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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 612, कुल 654 में से

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पृष्ठ 612
  • उत्तरपर्व *

६०१

है। हे सुरोत्तम! पहले मुझे माताने जन्म दिया है। मैं मृत्युधर्मा हूँ, वही मैं आपके गर्भसे उत्पन्न होनेके कारण दिव्य शरीरयुक्त हो जाऊँ।'

तदनन्तर दूध, दही तथा घृतसे परिपूर्ण उस कलशको मण्डपमें प्रवेश कराये। बायें हाथमें सुवर्णनिर्मित धर्मराजकी प्रतिमा और दाहिने हाथमें सूर्यकी सुवर्णप्रतिमा लेकर मुट्ठी बाँधकर दोनों घुटनोंके बीच सिर करके पाँच बार साँस लेकर शिवका ध्यान करते हुए स्थित रहे। उस समय ब्राह्मण हिरण्यगर्भप्रतिमाका गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन और जातकर्म आदि संस्कार करें। अनन्तर आचार्य यजमानको उठाये। संस्कारके समय यजमान किसी व्यक्तिके मुखको न देखे। उसके बाद उठकर प्रदक्षिणा कर वेदध्वनिपूर्वक यजमानको स्नान कराना चाहिये और सुवर्ण, चाँदी, ताम्र अथवा मिट्टीके आठ कलशोंके अभिमन्त्रित जलसे 'देवस्य त्वा' इस मन्त्रद्वारा आठ ब्राह्मण यजमानको एक पीठपर बैठाकर उसका अभिषेक करें और कहें— अद्य जातस्य तेऽङ्कानि अभिषेक्ष्यामहे वयम्। दिव्येनानेन वपुषा चिरं जीव सुरखी भव॥

(उत्तरपर्व १७६।५४)

'आज उत्पन्न हुए तुम्हारे इन अङ्गोंका हमलोग अभिषेक कर रहे हैं। अब तुम इस दिव्य शरीरसे चिरकालतक जीवित रहो और आनन्दका उपभोग करो।' इसके बाद यजमान संकल्पपूर्वक उस हिरण्यगर्भ-प्रतिमाको ब्राह्मणोंको दान कर दे, अन्य ब्राह्मणोंकी भी पूजा करे। यज्ञकी अन्य सभी सामग्रियाँ गुरुको अर्पणकर पादुका, छत्र, वस्त्र, आसन आदि सामग्री सभासद ब्राह्मणोंको देनी चाहिये। दीन, अन्ध, कृपण आदिको भोजनसे संतुष्ट करना चाहिये। उस दिन अन्न-सत्र करना चाहिये। इस विधिसे जो व्यक्ति हिरण्यगर्भका दान करता है, वह अपने कुलका उद्धार करते हुए स्वयं भी दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। वहाँ एक सौ मन्वन्तरपर्यन्त इन्द्रके समान सुख भोगकर भूलोकमें जन्म लेकर पराक्रमी, धार्मिक, सत्यवादी, ब्राह्मण-गुरुओंका भक्त और शत्रुओंको जीतनेवाला सम्पूर्ण जम्बुद्वीपका राजा होता है। जो व्यक्ति इस विधिको सुनता है, वह भी सौ वर्षसे अधिक स्वर्गसुखका भोग करता है।

(अध्याय १७६)

ब्रह्माण्डदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं महर्षि अगस्त्यजीद्वारा बतायी गयी ब्रह्माण्डदानकी विधि बता रहा हूँ। इससे शारीरिक, मानसिक तथा वाचिक तीनों प्रकारके पाप दूर हो जाते हैं और यश, धन, आयु, मङ्गल तथा सद्गति प्राप्त होती है।

अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे लेकर एक हजार पलतककी ब्रह्माण्डकी सुवर्ण-प्रतिमा

बनाये*। उसकी लम्बाई-चौड़ाई बारह अङ्गुलसे लेकर सौ अङ्गुलतक होनी चाहिये। उसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, गन्धर्व, नाग, राक्षस, नदी, सरोवर, समुद्र, पर्वत, दिग्गज आदि चित्रित करे। बीचमें मेरु पर्वतके शिखरोंपर पत्तियोंसहित ब्रह्मा, विष्णु और शिवको भी अङ्कित करे। उसमें आठों दिग्गजों और चौदह भुवनोंको भी चित्रित करे। इस प्रकारके सुवर्णमय ब्रह्माण्डका श्रेष्ठ शिल्पीद्वारा निर्माण करवाये।

  • ब्रह्माण्ड-निर्माण एवं दानकी संस्कल्प पूरी विधि दानसागर, दान-मयुख, दानचन्द्रिका, दानकल्पतरुमें है। अधिक जाननेकी इच्छा रखनेवाले सज्जनोंको इसे वहाँ देखना चाहिये। मत्स्यपुराण अध्याय २७६ में भी यह अध्याय इसी प्रकार प्राप्त होता है।

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