भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 618, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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‘वेदरूपी अश्वोंसे युक्त, वेदत्रयीस्वरूप, त्रिगुणात्मक, कठिन-से-कठिन मार्गोंमें सुखपूर्वक वहन कर ले जानेवाले अश्वरथ! आपको नित्य नमस्कार है। यह रथ साक्षात् भगवान् सूर्यका रूप है और ये घोड़े साक्षात् वेदरूप हैं तथा इसमें बैठे हुए ब्राह्मण अरुणरूप हैं। ये सभी मुझे सुख प्रदान करें।’
तदनन्तर उसके साथ ब्राह्मणके घरतक जाय।
इस विधिसे जो बुद्धिमान् व्यक्ति अश्वरथका दान करता है, वह सभी पापों तथा रोगोंसे रहित होकर सौ मन्वन्तरपर्यन्त दिव्य भोगोंसे समन्वित सूर्यके समान देदीप्यमान विमानपर आरूढ़ होकर श्रीसम्पन्न हो स्वर्गलोकमें निवास करता है। पुनः पुण्यक्षीण होनेपर पृथ्वीपर पुत्र-पौत्रसमन्वित, चिरजीवी, अतिथिसेवक एवं धार्मिक राजा होता है। (अध्याय १८०)
कालपुरुषदान-विधि
महाराज युधिष्ठिरने कहा—यदुश्रेष्ठ! सभी पापोंके नाश करनेवाले, मङ्गलप्रद पवित्र अन्य दानोंको आप मुझसे कहें, क्योंकि ज्ञान-विज्ञानके एकमात्र आश्रय और संसार-सागरसे उद्धार करनेवाला आपके अतिरिक्त कोई नहीं है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! मैंने अनेक प्रकारके दानोंकी आपसे चर्चा की, फिर भी यदि आपको उत्कण्ठा है तो मैं पुनः कह रहा हूँ। आप सबसे पहले दस महादानोंके विषयमें सुनें। उनमेंसे पहला दान है—कालपुरुषदान, दूसरा है सप्तसागरदान, इसी प्रकार महाभूतघटदान, शय्यादान, आत्मप्रतिकृतिदान, सुवर्णाश्वदान, सुवर्णाश्वरथदान, कृष्णाजिनदान, विश्वचक्रदान तथा हेमगजरथदान—ये दस महादान हैं। नृपश्रेष्ठ! आप दान करनेमें अपनी सदबुद्धि लगायें और अन्य लोगोंको भी दान-कर्ममें प्रेरित करें। धनीके लिये दानसे अतिरिक्त और कोई भी उपकार नहीं है। देनेवाले व्यक्तिका धन घटता नहीं है, अपितु देनेसे बढ़ता ही रहता है।
राजन्! अब आप कालपुरुषदानके विषयमें सुनें। कालपुरुषकी एक प्रतिमा बनानी चाहिये। चतुर्थी, चतुर्दशी अथवा विष्टिमें यह प्रतिमा काले तिलोंसे एक समतल भूमिपर पुरुषके आकारकी
बनवाये। उसके दाँत चाँदीके, आँखें सोनेकी बनाये, उसके हाथमें भयंकर तलवार हो, जपाकुसुमके समान उसके कानोंमें कुण्डल हों, लाल माला तथा लाल वस्त्र पहिने हो, शङ्खकी भी माला पहने हो। धनुष-बाण लिये हो। जूते पहने हो तथा बगलमें काला कम्बल लिये हो। इस प्रकार कालपुरुषकी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प और नैवेद्य आदिसे उसकी अर्चना करे। ‘त्र्यम्बकं’ (यजु० ३।६०) इस मन्त्रसे स्वर्गह्योक्त विधानसे तिल और घृतद्वारा १०८ आहुतियाँ दे। अनन्तर प्रसन्नहृदयसे यजमान इस मन्त्रका उच्चारण करे —
सर्वं कलयसे यस्मात् कालस्त्वं तेन भण्यसे। ब्रह्मविष्णुशिवादीनां त्वमसाध्योऽसि सुव्रत ॥ पूजितस्त्वं मया भक्त्या प्रार्थितश्च तथा सुखम्। यदुच्यते तव विभो तत् कुरुष्व नमो नमः ॥
(उत्तरपर्व १८१।२१-२२)
‘कालपुरुष! सब कुछ आपसे ही घटित होता है। इसलिये आप काल कहे जाते हैं। सुव्रत! ब्रह्मा, विष्णु, शिवसे भी आप असाध्य हैं। आपकी मैंने भक्तिपूर्वक आनन्दके साथ पूजा की है। विभो! मुझे आपसे सुखकी कामना है। आप उसे कृपापूर्वक पूर्ण करें, आपको बार-बार नमस्कार है।’
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