सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 611, कुल 654 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 611

६००

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

नदियोंके तटपर हिरण्यगर्भका दान करना चाहिये अथवा घर, देवालय, बाग, तड़ाग आदि पवित्र स्थानोंमें यह दान करना चाहिये। सर्वप्रथम भूमिशोधनकर बारह हाथ लम्बा-चौड़ा एक मण्डप बनाकर उसे स्तम्भ, तोरण, पताका आदिसे अलंकृत करे। मण्डपके बीचमें पाँच हाथकी वेदी बनाकर उसमें वितान लगाकर उसे फूलमाला आदिसे सजा दे। वेदीपर हिरण्यगर्भ-कलशको स्थापित करना चाहिये। सर्वप्रथम वस्त्र तथा आभूषणसे शिल्पीका पूजनकर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर कार्य आरम्भ करे। शिल्पी उत्तम सुवर्णसे हिरण्यमय माङ्गलिक कलशकी रचना करे। उसकी ऊँचाई चौंसठ अङ्गुल कही गयी है और मुख ऊँचाईका तीसरा भाग हो। कलशकी पेंदी मुख-परिमापसे आधा रहे। उसकी गोलाई कर्णिकाके समान हो। यह कलश सुन्दर, ग्रन्थिविहीन होना चाहिये। कलशका ढक्कन मुखके परिमापसे एक अङ्गुल अधिक रहे और उसके समीप दस अस्त्र सुवर्णनाल, सूर्यमूर्ति, स्वर्णमय सूची, क्षुर तथा कमण्डलु, छत्र, पादुका आदि सभी सामग्रियोंके साथ ब्रह्माकी मूर्ति स्थापित करनेके बाद वेदध्वनि एवं शङ्ख आदिकी मङ्गलध्वनि करते हुए ब्राह्मण उस हिरण्यगर्भ-कलशको हाथी अथवा रथसे मण्डपमें ले आये। वहाँ वेदीके ऊपर एक द्रोण तिल रखकर उसपर उसे स्थापित करना चाहिये। उसके बाद हिरण्यगर्भको कुंकुमसे उपलिसकर तथा रेशमी वस्त्रसे ढककर पुष्पमालाओंसे अलंकृत करे। तदनन्तर धूप, दीप आदिसे उसकी पूजा करे और यह कहकर नमस्कार करे—

भूलोकप्रमुखालोकास्तव गर्भे व्यवस्थिताः ॥

ब्रह्मादयस्तथा देवा नमस्ते भुवनोद्भव ।

नमस्ते भुवनाधार नमस्ते भुवनेश्वर ॥

नमो हिरण्यगर्भाय गर्भे यस्य पितामहः ।

(उत्तरपर्व १७६ । ३०—३२)

‘भुवनोद्भव ! भूलोक आदि सभी लोक तथा ब्रह्मा आदि देवगण आपके गर्भमें स्थित हैं। अतः विश्वाधार ! विश्वेश्वर ! आपको नमस्कार है। जिनके गर्भमें पितामह स्थित हैं, अतः हिरण्यगर्भको प्रणाम है।’

इस प्रकार पूजा करनेके बाद एक रात्रिक उसका अधिवासन करना चाहिये। वेदीके चारों ओर चौरस चार कुण्ड बनाकर उसमें चार वेदवेत्ता ब्राह्मण क्रमसे मौन होकर हवन करें। वे ब्राह्मण उत्तम वस्त्र आदिसे अलंकृत हों तथा उनकी गन्ध, धूप आदिसे पूजा कर दो-दो ताम्रपात्र देने चाहिये। वेदीके ईशानकोणमें ग्रहवेदी बनाकर उसपर नवग्रह, दस दिक्पाल और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवकी सुवर्ण-प्रतिमा स्थापित कर गन्ध, पुष्प, अक्षत तथा वस्त्र आदिसे उनकी पूजा करे। पताका—तोरण आदिसे मण्डपको अलंकृत करे। मण्डपके द्वारोंपर रत्नयुक्त दो-दो कलश स्थापित कर तुलापुरुषदानकी रीतिसे लोकपालोंका आवाहन कर नैवेद्यादि बलि देनी चाहिये। इस यज्ञमें पलाशकी समिधा हवनके लिये उत्तम होती है। चरु, तिल एवं गायके घृतसे व्याहृति और ग्रहों तथा देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे बीस हजार आहुतियाँ दे। शुभ मुहूर्तमें यजमान स्नानकर श्वेत वस्त्र धारण कर हिरण्यगर्भका पूजन करनेके बाद इस प्रकार प्रार्थना और प्रदक्षिणा करे—

नमो हिरण्यगर्भाय विश्वगर्भाय वै नमः ।

चराचरस्य जगतो गृहभूताय ते नमः ॥

मात्राहं जनितः पूर्व मर्त्यधर्मा सुरोत्तम ।

त्वद्भर्तसम्भवादद्य दिव्यदेहो भवाम्यहम् ॥

(उत्तरपर्व १७६ । ४२-४३)

‘हिरण्यगर्भको नमस्कार है। विश्वगर्भको प्रणाम है। हे चराचरजगत्के गृहभूत ! आपको नमस्कार

In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth