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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 617, कुल 654 में से

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पृष्ठ 617

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

समन्वित हो। उसे स्वर्णध्वज तथा सफेद एवं कृष्ण पताकाओं और पुष्पमालाओंसे मण्डित करना चाहिये। ऐसा रथ बनाकर किसी शुभ दिनमें जलमय स्थान अथवा नदीके किनारे, गोशाला या घरके आँगनमें एक श्रेष्ठ वेदीपर पुराण और वेदविद्याके ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मण उसे स्थापित करे। रथके मध्यमें ब्रह्माकी स्थापना करे और प्रणवद्वारा उनकी पूजा करे। उत्तरमें विष्णुकी स्थापना कर पुरुषसूक्तसे उनकी पूजा करे। दक्षिणमें भगवान् रुद्रकी स्थापना कर रुद्रसूक्तद्वारा उनका पूजन करे। सूर्यादिग्रहोंकी पुष्प, गन्ध, फल, नैवेद्य, दीप, वस्त्र और मालाओंद्वारा पूजा करे। शङ्खु, भेरी और मृदंगोंके शब्द एवं ब्रह्मघोषके द्वारा महान् उत्सव कराये।

अनिकोणमें एक हाथ प्रमाणवाला एक कुण्ड बनाकर विभिन्न वैदिक शाखाओंके अध्येता ब्राह्मणोंकी पूजा करे। चार या आठ ब्राह्मणों तथा एक आचार्यका वरण करे। तिल एवं घृतके द्वारा हवन करे। इस प्रकार द्विजोंके साथ यजमान यज्ञविधि सम्पन्न कर शुभ लक्षणोंसे समन्वित दो श्रेष्ठ हाथियोंको रथमें नियोजित करे। वे हाथी घण्टा, हेमपट्ट, सुन्दर तिलक, शङ्खु, चामरसे सुशोभित हों, दिव्य मुक्ता-मालाओंसे परिव्याप्त हों, दिव्य अंकुशसे समन्वित दो महावत भी रहें। इस प्रकार दिव्य रथ बनवाकर सभी श्रेष्ठ वस्त्र, आभूषण एवं माला आदिसे सत्कृत तथा धनुष-बाण, कवच आदि आयुधोंसे सुसज्जितकर ब्राह्मणको रथपर बिठलाये। अनन्तर श्वेत वस्त्रधारी यजमान रथकी परिक्रमा कर पुष्पाञ्जलि लेकर सभी पापोंका नाश करनेवाले इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—

कुमुदैरावणौ पद्मः पुष्यदन्तोऽथ वामनः।

सुप्रतीकोऽञ्जनः सार्वभौमोऽष्टौ देवयोनयः॥

तेषां वंशप्रसूतौ तु बलरूपसमन्वितौ।

तद्युत्तरथदानेन मम स्यातां वरप्रदौ॥

रथोऽयं यज्ञपुरुषो ब्राह्मणोऽत्र शिवः स्वयम्।

ममेभरथदानेन प्रीयेतां शिवकेशवौ॥

(उत्तरपर्व १८०।२१—३१)

‘कुमुद, ऐरावण (ऐरावत), पद्म, पुष्यदन्त, वामन, सुप्रतीक, अञ्जन तथा सार्वभौम—ये आठ गज देवयोनियें उत्पन्न हैं। इनके वंशमें उत्पन्न ये दो गज अत्यन्त बलवान् और रूपवान् हैं। इस रथमें इनको नियोजित कर देनेसे और गजयुक्त रथका दान करनेसे ये गज मेरे लिये वर प्रदान करनेवाले हों। यह रथ यज्ञपुरुष साक्षात् विष्णुरूप है और इसपर बैठे ब्राह्मण शिवस्वरूप हैं। इसलिये इन गजोंसे युक्त रथके दान करनेसे भगवान् विष्णु तथा शंकर मुझपर प्रसन्न हों।’

ऐसा कहकर उस रथपर बैठे ब्राह्मणकी रथसहित पुनः प्रदक्षिणा कर वह रथ उन ब्राह्मणको दान कर दे। रथको ब्राह्मणदेवताके द्वारतक पहुँचाकर पुनः अपने घर वापस आ जाय। इस प्रकार दान-कार्यके पूर्ण होनेपर अंधे, दीन, मूक, बधिर, अनाथोंको वस्त्र और भोजन आदिसे संतुष्ट करे, गोदान करे।

राजन्! इसी प्रकार एक दूसरा रथ बनाकर उसमें जीन, लगाम आदिसे संयुक्त दो शुभ लक्षणोंवाले घोड़ोंको अलंकृत कर जोतना चाहिये। पूर्वरीतिसे हवन आदि कार्य करने चाहिये। उस उत्तम रथपर ब्राह्मणको बिठाकर उसकी भी पूजा करनी चाहिये और रथकी प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रसे प्रार्थनापूर्वक उस अश्वरथका दान करना चाहिये—

नमोऽस्तु ते वेदतुरङ्गमाय

त्रयीमयाय त्रिगुणात्मकाय।

सुदुर्गमार्गे सुखयानपात्रे

नमोऽस्तु ते वाजिधराय नित्यम्॥

रथोऽयं सविता साक्षाद् वेदाश्चामी तुरङ्गमाः।

अरुणो ब्राह्मणश्चायं प्रयच्छन्तु सुखं मम॥

(उत्तरपर्व १८०।४०-४१)

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