भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 626, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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ओरसे घेरे हुए हों। उसके दूसरे आवरणमें उसी प्रकार जलशायी, अत्रि, भृगु, वसिष्ठ, ब्रह्मा, कश्यप, मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण, बुद्ध और कल्किको, तीसरे आवरणमें मनुओं तथा वसुओंसहित गौरीको, चौथे आवरणमें बारहों आदित्यों तथा चारों वेदोंको, पाँचवें आवरणमें पाँचों महाभूतों तथा ग्यारहों रुद्रोंको, छठे आवरणमें आठों लोकपालों तथा दिगजोंको, सातवें आवरणमें सभी प्रकारके माङ्गलिक अस्त्रोंको तथा आठवें आवरणमें थोड़े-थोड़े अन्तरपर देवताओंको स्थापित करे। दस हाथका एक मण्डप बनाकर उसे वस्त्र, पताका, तोरण आदिसे अलंकृत करे। मण्डपमें हवनके लिये कुण्डका निर्माण करे। चार हाथकी एक वेदी बनाकर उसके ऊपर कृष्णमृगचर्मपर रखे गये तिलके ऊपर विश्वचक्रको स्थापित करना चाहिये।
फिर अठारह प्रकारके अन्न, लवण आदि सभी रस, जलसे भरे हुए आठ माङ्गलिक कलश, विविध प्रकारके वस्त्र, पुष्पमाला, फल, रत्न तथा पँचरंगा वितान—इन सबको भी यथास्थान रखना चाहिये। इसके बाद अधिवासन फिर हवन करे। हवनमें चार चारणिक श्रेष्ठ ब्राह्मण हों। विश्वचक्रमें जिन देवताओंकी प्रतिष्ठा-पूजा की गयी हो, उनके लिये हवन करना चाहिये। इससे सम्पूर्ण उपद्रवोंकी शान्ति होती है। तदनन्तर माङ्गलिक शब्दोंके साथ गृहस्थ यजमान स्नान करके श्वेत वस्त्र धारणकर हवन एवं अधिवासनके उपरान्त अञ्जलिमें पुष्प ग्रहणकर तीन बार प्रदक्षिणा करे और इस मन्त्रका उच्चारण करे—
नमो विश्वम्भरायेति विश्वचक्रात्तन्मे नमः।
परमानन्दरूपी त्वं पाहि नः पापकर्दमात्॥
तेजोमयमिदं यस्मात् सदा पश्यन्ति सूरयः।
हृदि तत्त्वं गुणातीतं विश्वचक्रं नमाम्यहम्॥
वासुदेवे स्थितं चक्रं तस्य मध्ये तु माधवः।
अन्योन्याधाररूपेण प्रणमामि स्थिताविह॥
विश्वचक्रमिदं यस्मात् सर्वपापहरं हरेः।
आयुधं चाधिवासश्च तस्माच्छान्तिं ददातु मे॥
(उत्तरपर्व १९०।१८—२१)
‘विश्वम्भरको नमस्कार है। विश्वचक्रात्माको प्रणाम है। आप परमानन्दस्वरूप हैं, अतः पापरूप कीचड़से हमारी रक्षा कीजिये। चूँकि इस तत्त्वस्वरूप, गुणातीत, तेजोमय विश्वचक्रको विद्वान् लोग सदा अपने हृदयमें देखते हैं, अतः मैं आपको नमस्कार करता हूँ। यह विश्वचक्र वासुदेवमें स्थित है और माधव इस चक्रके मध्यभागमें स्थित हैं, इस प्रकार आप दोनों अन्योन्याधाररूपसे स्थित हों, आपको मैं प्रणाम करता हूँ। चूँकि भगवान् विष्णुका यह विश्वचक्र सम्पूर्ण पातकोंका विनाश करनेवाला, भगवान्का आयुध तथा उनका निवासस्वरूप भी है, अतः यह मुझे शान्ति प्रदान करे।’
इस प्रकार आमन्त्रित करके जो मनुष्य मत्सररहित हो इस विश्वचक्रका दान करता है, वह सभी पापोंसे मुक्त होकर विष्णुलोकमें पूजित होता है तथा वैकुण्ठलोकको प्राप्तकर चार भुजाओंसे युक्त और अविनाशी हो जाता है एवं अप्सराओंके समूहद्वारा सेवित होकर तीन सौ कल्पोंतक वहाँ निवास करता है। जो व्यक्ति इस विश्वचक्रका निर्माणकर इसे प्रतिदिन प्रणाम करता है, उसकी आयु बढ़ती है और नित्य लक्ष्मीकी वृद्धि होती है। इस प्रकार जो व्यक्ति सुवर्णनिर्मित सोलह अरोंसे युक्त तथा समस्त जगत् एवं देवताओंके अधिष्ठानरूप इस चक्रका
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