भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 625, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें६१४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
अग्रभागपर विनायकको स्थापित करना चाहिये। वह नाना प्रकारके फलोंसे युक्त हो और उसके ऊपर चँदोवा तना हो। वह पँचरंगे रेशमी वस्त्र, विकसित पुष्पोंसे सुशोभित हो।
नरोत्तम! अपनी शक्तिके अनुसार उस रथको पाँच पलसे ऊपर सौ पल सोनेतकका बनवाना चाहिये। इस प्रकार वेदज्ञ ब्राह्मणोंद्वारा माङ्गलिक शब्दोंके उच्चारणके साथ स्नान कराया गया यजमान देवताओं और पितरोंकी अभ्यर्चना करे। अञ्जलिमें फूल लेकर तीन बार रथकी प्रदक्षिणा करे तथा सम्पूर्ण सुखोंको प्रदान करनेवाले इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—
नमो नमः शङ्करपञ्चजार्क-
लोकेशविद्याधरवासुदेवैः ।
त्वं सेव्यसे वेदपुराणयज्ञै-
स्तेजोमयस्यन्दन पाहि तस्मात् ॥
यत्तत्पदं परमगुह्यतमं मुरारे-
रानन्दहेतुगुणरूपविमुक्तवन्तम् ।
योगैकमानसदृशो मुनयः समाधी
पश्यन्ति तत्त्वमसि नाथ रथाधिरूढ ॥
यस्मात् त्वमेव भवसागरसम्प्लुताण्ड-
मानन्दभारमृतमध्वरपानपात्रम् ।
तस्मादघौघशमनेन कुरु प्रसादं
चामीकरेश्वरं माधव सम्प्रदानात् ॥
(उत्तरपर्व १८९।९—११)
‘तेजोमय स्यन्दन! शंकर, ब्रह्मा, सूर्य, लोकपाल, विद्याधर, वासुदेव, वेद, पुराण और यज्ञ तुम्हारी सेवा करते हैं, अतः तुम मेरी रक्षा करो। तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। रथाधिरूढ स्वामिन्! जो पद परम गुह्यतम, सनातन, आनन्दका हेतु और गुण एवं रूपसे परे है तथा एकमात्र योगरूप मानसिक दृष्टिवाले मुनिगण जिसका समाधिकालमें दर्शन करते हैं, वह आप ही हैं। माधव! चूँकि आप ही भवसागरमें डूबनेवालोंके लिये आनन्दके पात्र, सत्यस्वरूप तथा यज्ञोंमें पानपात्र हैं, इसलिये आप इस सुवर्णमय हस्तिरथके दानसे मेरे पापपुञ्जोंको नष्टकर मुझपर कृपा कीजिये।’
जो मनुष्य इस प्रकार प्रणाम करके स्वर्णमय हस्तिरथ-दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है और विद्याधर, देवगण एवं मुनीन्द्रगणोंद्वारा सेवित इन्द्रियातीत भगवान् शिवके लोकको प्राप्त करता है तथा अपने बन्धुओं, पितरों, पुत्रों एवं सम्पूर्ण बान्धवोंको विष्णुभगवान्के शाश्वत लोकमें ले जाता है। (अध्याय १८९)
विश्वचक्रदान-विधि
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब इसके बाद मैं सभी पापोंके नाशक एवं अत्यन्त श्रेष्ठ विश्वचक्रदानकी विधि बतला रहा हूँ। इसे प्रतस सुवर्णके द्वारा निर्मित कराना चाहिये। शक्तिके अनुसार चाँदी तथा ताँबेका भी बनाया जा सकता है। यह विश्वचक्र एक सहस्र पल सुवर्णका उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई
सौ पलका कनिष्ठ कहा गया है। अल्प वित्तवाला मनुष्य बीस पलसे ऊपरका बना हुआ विश्वचक्र दान कर सकता है। यह चक्र सोलह अरों तथा आठ नेमियोंसे युक्त घूमता हुआ होना चाहिये। उसके नाभिकमलपर योगारूढ चतुर्भुज भगवान् विष्णुको स्थापित करना चाहिये। उनके बगलमें शङ्ख और चक्र हों तथा आठ देवियों उन्हें चारों
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth