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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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वस्त्र धारण करे और लोकपाल, ग्रहों, गौरी, विनायककी पूजाकर हाथमें पुष्पाञ्जलि ग्रहण कर ब्राह्मणके सम्मुख इस मन्त्रका उच्चारण करे— आत्मनः प्रतिमा चैवं सर्वोपकरणैर्युता ॥ सर्वैरन्तसमायुक्ता तव विप्र निवेदिता। आत्माशम्भुः शिवः शौरिः शक्रः सुरगणैर्वृतः ॥ तस्मादात्मप्रदानेन ममात्मा सुप्रसीदतु।

(उत्तरपर्व १८५।९-११)

‘ब्राह्मणदेवता! सभी उपकरणों और सभी रलोंसे युक्त यह मेरी प्रतिमा है, इसे मैं आपको समर्पित करता हूँ। मेरा आत्मा शम्भु, शिव, विष्णु तथा शक्र इस प्रतिकृतिमें अधिष्ठित है, अतः आत्मप्रतिकृतिके दानसे मेरा आत्मा प्रसन्न

हो। ऐसा उच्चारण कर प्रतिमा ब्राह्मणको समर्पित करे। ब्राह्मण भी ‘कोऽदात्कस्मा’ (यजु० ७।४८) इस मन्त्रका पाठ करते हुए प्रतिमा ग्रहण करे। यजमान प्रदक्षिणा कर नमस्कारपूर्वक उसका विसर्जन करे। राजन्! इस विधानके साथ जो आत्मप्रतिकृति-दान देता है, वह देवताओंसे आवृत होकर दिव्य सौ वर्षोंसे भी अधिक समयतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित रहता है। पुण्य क्षीण होनेके बाद वह पुरुष कामनाओंके फलको भोगते हुए राजाके रूपमें रहता है, अभीष्ट बन्धुओंके साथ उसका कभी भी वियोग नहीं होता और वह स्वर्गमें अनन्तकालतक सुख प्राप्त करता है। (अध्याय १८५)

हिरण्याश्वदान-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं परम श्रेष्ठ सुवर्णमय अश्वके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिसके दानसे मनुष्य अनन्त फलको प्राप्त करता है। किसी पुण्यतिथिमें उसे अपनी शक्तिके अनुरूप तीन पलसे लेकर एक सौ पलतकके सोनेका अश्व बनवाना चाहिये। वह लगामके काँटिसे युक्त हो। अश्वके कंधे उन्नत, जानुप्रदेश दृढ़ और पूँछ सुन्दर हो। उसे रेशमी वस्त्रसे आच्छादित एवं कुंकुमसे लिप्तकर वेदीके ऊपर फैलाये गये काले मृगचर्मपर रखी हुई तिल-राशिपर स्थापित करना चाहिये। श्वेत पुष्पोंसे उसकी पूजाकर चनेका नैवेद्य भोगके रूपमें निवेदित करना चाहिये। तत्पश्चात् शुभ मुहूर्तमें अञ्जलिमें पुष्प लेकर व्रती इस पुराणोक्त मन्त्रका उच्चारण करे—

नमस्ते सर्वदेवेश वेदाहरणलम्पट ॥ वाजिरूपेण मामस्मात् पाहि संसारसागरात्। त्वमेव सप्तधा भूत्वा छन्दोरूपेण भास्करम् ॥

यस्माद् धारयसे लोकानतः पाहि सनातन।

(उत्तरपर्व १८६।६-८)

‘सभी देवोंके स्वामिन्! आपको नमस्कार है। वेदोंको लानेके लिये इच्छुक देव! आप अश्वरूपसे इस संसार-सागरसे मेरी रक्षा कीजिये। भास्कर! चूँकि आप ही छन्दोरूपसे सात भागोंमें विभक्त होकर सभी लोकोंको धारण करते हैं, अतः सनातन! आप मेरी रक्षा कीजिये।’ ऐसा कहकर उसकी प्रदक्षिणा करे तथा वह अश्व ब्राह्मणको प्रदान कर दे। राजन्! इस दानको देनेसे मनुष्य भगवान् सूर्यके अक्षयलोकको प्राप्त करता है। तदुपरान्त वह तैलरहित अन्नका भोजन करे और भोजनके बाद पुराणोंका श्रवण करे। जो मनुष्य पुण्य दिन आनेपर इस हिरण्याश्व-विधिको सम्पन्न करता है, वह पापोंसे मुक्त हो सिद्धोद्धार प्राप्त होता हुआ मुरारिके पुर—वैकुण्ठको प्राप्त करता है। जो मनुष्य इस सुवर्णाश्वके दानकी विधिको पढ़ता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर अश्वसमन्वित

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