भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 615, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें६०४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
करे। एक उपदेश ब्राह्मणका भी वरण करे। उस कल्पवृक्षको एक प्रस्थ प्रमाणवाले गुडराशिपर स्थापित करे। उस वृक्षकी पाँच शाखाओंपर ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा सूर्यका चित्राङ्कन करे। वृक्षके नीचेकी शाखामें स्त्रीसहित कामदेवके चित्रकी रचना करनी चाहिये। कल्पवृक्षके पूर्वभागमें नमकके ऊपर संतानवृक्षको स्थापित करे और संतानवृक्षपर गायत्रीकी स्थापना करे। कल्पवृक्षके दक्षिण भागमें घृतके ऊपर श्रीदेवीके साथ मन्दार नामक देववृक्षकी स्थापना करे। इसी प्रकार उसी वृक्षके पश्चिम भागमें (जीराके ऊपर) उमाके साथ पारिजात वृक्षकी और उत्तर दिशामें तिलोंके ऊपर सुरभी (गौ)-के साथ हरिचन्दनवृक्षको स्थापित करे। पुनः रेशमी वस्त्रसे वेष्टित, ईख, पुष्पमाला और फलोंसे संयुक्त आठ पूर्ण कलशोंको चारों ओर स्थापित करे। अग्निप्रणयन करके वृक्षोंका अधिवासन करे। अनेक प्रकारके धान्य तथा भक्ष्य-भोज्य नैवेद्योंको भी स्थापित करे। चारों ओर दीपमाला प्रज्वलित कर दे। अनन्तर कल्पवृक्षकी पूजा कर प्रार्थना करे —
कामदस्त्वं हि देवानां कामवृक्षस्ततः स्मृतः ।
मया सम्पूजितो भक्त्या पूरयस्व मनोरथान् ॥
(उत्तरपर्व १७८। ३१)
‘कल्पवृक्ष! आप देवताओंकी इच्छाओंको पूर्ण करनेवाले हैं। इसीलिये आपको कामवृक्ष कहा गया है। मैंने भक्तिपूर्वक आपकी पूजा की है, आप मेरे मनोरथोंको पूर्ण करें।’ इस प्रकार पूजन करनेके बाद रात्रिमें महोत्सवपूर्वक जागरण करे। ब्राह्मण हवन करें। सभी स्थापित देवताओंको हवनसे आप्यायित करे। प्रातःकाल उठकर स्नानादि कर श्वेत वस्त्र धारण कर शुभ मुहूर्तमें उस कल्पवृक्षका दक्षिणाके साथ दान कर देना चाहिये। कल्पवृक्षकी तीन बार प्रदक्षिणा कर
प्रणाम करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे— नमस्ते कल्पवृक्षाय वित्तार्थप्रदाय च। विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये॥ यस्मात् त्वमेव विश्वान्मा ब्रह्मस्थानुदिवाकराः । मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन॥
(उत्तरपर्व १७८। ३७-३८)
‘कल्पवृक्ष! आप प्रचुरमात्रामें अर्थ प्रदान करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। देव! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले विश्वमूर्ति हैं, आपको प्रणाम है। सनातन! चूँकि आप विश्वान्मा, ब्रह्मा, शिव, दिवाकर, मूर्त, अमूर्त तथा इस चराचर विश्वके परम कारणरूप हैं, अतः मेरी रक्षा कीजिये।’
इस प्रकार आमन्त्रित कर उस कल्पवृक्षको गुरुको समर्पित कर दे एवं चार संतान आदि देववृक्षोंको ऋत्विजोंको समर्पित करे। इस विधिसे दान करनेवाला सूर्यके तेजके समान कान्तिमान्, अप्सराओंसे परिव्याप्त, किंकिणीजालसे अलंकृत सुन्दर विमानपर चढ़कर सभी बाधाओंसे रहित निर्विघ्न इन्द्रलोकको जाता है। पुण्यकर्मके समाप्त होनेके बाद वह पुनः पृथ्वीपर आकर श्रोत्रिय-कुलमें उत्पन्न होता है तथा पराक्रमी, विद्वान्, यज्ञकर्ता एवं धार्मिक राजा होता है। अन्तमें वह भगवान् विष्णुके लोकको प्राप्त करता है।
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! संसारका कल्याण करनेके लिये किसी ऐसे दान, व्रत आदिको बतलायें, जिससे मनुष्य यश और लक्ष्मीसम्पन्न, निष्पाप और दीर्घायु हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—संसारके हितकी इच्छासे मैं वह उपाय बतला रहा हूँ, जिससे मानव भाग्यशाली होता है। कनक-कल्पलताके दानसे मनुष्य सौभाग्यशाली हो जाता है। कल्पवृक्ष-दानकी विधिसे ही इसका भी दान करना
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth