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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 621, कुल 654 में से

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पृष्ठ 621

६१० * संक्षिप्त भविष्यपुराण *

उसकी पूजा करेगा ? इसलिये मानवको चाहिये कि श्रेष्ठ काष्ठकी एक दृढ़ शय्याका निर्माण करे, उसे हाथी-दाँत और हेमपत्रसे अलंकृतकर सुशोभित करे। गद्दा, चादर तथा तकियेसे संयुक्त कर गन्ध तथा धूपसे अधिवासित करे। ऐसी उस उत्तम शय्यापर लक्ष्मीसमन्वित भगवान् श्रीहरिकी सुवर्णकी प्रतिमाकी स्थापना करे और शय्याके सिरहाने कलश स्थापित करे। विद्वान् व्यक्तिको यह समझना चाहिये कि शय्यापर भगवान् निद्रामें स्थित हैं। शय्याके समीप ही कुंकुमचूर्ण, कर्पूर, अगरु, चन्दन, ताम्बूल, दीपक, जूता, छाता, चामर, आसन, भोजन तथा ससधान्यको यथाशक्ति स्थापित करे। अन्य भी उपकारक वस्तुओंको वहाँ स्थापित करे। वितानसे शय्याको सुशोभित कर ले। इस प्रकार उपस्कारोंसे मण्डित शय्याकी सपत्नीक ब्राह्मणकी विधिपूर्वक पूजाकर प्रदान कर दे और इस मन्त्रको पढ़े—

नमस्ते सर्वदेवेश शय्यादानं कृतं मया।
देहि तस्माच्छान्तिफलं नमस्ते पुरुषोत्तम॥
यथा न कृष्ण शयनं शून्यं सागरजातया।
शय्या ममाप्यशून्यास्तु तथा जन्मनि जन्मनि॥
(उत्तरपर्व १८४। १३-१४)

‘सर्वदेवेश! मैंने शय्यादान किया है, आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप मुझे शान्ति प्रदान करें, आपको नमस्कार है। भगवन्! जैसे आपकी शय्या लक्ष्मीसे शून्य नहीं रहती, वैसे ही जन्म-जन्मान्तरमें मेरी शय्या भी शून्य न रहे।' इस प्रकार उस सुन्दर पवित्र शय्याका दान कर विसर्जन करे।

व्यक्तिके मर जानेपर एकादशाहमें भी शय्यादानमें प्रायः यही विधि कही गयी है। बान्धवके मरनेपर धर्मके लिये यदि शय्यादान करता है तो उसे विशेष शान्ति मिलती है। राजेन्द्र! इसमें कुछ विशेष बातें भी मैं आपसे कह रहा हूँ, आप सुनें। मृत व्यक्तिने अपने जीवनकालमें जिन वस्तुओंका उपयोग किया था, जैसे कपड़े पहने थे, जैसा उसका वाहन था, जो वस्तु खाता था, जो वस्तु उसे प्रिय लगती थी, उन सबका भी शय्याके साथ दान करना चाहिये। इसे ‘मृतशय्यादान’ कहा जाता है। मृत व्यक्तिकी सुवर्णकी प्रतिमा भी वहाँ स्थापित करनी चाहिये। अनन्तर पूजा करके वह मृतशय्या प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार इस शय्यादानके प्रभावसे वह मृत जीव स्वर्गलोक, इन्द्रलोक तथा सूर्यलोकमें सुखपूर्वक निवास करता है। भयंकर मुखवाले यमराजके दूत उसे कष्ट नहीं दे पाते। धूप और शीतसे उसे कभी भी कष्ट नहीं होता। वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है तथा प्रलयपर्यन्त वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है। (अध्याय १८४)


आत्मप्रतिकृतिदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं आत्मप्रतिकृतिकी दान-विधि बता रहा हूँ। यह दान मान-सम्मान बढ़ानेवाला है। यह किसी समय किया जा सकता है। पार्थ! अपने स्वरूपकी लोहेकी एक मूर्ति बनाकर अपना जो अभीष्ट वाहन हो उसपर स्थापित करे। अपने मित्रों, बन्धुओं और सभी उपकरणोंसे युक्त होना चाहिये। वह मूर्ति रत्नों तथा वस्त्रादिसे अलंकृत हो। उसे कुंकुमसे अनुलिस कर कर्पूर तथा अगरुसे सुवासित कर दे। अगर स्त्री आत्मप्रतिकृतिदान करे तो उसे अपनेको शय्यामें सोती हुई रूपमें चित्रित करे और अपने अभीष्ट पदार्थोंको पासमें रखे। अपने और अपनी स्त्रीके लिये उपकारी वस्तुओंको भी वहाँ रखे। सभी वस्तुओंको यथास्थान रखकर स्नान कर श्वेत