भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
दान करता है, वह विष्णु-भवनको प्राप्त होता है तथा उसे सिद्धगण सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं। वह पुरुष निष्पाप होकर शुभदर्शन
केशवकी भाँति मनोरम स्वरूप धारण करता है और बारंबार जन्म-मरणके भयसे भी छूट जाता है। (अध्याय १९०)
भुवनप्रतिष्ठाका माहात्म्य, धर्मात्मा रजिकी कथा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—मधुसूदन! अब आप कोई ऐसा उपाय बतलायें, जिससे इस लोकमें शाश्वती प्रतिष्ठा, महनीय कीर्ति, अक्षय संतति, प्रचुर सम्पत्ति तथा परलोकमें पितरोंको सद्गति प्राप्त हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! आपने संसारके उपकारके लिये ही इस बातको पूछा है। अब मैं परम रहस्यमय भुवनप्रतिष्ठाकी विधिको संक्षेपमें बता रहा हूँ। भुवनप्रतिष्ठाके दानसे देवता, गन्धर्व, असुर, नाग, किन्नर, यक्ष, राक्षस, प्रेत, पिशाच, भूत आदि सभीकी प्रतिष्ठा हो जाती है। व्रतीको चाहिये कि सर्वप्रथम उत्तम मुहूर्त देखकर सात हाथ लम्बे-चौड़े मजबूत शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ श्वेत वस्त्र लेकर उसपर चित्रकर्ममें निपुण चित्रकारसे चौदहों भुवनोंका चित्र बनवाये। कुशल चित्रकारको बुलाकर वस्त्र, आभूषण तथा पुष्प आदिसे उसकी पूजाकर उसे चित्रकर्ममें नियुक्त करना चाहिये। उस समय आचार्यसहित ब्राह्मणोंका भी वस्त्रादिसे पूजन करना चाहिये। ब्राह्मण वेदध्वनिके साथ पुण्याहवाचन करें। शङ्खु-भेरीसे मङ्गल शब्द करते हुए चित्रकर्म आरम्भ कर पुराणोंमें कही हुई विधिके अनुसार भुवनोंको चित्रित कराना चाहिये। वस्त्रके मध्यमें सर्वप्रथम जम्बूद्वीप, उसके मध्यमें मेरुपर्वत और उसके ऊपर देवताओंकी स्थापना करे एवं आठ दिशाओंमें आठ दिक्पालोंकी पुरियाँ तथा देवताओंके साथ सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी बनवाये। वह पृथ्वी सात कुलाचलों, सात समुद्रों, नदी, नद, सरोवर,
सात पातालों, भूभुवः आदि सात लोकोंसे समन्वित हो। उसपर ब्रह्मादि देवताओंके लोक, ध्रुवमार्ग, ग्रह और तारागणोंसे युक्त सूर्यदेव, दानव, यक्ष, राक्षस, ऋषि, मुनि, गौ, देवमाता अदिति, सुपर्ण आदि पक्षी, नाग और ऐरावत आदि आठ दिग्गज भी अङ्कित करे। इस प्रकार वस्त्रके ऊपर सम्पूर्ण भुवनकी रचना करवाये। उस कल्पित भुवनमें पृथ्वी, तेज, वायु आदि पञ्चतत्त्वों, अहंकार, मन, बुद्धि तथा सत्त्वादि तीन गुणों, प्रकृति तथा पुरुषको भी सर्वत्र व्याप्त समझकर यथाविधि अङ्कित करवाना चाहिये।
कार्तिक-पूर्णिमा, अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग तथा ग्रहणमें इसकी पूजा करनी चाहिये। एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके बीच चित्रपट स्थापित करना चाहिये। एक हाथ लम्बा-चौड़ा चौरस चार कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर दो-दो वेदपारङ्गत ब्राह्मणोंका हवनके लिये वरण करना चाहिये। ब्राह्मण वस्त्रादि आभूषणसे अलंकृत होकर हवन करें। हवन चित्रपटमें अङ्कित देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे करना चाहिये। यजमान भी वस्त्रादिसे अलंकृत होकर आचार्यके साथ चित्रपटस्थ देवताओंका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्यादिसे पूजनकर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—
ब्रह्माण्डोदरवर्तीनि भुवनानि चतुर्दश। तानि संनिहितान्त्रय पूजितानि भवन्तु मे॥ ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो ह्यादित्या वसवस्तथा। पूजिताः सुप्रतिष्ठाश्च भवन्तु सततं मम॥
(उत्तरपर्व १९१।३०-३१)
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