भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 628, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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‘ब्रह्माण्डमें स्थित चौदहों भुवन इस चित्रपटमें अधिष्ठित हों, वे मेरे द्वारा पूजित हों। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, आदित्य तथा वसु देवताओ! मेरे द्वारा पूजित होनेपर आप सब इसमें प्रतिष्ठित हो जायँ।’
इस प्रकार भुवनमय उस चित्रपटकी प्रदक्षिणा करे और अनेक प्रकारकी भोजन-सामग्री तथा मिष्टान्न आदिका नैवेद्य लगाये। रात्रिको जागरण कर विविध प्रकारके वाद्य-यन्त्रोंको बजाते हुए वेदध्वनि करनी चाहिये। गीत-नृत्यके द्वारा उत्सव मनाना चाहिये।
प्रातःकाल होते ही स्नानकर वस्त्र-आभूषण धारण कर पहलेकी भाँति ही चित्रपटकी पूजाकर एक सौ गोएँ अथवा दो गायें तथा उपानह, छाता एवं घरकी उपयोगी सामग्री भी ऋत्विजोंको दान करे। फिर सुन्दर रथ लाकर उसे पताका, ध्वज, तोरण आदिसे अलंकृत कर उसमें दो हाथी अथवा घोड़े खींचनेके लिये जोते। तदनन्तर रथपर भुवनमय चित्रपटको स्थापितकर ब्राह्मणके साथ ले जाकर देवमन्दिरमें स्थापित कर उसका पूजन करना चाहिये। वहाँ महोत्सव मनाना चाहिये। उत्तम चाँदीका छत्र, घण्टा, ध्वज, चामर आदि चढ़ाकर गुरु और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देकर दीन, अन्ध, बधिर, कृपण आदिको भोजन कराये। अपने मित्र, बन्धु तथा स्वजनोंको भी भोजन कराना चाहिये।
इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री भुवनकी देवालय आदिमें प्रतिष्ठा करता है, वह मानो चराचर त्रैलोक्यकी स्थापना कर लेता है और उससे वह अपने कुलका भी उद्धार कर लेता है। जितने समयतक देवालयमें चित्रपट स्थापित रहता है और पूजित होता है, उतने समयतक त्रैलोक्यमें
उसकी अक्षय कीर्ति फैलती रहती है और जितने समयतक लोकमें कीर्ति रहती है, उतने हजार वर्षतक वह व्यक्ति स्वर्गमें निवास करता है। गन्धर्व और अप्सराएँ उसकी सेवामें निरत रहते हैं। वह बहुत समयतक स्वर्गका सुख भोगकर पुण्यक्षय होनेपर इस भूमिपर जन्म लेकर धर्मात्मा, दीर्घायु, ऐश्वर्यवान्, प्रतापी और पुत्र-पौत्र आदिसे युक्त होकर दस जन्मोंतक राजा होता है।
राजन्! इस विषयमें एक आख्यान प्रसिद्ध है। सुना जाता है कि प्राचीन कालमें रजि नामका जितेन्द्रिय चक्रवर्ती एक राजा हुआ था। उसने समस्त पृथ्वीके राज्यको जीत लिया और दैत्योंको युद्धमें हराकर स्वर्गको एवं उनके आधिपत्यको इन्द्रके हाथमें समर्पित कर दिया। किसी समय उसकी राजसभामें ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि पुलस्त्य अपने शिष्योंके साथ पधारे। राजा रजिने पुलस्त्यजीका बड़ा आदर-सत्कार किया और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदिसे पूजनकर उन्हें आसन प्रदान किया। कुशल-क्षेमके पश्चात् राजाने पुलस्त्यजीसे पूछा—‘ऋषिवर! मैंने कौन-सा व्रत, दान अथवा तप किया है, जिसके प्रभावसे मुझे धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादिसे समन्वित यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है।’ पुलस्त्यमुनिने कहा—‘राजन्! इससे सात जन्मपूर्व तुम वाराणसीमें धन-धान्यसम्पन्न धर्मात्मा और सत्यवादी एक वैश्य थे। तुमने अनेक पुराणोंकी कथाएँ सुनीं तथा अनेक प्रकारके दान तो दिये ही भुवनकी प्रतिष्ठा भी की थी। उसी प्रतिष्ठाके प्रभावसे तुम सात जन्मसे राजाका पद प्राप्त कर रहे हो और तुम्हारी कीर्ति संसारमें फैली हुई है। अगले सात जन्ममें भी राजाका पद प्राप्त करोगे और अन्तमें तुम्हें मुक्ति मिल जायगी।
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