भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 620, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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महाभूतघटदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं महापातकोंको नष्ट करनेवाले अत्युत्तम महाभूतघटदानकी विधि बता रहा हूँ। पुण्य दिनमें आँगनको लीपकर रलोंसे समन्वित सुवर्ण-कुम्भका निर्माण करे। कलशको प्रादेशमात्रसे सौ अङ्गुलपर्यन्त अपनी शक्तिके अनुसार पाँच पलसे सौ पलतक बनाना चाहिये। उस घटको दुग्ध और घृतसे पूर्ण करके उसके समीप कल्पवृक्षको स्थापित करे। वहीं पद्मासनपर आसीन ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वरको स्थापित करे। लोकपाल और इन्द्रादिको अपने-अपने वाहनोंसे युक्त करके स्थापित करना चाहिये। अक्षसूत्रके साथ ऋग्वेद, कमलके साथ यजुर्वेद, वीणा लिये हुए सामवेद, सुक् लिये तथा सुन्दर माला पहने अथर्ववेद और पञ्चम वेद पुराणको अक्षसूत्र, कमण्डलु तथा वरदमुद्रायुक्त प्रतिमारूपमें स्थापित करना चाहिये। घटके चारों ओर सप्तध्यान्य, चरणपादुका, जूता, छाता, चामर, शय्या आदिको भी स्थापित करना चाहिये। पुष्पमाला और अन्य उपचारोंद्वारा स्थापित घटकी पूजा करे। शुभ मुहूर्तमें स्नानकर तीन बार उस घटकी तथा वेदादि प्रतिमाओंकी प्रदक्षिणा कर इस मन्त्रका उच्चारण करे—
यस्मान्न किंचिदप्यस्ति महाभूतैर्विना कृतम्। महाभूतमयश्चायं तस्माच्छान्तिं ददातु मे॥ अत्र सन्निहिता देवाः स्थापिता विश्वकर्माणा। ते मे शान्तिं प्रयच्छन्तु भक्तिभावेन पूजिताः॥
(उत्तरपर्व १८३। १०-११)
‘चूँकि महाभूतोंके बिना इस संसारमें अन्य कुछ भी नहीं है, सब महाभूतमय ही है। इसलिये महाभूतमय यह घट मुझे शान्ति प्रदान करे। सभी देवगण विश्वकर्माके द्वारा इसमें स्थापित हैं, भक्तिभावसे पूजित वे सब मुझे शान्ति प्रदान करें।’
इस प्रकार महाभूतघटकी पूजाकर वस्त्र तथा अलंकारादिसे ब्राह्मणकी भी पूजा करे और पुण्यकालमें महाभूतघट ब्राह्मणको प्रदान कर दे। अनन्तर प्रदक्षिणाकर ब्राह्मणसे क्षमा-याचना करे। इस विधिसे जो व्यक्ति महाभूतमयघटका दान करता है, वह अपने इक्कीस कुलके साथ शिवलोकमें जाता है। पुण्यक्षीण होनेपर वह इस लोकमें आकर धार्मिक राजा होता है और शत्रुसे अजेय, पराक्रमी, क्षत्रियधर्ममें निरत, विद्वान् एवं देवताओं और ब्राह्मणोंका भक्त होता है।
(अध्याय १८३)
शय्यादान एवं मृतशय्यादान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पाण्डुकुलोद्भव! अब मैं शय्यादानकी विधि बता रहा हूँ, जिससे व्यक्ति इस लोकमें और परलोकमें सुखभागी होता है, यह जीवन अनित्य है, इसलिये शय्यादान करना चाहिये। मृत्युके अनन्तर यह दान कैसे हो पायेगा, इसलिये अपने जीवनमें ही कर लेना चाहिये। भारत! जबतक जीवन रहता है, तभीतक मनुष्य भाई, पिता, बन्धु आदिका स्नेह प्राप्त करता
है, पुनः उसीको मर गया समझकर सबका स्नेह छूट जाता है। इसलिये शय्या, भोजन तथा जल आदिका स्वयं दान कर लेना चाहिये, क्योंकि यह मनमें निश्चित ध्यान रखना चाहिये कि आत्मा ही मेरा बन्धु है अर्थात् स्वयं ही स्वयंका बन्धु है। जिसने दान तथा भोगादिके द्वारा अपनी आत्माको संतुष्ट नहीं कर लिया, उसके लिये स्वयंसे बड़ा और कौन अहितकर होगा? मर जानेपर कौन
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