभी भगवान् शंकरके पास गये और उनसे ऊर्ध्वरेता रहनेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान् शंकर कुछ खिन्न-से होकर कहने लगे—‘देवगण! आपलोग भयभीत न हों, मैं स्थाणुके रूपमें स्थित रहूँगा। इसपर माता पार्वतीने क्रुद्ध होकर देवताओंको शाप दे डाला कि जिस प्रकार आपलोगोंने मुझे पुत्रसे रहित किया है, उसी प्रकार आप सबको भी पुत्रोंकी प्राप्ति नहीं होगी।’ देवताओंको इस प्रकार शाप देकर पार्वतीने भगवान् शंकरसे कहा—‘जगत्पते! अब तो हमें पुत्र उत्पन्न होगा नहीं। अपुत्रकी गति नहीं होती है ऐसा श्रुति कहती है। अतः हे महाभाग! दोनों लोकोंमें जैसे उद्धार हो, वैसा कोई आप उपाय बतलायें।’

भगवान्ने कहा—देवि! पुत्ररहित पुरुष अथवा

नारीको चाहिये कि सुवर्णका एक कल्पवृक्ष बनाकर उसका दान करे। इससे सद्गति प्राप्त होगी अथवा किसी वृक्षमें कल्पवृक्षकी कल्पनाकर उसमें पुत्रत्वकी भावना करनी चाहिये। इससे अपुत्रवान् पुत्रवान् हो जाता है। देवि! इसमें कोई संदेह नहीं है। अतः कल्पवृक्षका दान करना चाहिये। कल्पवृक्ष शुद्ध सुवर्णका होना चाहिये। उसमें बहुत-सी शाखाएँ और पत्र-पुष्प हों। उसे रत्नोंसे अलंकृत तथा फलोंसे सुसज्जित करना चाहिये। नृपसत्तम! वह कल्पवृक्ष अपनी शक्तिके अनुसार बीस पल सुवर्णसे अधिकका होना चाहिये। इसी प्रकार चाँदीसे भी बनाया जा सकता है। नदीके तटपर, घरपर या देवालयमें पूर्व आदि दिशामें एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिये। मण्डप दस हाथ प्रमाणका होना चाहिये। दस हाथकी वेदी भी निर्मित करनी चाहिये। मण्डपके अग्निकोणमें मेखलायुक्त प्रामाणिक एक अग्निकुण्ड भी बनवाये। वैदिक ब्राह्मणोंका वरण

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