भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 623, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें६१२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
राजा होता है और सुवर्णमय विमानद्वारा सूर्यके लोकको जाता है और वहाँ देवाङ्गनाओंद्वारा पूजित होता है। जो अल्पवित्त पुरुष हिरण्याश्वदानकी इस विधिको सुनता या स्मरण करता है अथवा
लोकमें इसका अभिनन्दन करता है, वह भी पापोंके नष्ट हो जानेसे विशुद्ध शरीरवाला हो पुरन्दर एवं महेश्वरसेवित स्थानको जाता है।
(अध्याय १८६)
हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—पाण्डुकुलोद्भव महाराज युधिष्ठिर! अब इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ, पुण्यप्रद एवं महापातकोंके विनाशक हिरण्याश्वरथ-दानकी विधि बतला रहा हूँ। इस दानमें भी पुण्य पर्वदिन आनेपर अपने घरके आँगनको गोबरसे उपलिस कर वेदीपर कृष्णमृगचर्मको फैलाकर उसके ऊपर रखे हुए तिलोंकी राशिपर स्वर्णमय रथकी स्थापना करे। वह रथ चार घोड़ोंसे युक्त हो। उसमें चार चक्के होने चाहिये और उसमें बैठनेकी जगह हो। लगामके साथ ब्रह्माको अग्र-भागपर बैठाये। उसे इन्द्रनीलमणिके कलश और ध्वजासे सुशोभित करना चाहिये। उसपर पद्मरागमणिके दलसे युक्त आठों लोकपालोंकी मूर्ति रेशमी वस्त्रसे सुशोभित, जलसे भरे हुए चार कलश तथा अठारह धान्य हों और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। उसे पुष्प-माला, ईख और फलसे संयुक्त तथा पुरुषसे समन्वित होना चाहिये। जो पुरुष जिस देवताका भक्त हो, वह उसीके नामका उच्चारण कर अधिवासन करे। अनन्तर उस हिरण्यरथकी पूजा करनी चाहिये। घोड़ेपर सवार दोनों अश्विनीकुमारोंको उसके चक्ररक्षकके रूपमें स्थापित करना चाहिये। इस प्रकार पुण्यकाल आनेपर ब्राह्मणोंद्वारा पूर्ववत् स्नानकर देवताओंकी पूजा करके यजमान श्वेत वस्त्र और श्वेत पुष्पोंकी माला धारण करे तथा अञ्जलिमें पुष्प लेकर (उस रथकी) तीन बार प्रदक्षिणा कर दान करे। उस समय इस मन्त्रका उच्चारण करे—
नमो नमः पापविनाशनाय
विश्वान्मने देवतुरङ्गमाय।
धाम्नामधीशाय भवाभवाय
रथस्य दानान्मम देहि शान्तिम्॥
वस्वष्टकादित्यमरुद्रणानां
त्वमेव धाता परमं निधानम्।
यतस्ततो मे हृदयं प्रयातु
धर्मैकतान्तवमघौघनाशात्॥
(उत्तरपर्व १८७।१०-११)
‘पापसमूहके लिये दावाग्रिवस्वरूप देव! आप पापोंके विनाशक, विश्वान्मा, वेदरूपी घोड़ोंसे युक्त, तेजोंके अधीश्वर और सूर्यरूप हैं, आपको बारम्बार नमस्कार है। इस हेमरथ-दानसे आप मुझे शान्ति प्रदान कीजिये। चूँकि आप ही आठों वसुओं, आदित्यगणों और मरुद्रणोंके भरण-पोषण करनेवाले और परम निधान हैं। अतः आपकी कृपासे पापसमूहके नष्ट हो जानेसे मेरा हृदय धर्मकी एकतान्ताको प्राप्त हो।’ इस प्रकार जो मनुष्य इस लोकमें भव-भयनाशक इस अश्वरथका दान करता है, उसका शरीर पापसमूहसे मुक्त हो जाता है और वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है तथा ब्रह्माके साथ चिरकालतक निवास करता है। जो प्राणी इस लोकमें सुवर्णतुरगरथ नामक महादानकी विधिको पढ़ता या सुनता है, वह कभी नरकमें नहीं जाता।
(अध्याय १८७)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth
584 Sankshipta Bhavishya Puran_Section_21_2_Back