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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 624, कुल 654 में से

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पृष्ठ 624
  • उत्तरपर्व *

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कृष्णार्जुन (मृगछाला)-दान-विधि

महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब आप मुझे कृष्णार्जुनके दानकी विधि, समय और दान-ग्रहणके योग्य ब्राह्मणके लक्षणको बतलायें, इसमें मुझे संदेह हो रहा है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! युगादि तिथियों, सूर्य-चन्द्रग्रहण, संक्रान्ति, तिथिक्षय, माघी पूर्णिमा, ग्रहपीड़ा तथा दुःस्वप्न देखनेपर कृष्णार्जुनका दान करना चाहिये, यह महादान कहलाता है। राजन्! जो अग्निहोत्री, वेदवेदाङ्गपारङ्गत तथा पुराणका ज्ञाता हो, ऐसे योग्य ब्राह्मणको यह दान देना चाहिये। जिस विधानसे यह दान देना चाहिये, उसे आप सुनें।

नरश्रेष्ठ! पवित्र स्थानको गोबरसे लीपकर उसपर ऊनी वस्त्र बिछा कर काले तिलोंसे उसपर मृगकी आकृति बनाये। सींगके स्थानपर सोना तथा चाँदीका दाँत बनाये। मोतीकी मालासे पूँछ बनाये। तिलसे सिरका निर्माण कर उसे वस्त्रसे आच्छादित करे और सुवर्णसे अलंकृत कर पुष्प, गन्ध, फल, रत्न तथा नैवेद्यसे उसकी पूजा करनी चाहिये। चार दिशाओंमें चार काँसेके पात्र यथाक्रमसे रखने चाहिये। वे घी, दूध, दही और मधुसे समन्वित हों। अनन्तर

पुण्यकाल आ जानेपर इन मन्त्रोंको पढ़े—

कृष्णः कृष्णमलो देव कृष्णार्जुनवरस्तथा ॥ त्वहानापास्तपापस्य प्रीयतां मे नमो नमः। त्रयस्त्रिंशत्सुराणां च आधारे त्वं व्यवस्थितः ॥ कृष्णोऽसि मूर्तिमान् साक्षात् कृष्णार्जुन नमोऽस्तु ते।

(उत्तरपर्व १८८।१०—१२)

‘श्रेष्ठ कृष्णार्जुन देव! आप पापोंके नाश करनेवाले विष्णुरूप हैं, आपके दान करनेसे मेरे समस्त पाप नष्ट हो जायँ। आपको बारम्बार नमस्कार है। आप तैंतीस देवताओंके आधाररूपमें अवस्थित रहते हैं, आप मूर्तिमान् कृष्ण-विष्णु हैं, आपको नमस्कार है।’

इस प्रकार प्रदक्षिणा कर बार-बार नमस्कार कर वेद-वेदाङ्गपारङ्गत ब्राह्मणको अपनी शक्तिके अनुसार अलंकृतकर कृष्णार्जुनका दान करे। ब्रह्माजीने बताया है कि कृष्णार्जुनकी पूँछ पकड़कर दान करना चाहिये। इस प्रकार इस विधिसे कृष्णार्जुनदान करनेसे मानव भूमिदानके समग्र फलको प्राप्त कर लेता है और तीनों अवस्थाओंमें जो पाप अर्जित करता है, वह क्षणभरमें ही नष्ट हो जाता है। (अध्याय १८८)

हेमहस्तिरथदानकी विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब इसके बाद मैं मङ्गलमय सुवर्णनिर्मित हस्तिरथदानका वर्णन कर रहा हूँ, जिससे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है। किसी पुण्यतिथिके आनेपर संक्रान्ति या ग्रहणकालमें बुद्धिमान् यजमानको मणियोंसे सुशोभित देवताओंके रथके आकारका सुवर्णमय रथ, जो विचित्र तोरणों और चार पहियोंसे युक्त हो,

बनवाना चाहिये। उसमें स्वर्णनिर्मित चार श्रेष्ठ हाथी भी रहने चाहिये। उस रथको कृष्णमृगचर्मके ऊपर रखे गये एक द्रोण तिलपर स्थापित करना चाहिये। वह रथ आठों लोकपाल, ब्रह्मा, सूर्य और शिवकी प्रतिमाओंसे युक्त हो। उसके मध्यभागमें लक्ष्मीसहित विष्णुभगवान्की भी मूर्ति होनी चाहिये। उसके ध्वजपर गरुड तथा जुआके

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