भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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चाहिये। विधिपूर्वक दिक्पाल-होम, आधार-आज्यभाग-हवन, ग्रहयाग तथा व्याहृतियोंसे भी हवन करना चाहिये। हवन आदिके अनन्तर किसी पुण्य पर्वमें स्नानादिसे पवित्र होकर फल, अक्षत, वस्त्र, पुष्प, धूप आदिसे कल्पलताकी अर्चना करनी चाहिये। तदनन्तर प्रदक्षिणा कर इन मन्त्रोंसे उसकी प्रार्थना करनी चाहिये—
नमो नमः पापविनाशिनीभ्यो
ब्रह्माण्डलोकेश्वरपालनीभ्यः ।
आशाशताधिक्यफलप्रदाभ्यो
दिग्भ्यस्तथा कल्पलतावधूभ्यः ॥
या यस्य शक्तिः परमा प्रदिष्टा
वेदे पुराणे सुरसन्तमस्य ।
तां पूजयामीह परेण साम्रा
सा मे शुभं यच्छतु तां नतोऽस्मि ॥
(उत्तरपर्व १७९।१०-११)
‘पापोंका विनाश करनेवाली, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और लोकेश्वरोंका पालन करनेवाली एवं आशासे
अधिक सैकड़ों फल प्रदान करनेवाली दिग्बधूरूपी कल्पलता देवियो! आपको बार-बार नमस्कार है। वेदों तथा पुराणोंमें आप देवताओंकी परम शक्ति कही गयी हैं, अतः शक्तिस्वरूपा कल्पलते! मैंने सामध्वनिसे आपका पूजन किया है, आप मेरा कल्याण करें, आपको नमस्कार है।’
इस प्रकार प्रार्थनाकर दस दिशारूपी दस कल्पलताएँ ब्राह्मणोंको दान कर दे और क्षमा-याचना करे। इस विधिके अनुसार दान करनेवाला इस लोकमें विजयी, धनवान् और पुत्रवान् होता है। मरनेके बाद इन्द्रलोकमें मन्वन्तरपर्यन्त निवास करता है। अनन्तर पृथ्वीपर चक्रवर्ती राजा होता है। जो नारी यह दान देती है, वह शक्तिसमन्वित चक्रवर्ती पुत्रको जन्म देती है। जो इस कल्पलताके* दानको देखता है, अनुमोदन करता है अथवा इसके माहात्म्यको सुनता है वह भी मुक्त हो जाता है।
(अध्याय १७८-१७९)
गजरथ-अश्वरथदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने पूछा—भगवन्! अपनी शक्तिके द्वारा प्राप्त सम्पत्तिसे राजाओंको तथा अधर्मसे डरे हुए, ग्रहपीडासे संतप्त एवं दुःस्वप्न आदिसे दुःखित पुरुषोंको कौन-सा दान देना चाहिये, जो ऐहिक तथा पारलौकिक कामनाओंको पूर्ण करनेवाला हो, ऐसे किसी विशिष्ट दानका आप वर्णन करें।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! ऐसे कल्याणकारी श्रेष्ठ दानको आप सुनें, जो विशेषरूपसे राजाओंका हितसाधक है। शास्त्रोंमें गोदान आदि अनेक श्रेष्ठ दान बतलाये गये हैं, किंतु उनमें राजाओंके लिये जो प्रधान दान है, उसे मैं
आपको बतला रहा हूँ, जिसे शुक्राचार्यने दैत्यराज बलिको बतलाया था, वह दान गजरथाश्वरथदान है। शुक्राचार्यजीने बलिले कहा था—‘दैत्यपते! जिस गजरथाश्वरथदानसे सभी पाप, भयंकर आधि-व्याधियाँ एवं ग्रहपीडाएँ नष्ट हो जाती हैं और श्रेष्ठ पुण्यकी प्राप्ति होती है, उसे आप सुनें।’
कार्तिककी पूर्णिमा, अयनसंक्रान्ति, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, विषुवयोग और सूर्यकी संक्रान्तिमें अथवा किसी पुण्य दिनमें यह दान करना चाहिये। काष्ठका एक दिव्य रथ बनाकर उसे स्वर्णसे मण्डित करे। वह रथ सुन्दर चक्के, धुरे, नेमि, जूआ आदिसे
- मत्स्यपुराण अ० २८६ में कनककल्पलता-दानको स्पष्ट विधि निर्दिष्ट है। वहाँ स्वर्णनिर्मित इन्द्राणी, आग्रेयी, नैऋती, वारुणी, वायवी, कौबेरी आदि दस दिशा-देवियों तथा कल्पलताओंके निर्माणकी विधि भी दी गयी है।
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