भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
दान करता है, वह विष्णु-भवनको प्राप्त होता है तथा उसे सिद्धगण सिर झुकाकर नमस्कार करते हैं। वह पुरुष निष्पाप होकर शुभदर्शन
केशवकी भाँति मनोरम स्वरूप धारण करता है और बारंबार जन्म-मरणके भयसे भी छूट जाता है। (अध्याय १९०)
भुवनप्रतिष्ठाका माहात्म्य, धर्मात्मा रजिकी कथा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—मधुसूदन! अब आप कोई ऐसा उपाय बतलायें, जिससे इस लोकमें शाश्वती प्रतिष्ठा, महनीय कीर्ति, अक्षय संतति, प्रचुर सम्पत्ति तथा परलोकमें पितरोंको सद्गति प्राप्त हो।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! आपने संसारके उपकारके लिये ही इस बातको पूछा है। अब मैं परम रहस्यमय भुवनप्रतिष्ठाकी विधिको संक्षेपमें बता रहा हूँ। भुवनप्रतिष्ठाके दानसे देवता, गन्धर्व, असुर, नाग, किन्नर, यक्ष, राक्षस, प्रेत, पिशाच, भूत आदि सभीकी प्रतिष्ठा हो जाती है। व्रतीको चाहिये कि सर्वप्रथम उत्तम मुहूर्त देखकर सात हाथ लम्बे-चौड़े मजबूत शुद्ध स्फटिकके समान स्वच्छ श्वेत वस्त्र लेकर उसपर चित्रकर्ममें निपुण चित्रकारसे चौदहों भुवनोंका चित्र बनवाये। कुशल चित्रकारको बुलाकर वस्त्र, आभूषण तथा पुष्प आदिसे उसकी पूजाकर उसे चित्रकर्ममें नियुक्त करना चाहिये। उस समय आचार्यसहित ब्राह्मणोंका भी वस्त्रादिसे पूजन करना चाहिये। ब्राह्मण वेदध्वनिके साथ पुण्याहवाचन करें। शङ्खु-भेरीसे मङ्गल शब्द करते हुए चित्रकर्म आरम्भ कर पुराणोंमें कही हुई विधिके अनुसार भुवनोंको चित्रित कराना चाहिये। वस्त्रके मध्यमें सर्वप्रथम जम्बूद्वीप, उसके मध्यमें मेरुपर्वत और उसके ऊपर देवताओंकी स्थापना करे एवं आठ दिशाओंमें आठ दिक्पालोंकी पुरियाँ तथा देवताओंके साथ सात द्वीपोंसे युक्त पृथ्वी बनवाये। वह पृथ्वी सात कुलाचलों, सात समुद्रों, नदी, नद, सरोवर,
सात पातालों, भूभुवः आदि सात लोकोंसे समन्वित हो। उसपर ब्रह्मादि देवताओंके लोक, ध्रुवमार्ग, ग्रह और तारागणोंसे युक्त सूर्यदेव, दानव, यक्ष, राक्षस, ऋषि, मुनि, गौ, देवमाता अदिति, सुपर्ण आदि पक्षी, नाग और ऐरावत आदि आठ दिग्गज भी अङ्कित करे। इस प्रकार वस्त्रके ऊपर सम्पूर्ण भुवनकी रचना करवाये। उस कल्पित भुवनमें पृथ्वी, तेज, वायु आदि पञ्चतत्त्वों, अहंकार, मन, बुद्धि तथा सत्त्वादि तीन गुणों, प्रकृति तथा पुरुषको भी सर्वत्र व्याप्त समझकर यथाविधि अङ्कित करवाना चाहिये।
कार्तिक-पूर्णिमा, अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग तथा ग्रहणमें इसकी पूजा करनी चाहिये। एक सुन्दर मण्डप बनाकर उसके बीच चित्रपट स्थापित करना चाहिये। एक हाथ लम्बा-चौड़ा चौरस चार कुण्ड बनाकर प्रत्येक कुण्डपर दो-दो वेदपारङ्गत ब्राह्मणोंका हवनके लिये वरण करना चाहिये। ब्राह्मण वस्त्रादि आभूषणसे अलंकृत होकर हवन करें। हवन चित्रपटमें अङ्कित देवताओंके नाम-मन्त्रोंसे करना चाहिये। यजमान भी वस्त्रादिसे अलंकृत होकर आचार्यके साथ चित्रपटस्थ देवताओंका गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्यादिसे पूजनकर इस मन्त्रसे प्रार्थना करे—
ब्रह्माण्डोदरवर्तीनि भुवनानि चतुर्दश। तानि संनिहितान्त्रय पूजितानि भवन्तु मे॥ ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो ह्यादित्या वसवस्तथा। पूजिताः सुप्रतिष्ठाश्च भवन्तु सततं मम॥
(उत्तरपर्व १९१।३०-३१)
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- उत्तरपर्व *
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‘ब्रह्माण्डमें स्थित चौदहों भुवन इस चित्रपटमें अधिष्ठित हों, वे मेरे द्वारा पूजित हों। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, आदित्य तथा वसु देवताओ! मेरे द्वारा पूजित होनेपर आप सब इसमें प्रतिष्ठित हो जायँ।’
इस प्रकार भुवनमय उस चित्रपटकी प्रदक्षिणा करे और अनेक प्रकारकी भोजन-सामग्री तथा मिष्टान्न आदिका नैवेद्य लगाये। रात्रिको जागरण कर विविध प्रकारके वाद्य-यन्त्रोंको बजाते हुए वेदध्वनि करनी चाहिये। गीत-नृत्यके द्वारा उत्सव मनाना चाहिये।
प्रातःकाल होते ही स्नानकर वस्त्र-आभूषण धारण कर पहलेकी भाँति ही चित्रपटकी पूजाकर एक सौ गोएँ अथवा दो गायें तथा उपानह, छाता एवं घरकी उपयोगी सामग्री भी ऋत्विजोंको दान करे। फिर सुन्दर रथ लाकर उसे पताका, ध्वज, तोरण आदिसे अलंकृत कर उसमें दो हाथी अथवा घोड़े खींचनेके लिये जोते। तदनन्तर रथपर भुवनमय चित्रपटको स्थापितकर ब्राह्मणके साथ ले जाकर देवमन्दिरमें स्थापित कर उसका पूजन करना चाहिये। वहाँ महोत्सव मनाना चाहिये। उत्तम चाँदीका छत्र, घण्टा, ध्वज, चामर आदि चढ़ाकर गुरु और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा देकर दीन, अन्ध, बधिर, कृपण आदिको भोजन कराये। अपने मित्र, बन्धु तथा स्वजनोंको भी भोजन कराना चाहिये।
इस विधिसे जो पुरुष अथवा स्त्री भुवनकी देवालय आदिमें प्रतिष्ठा करता है, वह मानो चराचर त्रैलोक्यकी स्थापना कर लेता है और उससे वह अपने कुलका भी उद्धार कर लेता है। जितने समयतक देवालयमें चित्रपट स्थापित रहता है और पूजित होता है, उतने समयतक त्रैलोक्यमें
उसकी अक्षय कीर्ति फैलती रहती है और जितने समयतक लोकमें कीर्ति रहती है, उतने हजार वर्षतक वह व्यक्ति स्वर्गमें निवास करता है। गन्धर्व और अप्सराएँ उसकी सेवामें निरत रहते हैं। वह बहुत समयतक स्वर्गका सुख भोगकर पुण्यक्षय होनेपर इस भूमिपर जन्म लेकर धर्मात्मा, दीर्घायु, ऐश्वर्यवान्, प्रतापी और पुत्र-पौत्र आदिसे युक्त होकर दस जन्मोंतक राजा होता है।
राजन्! इस विषयमें एक आख्यान प्रसिद्ध है। सुना जाता है कि प्राचीन कालमें रजि नामका जितेन्द्रिय चक्रवर्ती एक राजा हुआ था। उसने समस्त पृथ्वीके राज्यको जीत लिया और दैत्योंको युद्धमें हराकर स्वर्गको एवं उनके आधिपत्यको इन्द्रके हाथमें समर्पित कर दिया। किसी समय उसकी राजसभामें ब्रह्माजीके पुत्र महर्षि पुलस्त्य अपने शिष्योंके साथ पधारे। राजा रजिने पुलस्त्यजीका बड़ा आदर-सत्कार किया और पाद्य, अर्घ्य, मधुपर्क आदिसे पूजनकर उन्हें आसन प्रदान किया। कुशल-क्षेमके पश्चात् राजाने पुलस्त्यजीसे पूछा—‘ऋषिवर! मैंने कौन-सा व्रत, दान अथवा तप किया है, जिसके प्रभावसे मुझे धन-धान्य, पुत्र-पौत्रादिसे समन्वित यह निष्कण्टक राज्य प्राप्त हुआ है।’ पुलस्त्यमुनिने कहा—‘राजन्! इससे सात जन्मपूर्व तुम वाराणसीमें धन-धान्यसम्पन्न धर्मात्मा और सत्यवादी एक वैश्य थे। तुमने अनेक पुराणोंकी कथाएँ सुनीं तथा अनेक प्रकारके दान तो दिये ही भुवनकी प्रतिष्ठा भी की थी। उसी प्रतिष्ठाके प्रभावसे तुम सात जन्मसे राजाका पद प्राप्त कर रहे हो और तुम्हारी कीर्ति संसारमें फैली हुई है। अगले सात जन्ममें भी राजाका पद प्राप्त करोगे और अन्तमें तुम्हें मुक्ति मिल जायगी।
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जो तुमने पूछा, वह मैंने बता दिया। जो स्त्री अथवा पुरुष भुवनप्रतिष्ठा करते हैं, वे कृतकृत्य हो जाते हैं।' इस प्रकार कहकर महातेजस्वी पुलस्त्यजी अपने धामको चले गये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! इस भुवनप्रतिष्ठासे धर्मकी वृद्धि, अभीष्टकी सिद्धि, पापका क्षय और सभी कार्योंकी सिद्धि हो जाती है। (अध्याय १९१)
नक्षत्रदान (नक्षत्रोंमें दानके पदार्थ)
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! मैंने आपकी कृपासे सभी दान-विधियाँ सुनीं। इस समय आप नक्षत्रोंमें देय दानोंका वर्णन कीजिये।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! किसी समय देवर्षि नारद द्वारका आये। उनसे मेरी माता देवकीने नक्षत्रदान-विधि पूछी। उस समय नारदजीने जो उन्हें बतलाया, मैं वही कह रहा हूँ। इससे सब पातक दूर हो जाते हैं।
महाभाग! कृतिका नक्षत्रमें घी और खीरसे युक्त भोजन देकर साधुजनों और ब्राह्मणोंको संतुष्ट करनेसे उत्तम लोककी प्राप्ति होती है। रोहिणी नक्षत्रमें घृतमिश्रित अन्नका ब्राह्मणों तथा साधु-संतोंको भोजन करानेसे श्रेष्ठ लोकोंकी प्राप्ति होती है। मृगशिरा नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको दूधका दान करनेसे किसी प्रकारका ऋण नहीं रहता और सवत्सा पयस्विनी गौ ब्राह्मणको दान करनेवाला विमानमें बैठकर स्वर्गलोकमें जाता है। आर्द्रा नक्षत्रमें तिलमिश्रित कृशर (खिचड़ी)-का दान करनेसे मनुष्य सभी प्रकारके संकटोंसे मुक्त हो जाता है। पुनर्वसु नक्षत्रमें घृतपक्व अपूप (मालपूआ) ब्राह्मणको देनेवाला उत्तम कुलमें जन्म लेकर यश, धन और रूप प्राप्त करता है। पुष्य नक्षत्रमें सुवर्णका दान करनेसे दाता पापरहित होकर इस लोक तथा परलोकमें चन्द्रमाकी तरह सुशोभित होता है। आश्लेषा नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको चाँदीका दान करे तो निर्भय और शास्त्रको जाननेवाला विद्वान् होता है।
मघा नक्षत्रमें तिलसे भरे हुए घड़ोंका दान करनेसे पुत्र, पशु तथा धनकी प्राप्ति होती है। पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रमें ब्राह्मणको घोड़ीका दान देनेसे पुण्यलोकमें निवास मिलता है। उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें सुवर्ण-कमल देनेसे सभी बाधाएँ दूर हो जाती हैं और सूर्यलोककी प्राप्ति होती है।
हस्त नक्षत्रमें सुवर्णका हाथी बनाकर ब्राह्मणको दान देनेसे दिव्य हस्तीपर आरूढ़ होकर इन्द्रलोकमें जानेका सौभाग्य प्राप्त होता है। चित्रा नक्षत्रमें वृषभका दान करनेसे उत्तम पुण्य प्राप्त होता है और अप्सराओंके नन्दनवनमें विहार करनेका अवसर प्राप्त होता है। स्वाती नक्षत्रमें जो पदार्थ स्वयंका प्रिय हों, उनका दान करनेसे बहुत यश मिलता है और अन्तमें सद्गति मिलती है। विशाखा नक्षत्रमें धान्य एवं वस्त्रसहित सुदृढ़ बैलगाड़ीका दान करनेसे पितृगणोंको प्रसन्नता होती है, संसारमें कोई कष्ट नहीं होता और दान देनेवाला सभी प्रकारके पापोंसे छूटकर उत्तम गति प्राप्त करता है। अनुराधा नक्षत्रमें यथाशक्ति कम्बल और ओढ़ने तथा पहिनेवाले उत्तरीय वस्त्र आदि ब्राह्मणको दान देनेसे दिव्य सौ वर्षसे भी अधिक समयतक स्वर्गमें देवताओंके समीप निवास करनेका अवसर प्राप्त होता है।
ज्येष्ठा नक्षत्रमें विविध प्रकारके कालशाक (करोमू) तथा मूली आदि शाक ब्राह्मणोंको देनेसे अभीष्ट गति प्राप्त होती है। मूल नक्षत्रमें ब्राह्मणोंको
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- उत्तरपर्व *
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कन्द, मूल, फल आदि देनेसे पितर संतुष्ट हो जाते हैं और उसे उत्तम गति मिलती है। पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रमें कुलीन और वेदवेत्ता ब्राह्मणको दधिपात्र देनेसे पुत्र, पौत्र, धन, धान्य और ऐश्वर्यकी प्राप्ति होती है तथा उत्तम कुलमें जन्म होता है। उत्तराषाढ़ा नक्षत्रमें उदमंथ (जौकी माड़ी), घी, मधु और फाणित (राब) ब्राह्मणको देनेसे सभी कामनाओंकी प्राप्ति होती है। अभिजित् नक्षत्रमें घी, मधु तथा दुग्ध देनेसे स्वर्गमें निवास होता है।
श्रवण नक्षत्रमें पुस्तक-दान करनेसे विमानमें बैठकर इच्छानुसार सभी लोकोंमें विचरण करनेका अवसर प्राप्त होता है। धनिष्ठा नक्षत्रमें दो गायोंका दान करनेसे अनेक जन्मोंतक सुखकी प्राप्ति होती है। शतभिषा नक्षत्रमें अगरू और चन्दनका जो व्यक्ति दान करता है वह सुन्दर अप्सराओंके लोकमें जाता है। पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रमें राजमाष (बड़े उड़द)-का दान देनेसे सभी प्रकारके भक्ष्य-भोज्य प्राप्त होते हैं और जन्मान्तरमें सुखकी प्राप्ति होती है। उत्तराभाद्रपद नक्षत्रमें
सुन्दर वस्त्रोंका दान करनेसे पितर संतुष्ट होते हैं और उसे सद्गति प्राप्त होती है।
रेवती नक्षत्रमें कांस्यके दोहन-पात्रसहित ब्राह्मणको गोदान करनेसे सभी मनोरथोंकी सिद्धि होती है और जन्मान्तरमें सद्गति प्राप्त होती है। अश्विनी नक्षत्रमें उत्तम अश्लोक युक्त रथ ब्राह्मणको दान देनेसे राजवैभव-सम्पन्न कुटुम्बमें जन्म होता है और इस दानको करनेवाला व्यक्ति तेजस्वी होता है। भरणी नक्षत्रमें ब्राह्मणको तिलधेनुका दान करनेसे उसे उत्तम गौएँ तथा यश और सद्गतिकी प्राप्ति होती है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—महाराज! नारदजीने इस नक्षत्रकल्पको माता देवकीसे कहा था। यह नक्षत्र-दानकी विधि मैंने आपको सुनायी। इस दानके करनेसे सभी तरहके पाप दूर हो जाते हैं और सभी उपद्रव शान्त हो जाते हैं। इस दानमें किसी समय, दिन और कालका कोई विशेष नियम नहीं है, बल्कि इसमें श्रद्धा और विश्वास ही मुख्य है। (अध्याय १९२)
तिथिदान (तिथियोंमें दानके पदार्थ)
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंका विनाश करनेवाले और विघ्नोंको हरनेवाले तिथिदान (तिथियोंमें दिये जानेवाले दान-पदार्थ)-का विधान बता रहा हूँ। इस दानके करनेसे कायिक, वाचिक और मानसिक पाप उसी क्षण कट जाते हैं। श्रावण, कार्तिक, चैत्र, वैशाख अथवा फाल्गुन मासके शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा तिथिसे यह पुण्यवर्धक दान प्रारम्भ करना चाहिये। धन, श्रद्धा, सहयोगी और सत्पात्र—ये सब मिल जायें तो वही उत्तम दानका समय है। तीर्थ, देवालय, गोष्ठ अथवा घरमें ही श्रद्धापूर्वक दान देनेसे अनन्त फल प्राप्त होता है।
प्रतिपदाके दिन एक सुवर्णमय अष्टदल कमल बनाकर उसपर सुवर्णमय ब्रह्माकी स्थापना करे। इस कमलको सुगन्धित घृतसे पूर्ण औदुम्बरके पात्रमें रखकर पुष्प, धूप आदिसे ब्रह्माकी पूजा करे और ब्राह्मणकी पूजा कर उसे वह प्रतिमा दानमें दे दे। दाता इससे अभीष्ट कामनाओंको प्राप्त करता है और निष्कामभावसे यह दान करनेपर तो ब्रह्मीभूत हो जाता है। द्वितीयाके दिन सुवर्णकी अग्निकी प्रतिमा बनाये, उसे गुड़ तथा घृतसे पूरित ताम्रपात्रमें रखे और उस पात्रको जलपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित करे, फिर व्याहतिथीसे घृत और तिलोंसे एक सौ आहुति
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
देकर पूर्णाहुति प्रदान करे। वस्त्र-माला, अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्यसे उस मूर्तिका पूजनकर ब्राह्मणको दे दे और 'वह्निर्म प्रीयताम्' यह वाक्य उच्चारण करे। इससे जन्मभर किये गये पापोंसे मुक्त होकर वह वहिलोकमें निवास करता है—ऐसा नारदमुनिने कहा है। तृतीयाके दिन सुवर्णकी राधादेवीकी मूर्ति बनाकर उसे ताप्रात्रमें लवणके ऊपर स्थापित करे और दो रक्त वस्त्रोंसे उसे आच्छादित कर कुंकुमसे अलंकृत कर दे। जीरा, कटुक, गुड़ भी उसके पास रखे। गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदिसे उसका पूजन कर ब्राह्मणको प्रदान कर दे। इससे अनन्त पुण्य प्राप्त होता है। जहाँ सुवर्णप्रासाद हों, दूधकी नदियाँ बहती हों और गन्धर्व-अप्सराएँ जहाँ निवास करते हों, उन लोकोंमें वह पुरुष बहुत काल सुख भोगकर पुनः मर्त्यलोकमें जन्म लेता है और रूपवान्, भाग्यशाली, दाता, भोगी, धनाढ्य और पुत्र-पौत्रसे युक्त होता है तथा यदि स्त्री भी इस दानको करती है तो वह भी इन्हीं फलोंको प्राप्त करती है।
चतुर्थीके दिन सुवर्णके एक पलसे अधिक प्रमाणके अंकुशयुक्त हाथीकी प्रतिमा बनाकर एक द्रोण तिलोंके ऊपर उसे स्थापित करे और वस्त्र, पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर ब्राह्मणोंको प्रदान करे तथा 'गणेशो मे प्रीयताम्' यह वाक्य कहे। जो पुरुष यह दान करता है उसके किसी भी कार्यमें विघ्न नहीं होता और सात जन्मतक वह महान् हस्तियोंका स्वामी होता है तथा गजेन्द्रपर चढ़कर सब लोकोंको जीत लेता है। पञ्चमीके दिन एक पल सुवर्णका नाग बनाकर घृत-दुग्धसे पूर्ण एक पात्रमें उसे स्थापित कर विधिपूर्वक उसका पूजन करे। पूजनके अनन्तर उसे ब्राह्मणको देकर प्रणामकर क्षमापन करे। यह दान नागोंके
उपद्रवको दूर करता है और दाताको दोनों लोकमें सुख प्राप्त होता है। सर्पके काटनेसे मरे हुए पुरुषके उद्धारके लिये शिवजीने इसे प्रायश्चित्त कहा है। षष्ठीके दिन मयूरपर आरूढ़ तथा हाथमें शक्ति लिये और सुवर्णकी माला पहने कार्तिकेयकी एक सुवर्णकी प्रतिमा बनाये। उसे एक द्रोण चावलके ऊपर स्थापित कर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप आदि सभी उपचारोंसे उसका पूजन करे और कुटुम्बी ब्राह्मणको प्रदान करे। इस दानको करनेवाला पुरुष बहुत ऐश्वर्य प्राप्तकर अन्तमें स्वर्गको जाता है और यदि शूद्र इस दानको करे तो जन्मान्तरमें ब्राह्मण होता है। यदि ब्राह्मण ऐसा करता है तो ब्रह्मत्वको प्राप्त करता है। सप्तमीको सुवर्णकी अश्वयुक्त सूर्य-प्रतिमा बनाकर सब उपचारोंसे उसका पूजनकर दक्षिणासहित ब्राह्मणको दे दे। इससे गन्धर्व संतुष्ट होते हैं और वह पुरुष सूर्यलोकको प्राप्त करता है।
अष्टमीके दिन एक सर्वलक्षणसम्पन्न वृषभको दो श्वेत वस्त्र ओढ़ाकर उसके गलेमें घण्टा बाँधकर उसका पूजन करे और 'वृषभध्वजो मे प्रीयताम्' यह वाक्य उच्चारण कर ब्राह्मणको प्रदान करे। उसकी प्रदक्षिणा करे तथा ब्राह्मणके द्वारदेशतक उसके साथ जाय। इससे उसे शिवलोककी प्राप्ति होती है। वृषके स्कन्ध-प्रदेशमें चौदह भुवन प्रतिष्ठित रहते हैं। इसलिये वृषदान करनेसे चौदह भुवनोंके दान करनेका फल प्राप्त होता है। नवमीके दिन सुवर्णका एक सिंह बनाकर नीले वस्त्रसे उसे आच्छादित करे और उसे आठ मोतियोंसे जटित करे। दैत्योंका विनाश करनेवाली देवी भगवतीका ध्यानकर उस प्रतिमाको उत्तम ब्राह्मणको दान कर दे। इसके प्रभावसे सब प्रकारके उत्तम फल प्राप्त होते हैं और भयंकर वनोंमें तथा दुर्गोंमें एवं चोरों तथा सर्पादि हिंसक
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- उत्तरपर्व *
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जीवोंका उसको भय नहीं होता। कोई भी हिंसक प्राणी उसकी हिंसा नहीं कर पाता और अन्त समयमें देवताओंसे पूजित हो वह देवीलोकको प्राप्त करता है। वहाँ बहुत कालतक सुख भोगकर पुण्यक्षीण होनेपर मर्त्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा राजा होता है। दशमीको दस दिशा-देवियोंकी सोनेकी प्रतिमा बनाकर और दस पार्वतोंमें नमक, गुड़, दूध, निष्पाव, तिल, दही, घी, गोमय, चावल तथा उड़द भरकर इनके ऊपर एक-एक देवीकी स्थापना करे। वस्त्र-पुष्प आदिसे उनकी पूजाकर ब्राह्मणको दान कर दे। इस दानसे दानकर्ताके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और मृत्युके अनन्तर वह स्वर्गमें पूजित होता है। बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पृथ्वीमें उत्तम कुलमें जन्म प्राप्त करता है। एकादशीके दिन सुवर्णकी भगवान् विष्णुकी प्रतिमा बनाये। उसे घृतपूर्ण ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित कर सभी उपचारोंसे उसका पूजन करे। पूजनके अनन्तर पञ्चाग्नि तापनेवाले तथा पौराणिक ब्राह्मणको इसे देना चाहिये। इससे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।
द्वादशीके दिन गौ, वृष, सुवर्ण, सप्तधान्य, गुड़, फल, घृत और अनेक प्रकारके रस तथा फलवाले वृक्ष, फूल तथा सुगन्धित पदार्थ आदिको यथाशक्ति एकत्र कर सबको नवीन वस्त्रसे आच्छादित कर सत्पात्र ब्राह्मणोंको दान करे अथवा एक ही ब्राह्मणको प्रदान करे। इससे दाता बहुत कीर्ति और ऐश्वर्य प्राप्तकर अन्तमें विष्णुलोकको जाता है। वहाँ बहुत कालतक निवास कर पुण्यक्षय होनेपर पृथ्वीपर जन्म लेकर यज्ञ करनेवाला दानी और प्रतापी राजा होकर शतायु होता है। त्रयोदशीके दिन तेरह सत्पात्र ब्राह्मणोंको
स्नान कराये, उत्तम वस्त्र पहिनाये, गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर उनकी अर्चना करे तथा उत्तम भोजन कराये और दक्षिणामें सुवर्ण देकर 'धर्मो मे प्रीयताम्' ऐसा कहे और श्रद्धापूर्वक धर्मराजके इन तेरह नामों—धर्मराज, काल, चित्रगुप्त, दण्डी, मृत्यु, क्षयरूप, अन्तक, यम, प्रेतनाथ, रौद्र, वैवस्वत, महिषस्थ तथा देवका उच्चारणकर नमस्कार करे और विसर्जन करे। इस विधिसे जो पुरुष यमराजका अर्चन करता है, वह सभी रोगोंसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है और यममार्गमें कष्ट नहीं पाता। पितृलोकमें बहुत कालतक निवासकर वह मर्त्यलोकमें जन्म लेकर सुखी और पुत्रवान् होता है।
चतुर्दशीके दिन उत्तम सुन्दर सोनेकी महिषकी प्रतिमा बनाकर उसे जलपूर्ण कलशपर स्थापित कर वस्त्रसे ढककर वस्त्र तथा अलंकारोंसे सुशोभित करे। उसके साथ वृषभ भी रखे। इस प्रकार निर्माणकर उसे कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इससे शिवलोककी प्राप्ति होती है, वहाँ बहुत कालतक सुख भोगकर आरोग्य, धन और उत्तम कुलमें जन्म पाता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमाके दिन वृषोत्सर्ग करना चाहिये। चाँदीकी एक चन्द्रमाकी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर वस्त्र तथा आभूषणसहित ब्राह्मणको प्रदान करे। यह दान करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिमान् होता है और अप्सराओंसे पूजित होता है। जो पुरुष इस क्रमसे प्रतिपदा आदि तिथियोंमें ब्राह्मणोंको दान करता है, वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक आदिमें बहुत कालतक निवासकर अन्तमें शिव-सायुज्यको प्राप्त करता है। (अध्याय १९३)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वराहदानका विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंको हरनेवाले पवित्र और सब दानोंमें उत्तमादि उस वराहदानका विधान बता रहा हूँ, जिसके दानका विधान साक्षात् भगवान्ने अपने मुखसे धरणीदेवीको बताया था। यह दान संक्रान्ति, ग्रहण, द्वादशी, यज्ञोत्सव, विवाह, दुःस्वप्न-दर्शन आदि कालोंमें अथवा जब श्रद्धा हो तब करना चाहिये। कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों, गङ्गा आदि नदियोंके किनारे, पवित्र पुरियों, अरण्यों, वनों, गोष्ठ, देवालय अथवा अपने घरपर ही कुटुम्बी ब्राह्मणको विधिपूर्वक दान देना चाहिये। वह ब्राह्मण वेद-वेदाङ्ग जाननेवाला सुशील और सम्पूर्णङ्ग होना चाहिये।
पवित्र भूमिपर प्रणव-मन्त्रसे कुशा बिछाकर उसपर यथाशक्ति दो अथवा चार द्रोण तिलोंसे भगवान् वराहकी मूर्ति बनाये। उसका मुख सुवर्णका और चाँदीका जबड़ा बनाकर पद्मरागसे उसे अलंकृत कर दे। दो भुजाओंमें चक्र और गदा धारण कराये, सुवर्णका बना शङ्ख तथा
वनमाला अगल-बगलमें रख दे। उसके दोनों पैरोंको पुष्पोंसे अथवा चाँदीसे निर्मित करे। उसके दाँतके अग्रभागपर लगी हुई एक सुवर्णमयी पृथ्वी अङ्कित करे। समस्त धान्य-पदार्थों और रसोंको स्थापित करे। उसके शरीरको अलंकृत कर वस्त्रसे आच्छादित कर दे। कुशोंसे रोएँ बना दे। तदनन्तर गन्ध, पुष्प आदिसे उस वराहभगवान्की प्रतिमाकी अर्चना करे। फिर ग्रहयज्ञ और तिलोंसे होम करे। अनन्तर भगवान् वराहकी स्तुतिकर नमस्कार करे तथा प्रदक्षिणा कर वस्त्र, आभूषण और दक्षिणासहित वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। राजन्! इस दानसे सभी यज्ञों और सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। वराहभगवान्ने जिस प्रकार भूमिका उद्धार किया, उसी भाँति इस दानको करनेवाला पुरुष अपने कुलका उद्धार करता है और विष्णुलोकमें पूजित होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, शैव, वैष्णव, योगी आदि सभी यह दान कर सकते हैं।
(अध्याय १९४)
दशविध पर्वतदानोंमें धान्यशैलदानकी विधि और महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब मैं विविध दानोंके उत्तम माहात्म्यको सुनना चाहता हूँ, जो देवगणों एवं ऋषिसमूहोंद्वारा पूजित और परलोकमें अक्षय फल देनेवाला है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! प्राचीन कालमें इस विषयको भगवान् रुद्रने देवर्षि नारदसे और मत्स्यभगवान्ने स्वायम्भुव मनुसे कहा था। उस मेरु (पर्वत)-दानके दस भेदोंको मैं बतला रहा हूँ जिनका दान करनेसे मनुष्य देवपूजित लोकोंको प्राप्त करता है। उसे इस लोकमें जिस फलकी
प्राप्ति होती है, वह वेदों और पुराणोंके अध्ययनसे, यज्ञानुष्ठानसे और देव-मन्दिर आदिके निर्माणसे भी नहीं प्राप्त होता। इसलिये अब मैं पर्वतोंके क्रमसे उनके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम इस प्रकार हैं—पहला धान्यशैल, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमपर्वत, पाँचवाँ तिलशैल, छठा कार्पासपर्वत, सातवाँ घृतशैल, आठवाँ रत्नशैल, नवाँ रजतशैल और दसवाँ शर्कराचल। इनका विधान यथार्थरूपसे क्रमशः बतला रहा हूँ। सूर्यके उत्तरायण और दक्षिणायनके समय, पुण्यमय,
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- उत्तरपर्व *
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विषुवयोगमें, व्यतीपातयोगमें, ग्रहणके समय, सूर्य अथवा चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेपर, शुक्लपक्षकी तृतीया, द्वादशी या पूर्णिमा तिथिके दिन, विवाह, उत्सव और यज्ञके अवसरोंपर तथा पुण्यप्रद शुभ नक्षत्रके योगमें विद्वान् दाताको शास्त्रादेशानुसार विधिपूर्वक धान्यशैल आदि पर्वतदानोंको करना चाहिये। इसके लिये तीर्थोंमें, देवमन्दिरमें, गोशालामें अथवा किसी नदीके संगमपर भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ एक चौकोर मण्डपका निर्माण कराये, उसमें उत्तर और पूर्व दिशामें दो दरवाजे हों तथा उसकी भूमि पूर्वोत्तर दिशामें ढालू हो। उस मण्डपकी गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर कुश बिछाकर उसके बीचमें विष्कम्भपर्वतसहित* देय पदार्थकी पर्वताकार राशि लगा दे। इस विषयमें एक हजार द्रोण अन्नका पर्वत उत्तम, पाँच सौ द्रोणका मध्यम और तीन सौ द्रोणका कनिष्ठ माना जाता है।
महान् धान्यराशिसे बने हुए मेरुपर्वतको, मध्यमें तीन स्वर्णमय वृक्षोंसे युक्त कर, पूर्व दिशामें मोती और हीरेसे, दक्षिण दिशामें गोमेद और पुष्पराग (पुखराज)-से, पश्चिम दिशामें गारुत्मत (पन्ना) और नीलम मणिसे, उत्तर दिशामें वैदूर्य और पद्मराग मणिसे तथा चारों ओर चन्दनके टुकड़ों और मूँगैसे सुशोभित कर दे। उसे लताओंसे परिवेष्टित तथा सीपीके शिला-खण्डोंसे सुसज्जित कर दिया जाय। पुनः यजमान गर्वरहित होकर अनेकों द्विजसमूहोंके साथ उस पर्वतके मूर्धास्थानपर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्यकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। उसी प्रकार चारों दिशाओंमें गन्ना और बाँससे ढकी हुई कन्दराएँ तथा घी और जलके झरने भी बनाये जायँ। पुनः पूर्व दिशामें श्वेत वस्त्रोंसे, दक्षिण दिशामें काले वस्त्रोंसे, पश्चिम दिशामें
केसरिया वस्त्रोंसे और उत्तर दिशामें लाल वस्त्रोंसे बादलोंकी पंक्तियाँ बनायी जायँ। फिर चाँदीके बने हुए महेंद्र आदि आठों लोकपालोंको क्रमशः स्थापित करे और उस पर्वतके चारों ओर अनेकों प्रकारके फल, मनोरम पुष्पमालाएँ और चन्दन भी रख दे। उसके ऊपर पँचरंगा चँदोवा लगा दे और उसे खिले हुए श्वेत पुष्पोंसे विभूषित कर दे। इस प्रकार श्रेष्ठ अमरशैल (सुमेरुगिरि)-की स्थापना कर उसके चतुर्थांशसे इसके चारों दिशाओंमें क्रमशः विष्कम्भ (मर्यादा)-पर्वतोंकी स्थापना करनी चाहिये। ये सभी पुष्प और चन्दनसे सुशोभित हों। पूर्व दिशामें मन्दराचलका आकार बनाये, उसके निकट अनेकों प्रकारके फलोंकी कतारें लगा दे, उसे कनकभद्र (देवदारु) और कदम्ब-वृक्षोंके चिह्नोंसे सुशोभित कर दे, उसपर कामदेवकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। फिर उसे अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीके बने हुए वन और दुर्धनिर्मित अरुणोद नामक सरोवरसे सुशोभित करे। तत्पश्चात् वस्त्र, पुष्प और चन्दन आदिसे उसे भरपूर सुसज्जित कर देना चाहिये।
दक्षिण दिशामें गेहूँकी राशिसे गन्धमादनकी रचना करनी चाहिये। उसे स्वर्णपत्रसे सुशोभित कर दे। उसपर यज्ञपतिकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उसे वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर उसे घीके सरोवर और चाँदीके वनसे सुशोभित कर देना चाहिये। पश्चिम दिशामें अनेकों सुगन्धित पुष्पों, स्वर्णमय पीपल-वृक्ष और सुवर्णनिर्मित हंससे युक्त तिलाचलकी स्थापना करनी चाहिये। उसी प्रकार इसे भी वस्त्रसे परिवेष्टित तथा चाँदीके पुष्पवनसे सुशोभित कर दे। इसके अग्रभागमें दहीसे सितोद सरोवरकी भी रचना करे। इस प्रकार उस विपुल शैलकी स्थापना करके उत्तर
- सुमेरुगिरिके चारों ओर स्थित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्थ नामक पर्वतोंको 'विष्कम्भ—सहायक पर्वत' कहा जाता है।
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६२४
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
दिशामें उड़दसे सुपार्श्व नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित करे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वट-वृक्ष रख दे तथा सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे। उसी प्रकार मधुसे बने हुए भद्रसर नामक सरोवर और चमकीली चाँदीसे निर्मित वनसे संयुक्त कर देना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्व दिशामें एक हाथ लम्बा-चौड़ा और गहरा कुण्ड बनाकर तिल, घी, समिधा और कुशोद्धार चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे हवन कराये। वे सभी ब्राह्मण वेदों और पुराणोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, अनिन्द्य, चरित्रवान् और सुरूप हों। रातमें मधुर शब्दोंमें गायन और तुरही आदि वाद्योंका वादन कराते हुए जागरण करना चाहिये। इन पर्वतोंका आवाहन इस प्रकार करे—
त्वं सर्वदेवगणधामनिधे च विघ्न- मस्मदगृहेष्खमरपर्वत नाशयाशु।
क्षेमं विधत्स्व कुरु शान्तिमनुत्तमां नः
सम्पूजितः परमभक्तिमतः प्रदेहि ॥
त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः।
मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन ॥
यस्मात् त्वं लोकपालानां विश्वमूर्तेश्च मन्दिरम्।
केशवार्कवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे ॥
यस्मादशून्यमपैर्गन्धर्वैश्च शिवेन च।
तस्मान्नामुद्भराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥
(उत्तरपर्व १९५। २८—३१)
‘अमरपर्वत! आप समस्त देवगणोंके निवासस्थान और रलोंकी निधि हैं। आप हमारे घरोंमें स्थित विघ्न-बाधाओंको शीघ्र ही नष्ट कर दें, हमारे कल्याणका विधान करें और हमें श्रेष्ठ शान्ति तथा परम भक्ति प्रदान करें। सनातन! आप ही ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्य हैं तथा मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)-से परे संसारके बीज (कारणरूप) हैं, अतः
हमारी रक्षा करें। चूँकि आप लोकपालों, विश्वमूर्ति, केशव, सूर्य और वसुओंके निवासस्थान हैं, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करें। चूँकि आप देवताओं, गन्धर्वों और शिवजीसे अशून्य अर्थात् संयुक्त रहते हैं, इसलिये इस निखिल दुःखोंसे भरे हुए संसार-सागरसे मेरा उद्धार करें।’
इस विधिसे उस मेरुगिरिकी अर्चना करनेके पश्चात् मन्दराचलकी पूजा करनी चाहिये और इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—‘मन्दराचल! चूँकि आप चैत्ररथ वन और भद्राश्व वर्षसे सुशोभित हैं, इसलिये शीघ्र ही मेरे लिये तुष्टिकारक बनें।’ ‘गन्धमादन! चूँकि आप जम्बूद्वीपके शिरोमणि हैं, इसलिये गन्धर्वों और अप्सराओंके द्वारा मेरे यशका गान हो।’ ‘विपुल! चूँकि आप केतुमाल वर्ष और वैश्राज वनसे सुशोभित हैं तथा आपका पाषाण स्वर्णमय है, इसलिये आप मुझे शक्ति प्रदान करें।’ ‘सुपार्श्व! चूँकि आप उत्तर कुरुवर्ष और सावित्र वनसे नित्य शोभित हैं, अतः मुझे अक्षय लक्ष्मी प्रदान करें।’ इस प्रकार उन सभी पर्वतोंको आमन्त्रित करके पुनः निर्मल प्रभात होनेपर स्नान आदिसे निवृत्त हो बीचवाला श्रेष्ठ पर्वत गुरु (यज्ञ करानेवाले)-को दान कर दे। इसी प्रकार चारों विष्कम्भपर्वतोंको चारों ऋत्विजोंको क्रमशः दान कर देना चाहिये। इसके बाद चौतीस, दस, सात अथवा आठ गौका दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान करे। सभी पर्वतदानोंकी यही विधि है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ
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- उत्तरपर्व *
६२५
हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। भारत! अब आप सभी पर्वतदानोंकी विधि, मन्त्र और उनके फल सुनें। दान देते समय धान्यशैलसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये —
अत्रं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्त्रे प्राणाः प्रतिष्ठिताः। अत्राद् भवन्ति भूतानि जगदन्तरेन वर्धते॥ अत्रमेव यतो लक्ष्मीरत्रमेव जनार्दनः। धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम॥
(उत्तरपर्व १९५।४३-४४)
‘पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि अत्रको ही ब्रह्म कहा जाता है और उसीमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अत्रसे
ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही संसार संचालित हो रहा है, इसलिये अत्र ही लक्ष्मी है, अत्र ही भगवान् जनार्दन हैं, अतः धान्यशैलके रूपमें आप मेरी रक्षा करें।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे स्वर्गलोकको जाता है एवं उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्य-क्षय होनेपर वह इस लोकमें निःसंदेह राजाधिराज होता है। (अध्याय १९५)
लवणाचलदान-विधि तथा गुडपर्वतकी महिमाके प्रसंगमें सुलभाका आख्यान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य शिवलोकको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये, क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम और चार द्रोणसे बना हुआ लवणाचल अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार आधा या एक द्रोणका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक्-पृथक् (चार) विष्कम्भ (सहायक)-पर्वतोंका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय वृक्ष एवं लोकपालोंके भी स्थापनका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोंका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दान-मन्त्रोंको सुनिये—
सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणो रसः। दानात्मकत्वेन च मां पाहि पापान्नगोत्तम॥
तस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कृष्टा लवणां विना। प्रियं च शिवयोरित्यं तस्माच्छान्तिप्रदो भव॥ विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्। तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व १९६।६-८)
‘पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य-सरोवरसे प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये इसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।’ जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! अब मैं उत्तम गुडपर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ,
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६२६
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
जिससे धनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। दस भार गुडसे बना हुआ गुडपर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्कम्भपर्वत, सरोवर, वन, देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि धान्यपर्वतकी ही भाँति करनी चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करें—
यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः। सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥ प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा। तथा रसानां प्रवरः सदा चेक्षुरसो मतः॥ मम तस्मात् परां लक्ष्मीं प्रयच्छ गुडपर्वत। सुरासुराणां सर्वेषां नागयक्षक्षयन्त्रिणाम्॥ निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्मान्मां पाहि सर्वदा।
(उत्तरपर्व १९७।५-८)
‘जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद, योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें अकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षुरस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुडपर्वत! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुडपर्वत! चूँकि तुम देवताओं, असुरों, नागों, यक्षों, ऋक्षों तथा पार्वतीके भी निवासस्थान हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।’ जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुडपर्वतका दान करता है, वह गन्धर्वोद्धार पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय
होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। राजन्! इस गुडपर्वतदानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें।
सुलभा नामकी एक महाभाग्यशालिनी व्रतपरायणा रानी थी। वह राजा मरुतकी प्यारी पत्नी थी और रूप-यौवनसे सम्पन्न थी। राजा मरुतके सात सौ रानियाँ थीं। ये सभी रानियाँ सुलभाकी आज्ञामें रहती थीं और राजा मरुत भी सुलभाके परामर्शको मानते थे। रानी भी राजासे अत्यन्त स्नेह करती थी। एक बारकी बात है कि दुर्वासामुनि राजाके यहाँ आये। राजा मरुतने अर्घ्य-पाद्यादिसे मुनिका सत्कार किया। दुर्वासाजीसे सुलभाने पूछा—‘भगवन्! किस पुण्यकर्मके प्रभावसे राजा मुझे अत्यन्त प्यार करते हैं। मेरा ही मुख देखते रहते हैं और मेरे वशमें हैं, मेरी सौतेँ भी मेरा प्रिय करनेमें तत्पर रहती हैं? ब्रह्मन्! यह सब आप बतलायें, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल है।’
दुर्वासाजी बोले—सुभगे! तुम अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सावधान होकर सुनो। मैं तुम्हारे पूर्वजन्मोंकी बातोंको अच्छी तरह जानता हूँ। पूर्वजन्ममें तुम गिरिव्रजपुर (राजगृह—विहार)—में निवास करनेवाले एक वैश्यकी स्त्री थी। तुम धार्मिक, सत्यशील और पतिव्रता थी। वहाँ तुमने अपने पतिके साथ ब्राह्मणोंसे गुडपर्वत-दानके माहात्म्य और विधिको सुना था। तब तुमने गुडपर्वतका विधिवत् दान किया। वरानने! उसीके प्रभावसे तुम यह सुखभोग प्राप्त कर रही हो।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! उस सुलभाने अन्तमें सद्गति प्राप्त की। इस गुडपर्वतका दान स्त्रियोंके लिये विशेषरूपसे बताया गया है।
(अध्याय १९६-१९७)
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- उत्तरपर्व *
६२७
सुवर्ण एवं तिलशैलदान-विधि, तिलोंकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलकी दान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। नृपश्रेष्ठ! शेष सारे कार्योंका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर इन मन्त्रोंसे प्रार्थना करे—
नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय वै नमः॥
यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय।
यस्मादग्नेरपत्यं त्वं यस्मात् तेजो जगत्यतेः॥
हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम।
(उत्तरपर्व ११८।४—६)
‘शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अतः तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेजःस्वरूप हो, अतः सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम शिवलोकमें जाता है और वहाँ सौ वर्षोंतक निवास करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है।
राजन्! इसके बाद मैं तिलशैलदान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य उत्तम विष्णुलोकको प्राप्त होता है। तिल अत्यन्त पवित्र हैं, पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले हैं। तिलकी उत्पत्ति विष्णुके
शरीरसे हुई है, इसलिये इन्हें उत्तम बतलाया गया है। मधु-कैटभ नामके दो राक्षस दितिके पुत्र थे। भगवान् विष्णुके साथ मधु दैत्यका अनवरत युद्ध चलता रहा। फिर भी दानव मरा नहीं। इसपर भगवान् विष्णु अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उनके शरीरसे स्वेदकी बूँदें पृथिवीपर गिरीं और इधर-उधर बिखर गयीं। उसीसे तिल, उड़द एवं कुश उत्पन्न हुए। भगवान् विष्णुने बलवानोंमें बली उस मधुको मार डाला। उसी मधुके मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण पृथ्वी रँग गयी। इसलिये पर्वतोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा। जब मधु दैत्य मारा गया तो सभी देवता प्रसन्न हो भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए कहने लगे—‘देव! आपने ही संसारको धारण किया है। संसारकी सृष्टि आपने ही की है। मधुसूदन! यह सारा संसार अन्तमें आपमें ही लीन होता है। संसारका कल्याण करनेके लिये ये तिल आपके ही अङ्गसे उद्भूत हैं। देवेश! आप हम सबकी रक्षा करें।’
देवताओंकी यह स्तुति सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—देवगणो! ये तिल तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं। शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तिलोदक देना चाहिये। सात या आठ बार तिलोदककी अञ्जलि देनेसे देवता और पितर संतुष्ट हो जाते हैं और देनेवालेका मङ्गल करते हैं। कुत्ते, कौए और पतियोंसे दूषित वस्तु तिलोंके अभ्युक्षण करनेसे पवित्र हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस प्रकार जो तिलपर्वतका दान ब्राह्मणको करता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।
राजेन्द्र! दस द्रोण तिलका बना हुआ तिलशैल
१-देवीभागवत, हरिवंश आदि पुराणोंमें मधुके मेदसे उत्पन्न होनेके कारण पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा। यहाँ भी यही भाव है।
२-शकाकोपहतं यच्च पतितादिभिरेव च। तिलैरभ्युक्षितं सर्वं पवित्रं स्यान्न संशयः॥ (उत्तरपर्व ११९।१५)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उत्तम, पाँच द्रोणका मध्यम और तीन द्रोणका कनिष्ठ बतलाया गया है। इसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंकी स्थापना तथा अन्यान्य सारा कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। नृपश्रेष्ठ! तिलाचलकी प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये—
यस्मान्मधुवधे विष्णोर्दहैस्वेदसमुद्भवः।
तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छं नो भवन्तिवह॥
हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिलैरैवाभिमन्त्रणम्।
भवादुद्भर शैलेन्द्र तिलाचल नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १९९।१९-२०)
‘चूँकि मधुदैत्यके वधके समय भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूँदोंसे तिल, कुश और उड़दकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये तुम इस लोकमें हम सबका कल्याण
करो। शैलेन्द्र तिलाचल! चूँकि देवताओंके हव्य और पितरोंके कव्य—दोनोंमें तिलोंसे ही अभिमन्त्रण किया जाता है, इसलिये तुम मेरा भवसागरसे उद्भार करो, तुम्हें नमस्कार है।’
इस प्रकार आमन्त्रित कर जो मनुष्य श्रेष्ठ तिलाचलका दान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। उसे इस लोकमें दीर्घायुकी प्राप्ति होती है, वह पुत्र एवं पौत्रोंको प्राप्त कर उनके साथ आनन्द मनाता है तथा अन्तमें देवताओं, गन्धर्वों और पितरोंद्वारा पूजित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। इस दानके माहात्म्यको सुननेसे कपिलादानका पुण्य प्राप्त होता है।
(अध्याय १९८-१९९)
कपास एवं घृतपर्वतोंके दानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं कपासपर्वतके दानकी विधि बता रहा हूँ। यह सभी दानोंमें श्रेष्ठ और समस्त देवताओंको परम प्रिय है। अपने कुटुम्बका उद्भार करनेके लिये उपयुक्त देश-काल और धनको प्राप्तकर श्रद्धापूर्वक इस महादानको यत्नपूर्वक करना चाहिये। बीस भार रूईसे बना हुआ कपासपर्वत उत्तम, दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपासके बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। नृपश्रेष्ठ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल इस दानको करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र पढ़े—
त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।
कार्पासाचल नस्तस्मादधीघव्यंसनो भव॥
(उत्तरपर्व २००।७)
‘कार्पासाचल! चूँकि इस लोकमें तुम्हीं सदा सभी लोगोंके शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।’ इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानमें कार्पासाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर सौभाग्यशाली राजा होता है।
राजन्! इसके बाद मैं दिव्य तेजसे सम्पन्न अमृतमय और महान्-से-महान् पापोंके विनाशक श्रेष्ठ घृताचलदानका वर्णन कर रहा हूँ। पचास घड़े घीसे बना हुआ घृताचल उत्तम, पचीससे मध्यम और उसके आधेसे अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प वित्तवाला भी यदि करना चाहे तो वह यथाशक्ति घृताचलकी रचना करके दान कर सकता है। उसके चतुर्थीशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनी चाहिये। उन सभी घड़ोंके ऊपर अगहनी चावलसे परिपूर्ण पात्र रखा जाय और
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- उत्तरपर्व *
६२९
उन्हें विधिपूर्वक एकके ऊपर एक रखकर ऊँचा कर देना चाहिये। उन्हें श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर उनके निकट गन्ना और फल आदि रख दे। इसमें शेष सारा विधान धान्यपर्वतकी ही भाँति बतलाया गया है। देवताओंकी स्थापना, उनका अर्चन और हवन भी उसी प्रकार करना चाहिये। रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल यजमान शान्त मनसे वह घृताचल गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंको भी ऋत्विजोंको दान कर दे, उस समय इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये— संयोगादघृतमुत्पन्नं यस्मादमुत्ततेजसोः। तस्मादघृताचलश्चास्मात् प्रीयतां मम शंकरः ॥
यस्मात् तेजोमयं ब्रह्मा घृते नित्यं व्यवस्थितम्। घृतपर्वतरूपेण तस्मान्नः पाहि भूधर ॥
(उत्तरपर्व २०१।८-९)
‘चूँकि अमृत और अग्निके संयोगसे घृत उत्पन्न हुआ है, इसलिये घृताचलरूप शंकर इस व्रतसे प्रसन्न हों। चूँकि ब्रह्म तेजोमय है और घीमें विद्यमान है, ऐसा जानकर घृतपर्वतरूप मूधर! हमारी रक्षा करो।’ जो मनुष्य इस विधिसे इस श्रेष्ठ घृताचलका दान करता है, वह महापापी होनेपर भी शिवलोकको प्राप्त होता है।
(अध्याय २००-२०१)
रत्नाचल और रौप्याचलदानका माहात्म्य
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं श्रेष्ठ रत्नाचलदान-विधिका वर्णन कर रहा हूँ। इससे दाता सप्तर्षिलोक प्राप्त करता है। एक हजार मुक्ताफल (मोतियों)-द्वारा बना हुआ पर्वत उत्तम, पाँच सौसे बना हुआ मध्यम और तीन सौसे बना हुआ अधम (साधारण) माना गया है। अल्पवित्त व्यक्ति सौ मुक्ताफलोंसे रत्नाचलका दान करे। कल्पित पर्वतके चतुर्थांशसे उसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंको स्थापित करना चाहिये। विद्वानोंको पूर्व दिशामें हीरा और गोमेदसे मन्दराचलकी, दक्षिणमें पुष्पराग (पुखराज) और इन्द्रनील (नीलम) मणिके संयोगसे गन्धमादनकी, पश्चिममें वैदूर्य और मूँगैके सम्मिश्रणसे विपुलाचलकी और उत्तरमें गारुत्पत मणिसहित पद्मराग (माणिक्य) मणिसे सुपार्श्व पर्वतकी स्थापना करनी चाहिये। इस दानमें भी धान्यपर्वतकी तरह सारे उपकरणोंकी कल्पना करे। उसी प्रकार स्वर्णमय देवताओं, वनों और वृक्षोंका स्थापन एवं आवाहन करे तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रातःकाल
मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—
यथा देवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः। त्वं च रत्नमयो नित्यमतः पाहि महाचल ॥ यस्माद्वलप्रदानेन तुष्टिमेति जनार्दनः। पूजारत्नप्रदानेन तस्मान्नः पाहि सर्वदा ॥
(उत्तरपर्व २०१।८-९)
‘अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रत्नोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो, अतः महाचल! हमारी रक्षा करो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अतः तुम हमारी रक्षा करो।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु-सालोक्यको प्राप्त करता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सदगुणोंसे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
होता है। साथ ही उसके द्वारा इहलोक अथवा परलोकमें जो कुछ भी ब्रह्महत्या आदि पाप किये गये होते हैं, वे सभी उसी प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जैसे वज्रद्वारा प्रहार किया गया हुआ पर्वत।
नरोत्तम! इसके बाद मैं सर्वश्रेष्ठ रजतशैलका वर्णन कर रहा हूँ, जिसके दानसे मनुष्य सर्वश्रेष्ठ चन्द्रलोकको प्राप्त करता है। दस हजार पल चाँदीसे बना हुआ रजताचल उत्तम, पाँच हजार पलसे बना हुआ मध्यम और ढाई हजार पलसे बना हुआ अधम कहा गया है। यदि दाता ऐसा करनेमें असमर्थ हो तो उसे अपनी शक्तिके अनुसार बीस पलसे कुछ अधिक चाँदीद्वारा पर्वतका निर्माण कराना चाहिये। उसी प्रकार प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी रचना करे। पहलेकी तरह चाँदीके द्वारा मन्दर आदि पर्वतोंका निर्माण कर उनके नितम्बभागको सोनेसे सुशोभित कर दे। उनपर लोकपालोंकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और सूर्यकी मूर्तियोंसे भी संयुक्त कर दे। तत्पश्चात् बुद्धिमान् दाता इन सबकी विधिपूर्वक
अर्चना करे। सारांश यह है कि अन्य पर्वतोंमें जो उपकरण चाँदीके होते हैं, वे सभी इसमें सुवर्णके होने चाहिये। शेष हवन, जागरण आदि सारे कार्य धान्यपर्वतकी भाँति ही करे। तत्पश्चात् प्रातःकाल वस्त्र और आभूषण आदिके द्वारा गुरु और ऋत्विजोंका पूजन कर रजताचल गुरुको और विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय मत्सररहित हो हाथमें कुश लेकर इस मन्त्रका पाठ करे—
पितृणां वल्लभं यस्माद्धरीन्द्राणां शंकरस्य च। रजत पाहि तस्मान्नो घोरात् संसारसागरात्॥
(उत्तरपर्व २०३।८)
‘रजताचल! तुम पितरोंको तथा श्रीहरि, सूर्य, इन्द्र और शिवको परम प्रिय हो, इसलिये शोकरूपी संसारसागरसे मेरी रक्षा करो।’ जो मानव इस प्रकार निवेदन कर श्रेष्ठ रजताचलका दान करता है, वह दस हजार गो-दानका फल प्राप्त करता है। वह विद्वान् चन्द्रलोकमें गन्धर्वों, किन्नरों और अप्सराओंके समूहोंसे पूजित होकर प्रलयकालतक निवास करता है। (अध्याय २०२-२०३)
शर्कराचल और लवणाचल-दानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं परमोत्तम शर्कराचल-दानका वर्णन कर रहा हूँ। जिससे भगवान् विष्णु, रुद्र और सूर्य सदा संतुष्ट रहते हैं। आठ भारका शर्कराचल उत्तम, चार भारका मध्यम और दो भारका अधम कहा गया है। जो मानव स्वल्प सम्पत्तिवाला हो, वह एक भार अथवा आधे भारका भी शर्कराचल बनवा सकता है। प्रधान पर्वतके चतुर्थांशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी निर्माण करना चाहिये। पुनः धान्यपर्वतकी तरह सारी सामग्री प्रस्तुत करके मेरुपर्वतकी भाँति इसके ऊपर भी स्वर्णमयी देवमूर्तिके
साथ मन्दार, पारिजात और कल्पवृक्ष—इन तीनों वृक्षोंकी भी स्वर्णनिर्मित मूर्ति स्थापित करे। इन तीनों वृक्षोंको प्रायः सभी पर्वतोंपर स्थापित कर देना चाहिये। सभी पर्वतोंके पूर्व और पश्चिम भागमें हरिचन्दन और कल्पवृक्षको निविष्ट करना चाहिये। शर्कराचलमें तो इसका विशेषरूपसे ध्यान रखना चाहिये। कदम्ब-वृक्षके नीचे मन्दराचलपर कामदेवकी मूर्ति, जम्बू-वृक्षके नीचे गन्धमादनके शिखरपर भगवान् विष्णुकी मूर्ति, विपुलाचलपर सोनेकी हंसकी मूर्ति पूर्वाभिमुखी और स्वर्णमयी गौकी मूर्ति दक्षिणाभिमुखी होनी चाहिये।
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- उत्तरपर्व *
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तत्पश्चात् आवाहन, यज्ञ आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी तरह करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बीचका प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—
सौभाग्यामृतसारोऽयं परमः शर्करायुतः ॥ यस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा। अमृतं पिबतां ये तु निष्येतुर्भुवि शीकराः ॥ देवानां तत्समुत्थोऽसि पाहि नः शर्कराचल। मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः ॥ तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्।
(उत्तरपर्व २०४।१०—१३)
‘शैलेन्द्र ! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल ! देवताओंके अमृतपान करते समय जो बूँदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, अतः तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल ! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।’
जो मनुष्य इस विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारागणोंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अयुत जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करानेका विधान है। गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल स्वयं भी क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये।
राजन् ! अब आप लवणाचल-दानकी महिमामें एक आख्यान सुनें—पहले ब्रह्मकल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था। वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकोंमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। एक बार सभामण्डपमें पधारे अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मय-विमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया—
‘भगवन् ! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है ?’
वसिष्ठजीने कहा—राजन् ! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्त थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शुद्धजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल ! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है—ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी उसने नहीं लिया था। पृथ्वीपते ! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
लीलावतीके पर्वतदानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरुशुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो, जो दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देवमूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है।
मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायकरूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता, सौभाग्यसम्पन्नता और लक्ष्मीकी प्राप्ति
हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'ऐसा ही करूँगा।' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् पुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वतदानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। नृपश्रेष्ठ! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसंगका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तिचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, वह विष्णुलोक तथा शिवलोकको प्राप्त करता है तो इसमें क्या आश्चर्य? (अध्याय २०४)
सदाचारधर्मका निरूपण
महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मैंने आपसे प्रतिपदा आदि तिथियोंके दानको क्रमशः विस्तारसे सुना, सभी रहस्यों तथा मन्त्रोंके साथ व्रत एवं दान आदिके प्रारम्भ और उद्यापन-विधियोंको सुना। यज्ञ-यागादि दानधर्मों, स्नानविधि, उत्सवों तथा इष्टापूर्तकर्मोंके विषयमें भी सुना। फिर भी मधुसूदन! मेरा मन सशंकित हो रहा है, क्योंकि व्रतोंके प्रसंगमें आपने विविध देवताओंका वर्णन किया है। देवकीपुत्र! आपने देवताओंका नानात्त्व प्रदर्शन किया तथा तिथिके क्रमसे अलग-अलग मन्त्र आदिको भी बतलाया है। परंतु ध्यान-योगपरायण व्यासादि मुनियोंने केवल अव्यय, सर्वगत, निर्विकार एक परमात्माका ही वर्णन
किया है, इसमें क्या रहस्य है? प्रभो! आपने अनेक विषय बतलाये, पर वर्णाश्रमके आचार और धर्मोंका निरूपण नहीं किया। ये सभी महर्षिगण आपकी वाणी सुननेके लिये उत्सुक हैं। इस विषयको आप बतलायें।
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! व्रतों और दानोंका तो मैंने सारांशरूपसे वर्णन किया है। विशेष वर्णन तो भगवती सरस्वती ही कर सकती हैं। सभी वर्णाश्रमोंका सामान्य धर्म यही है कि सभी प्राणी विघ्नरहित हों और सभी कल्याणके भागी बनें। यहाँपर जो मैंने देवताओंके उद्देश्यसे व्रतोंका आपसे वर्णन किया है, उसमें भी मूलतः एक परमात्मदेवका ही वर्णन हुआ है। जो ब्रह्मा हैं
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- उत्तरपर्व *
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वही हरि, वही महेश्वर, वही सूर्य, वही अग्नि, वही कार्तिकेय और वही विनायक हैं, गौरी, लक्ष्मी और सावित्री ये भी एक ही शक्तिके भिन्न-भिन्न रूप हैं, मूलतः एक ही तत्त्व है। किसी देवता या देवीको उद्देश्यकर जो मनुष्य व्रत करता है, उसे वहाँपर देवी-देवताका भेद नहीं जानना चाहिये, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् शिव-शक्तिमय है। जैसे अग्नि, वायु एवं जलके भेदसे वसुधाके अनेक भेद प्रतीत होते हैं, किंतु पारमार्थिक दृष्टिसे विचार करनेपर भेदका भान नहीं होता है।
पार्थ! वेदधर्मके अनुसार जो कोई भी जिस किसी भी देवताका आश्रयण कर जिस किसी भी दान अथवा व्रतको करता है, उन सबके मूलमें वस्तुतः एक ही परमात्माकी उपासना होती है। मैंने जो व्रत-दानकी विधियाँ कही हैं, वे सदाचारीको ही फलप्रद होती हैं, आचारहीनको नहीं। आचारहीन व्यक्तिको छः अङ्गोंके साथ अधीत वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। जैसे पक्षी पंख निकलनेके बाद अपने घोंसलेको छोड़ देता है, वैसे ही ये वेद आचारहीनको मृत्युके समय परित्याग कर देते हैं१। जैसे कपालमें रखा जल, कुत्तेके चर्मपात्र (मशक)- में रखा दूध स्थानदोषसे अशुद्ध हो जाता है, इसी प्रकार आचारहीन व्यक्ति भी अशुद्ध ही है। इसलिये वृत्त (आचार)-की यन्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि धन तो आता-जाता रहता है। जो धनसे हीन है, वह दीन नहीं, किंतु जो
आचारसे गिरा हुआ है वह गिरा ही रहता है, वह मेरे हुएके समान है। राजन्! इस प्रकार आचार ही धर्म और कुलका मूल है। आचारसे च्युत व्यक्ति न कुलीन होता है और न धार्मिक होता है। दुरात्मा व्यक्तिके बहुत बड़े कुलसे क्या लाभ? क्या सुगन्धित पुष्पमें कीड़े नहीं रहते? इसी प्रकार उत्तम कुलमें भी दुराचारी उत्पन्न हो जाते हैं। हीन जातिमें उत्पन्न व्यक्ति भी यदि शौचाचारसम्पन्न है और सभी धर्मोंको जानता है तो वह सज्जनोंमें कुलीन और श्रेष्ठ है। कुलको कुल नहीं कहा जाता, बल्कि सदाचार ही कुल है। राजन्! जो व्यक्ति सदाचार-सम्पन्न है, वह इस लोक और परलोक दोनोंमें आनन्द प्राप्त करता है२।
राजन्! आचारसे धर्म उत्पन्न है और संत ही सदाचारके मूल हैं। उनका आचार ही सदाचार है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे सदाचारका पालन करना चाहिये। सदाचारके पालनसे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं। संसार जिसे न ठीकसे देखता है और न जिसका कभी परिचय पाता है, वह यदि सदाचारी और धर्मात्मा (पुण्यश्लोक राम, नल, युधिष्ठिर आदिकी तरह) है तो तीनों कालमें उसे श्रेष्ठ मानकर सभी आदरकी दृष्टिसे स्मरण करते रहते हैं और सभी उसका प्रिय करते हैं। जो नास्तिक, ईश्वरीय आस्थासे रहित तथा गुरुओं एवं शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं, अधर्मज्ञ एवं दुराचारी हैं, वे मानो मृतक-तुल्य हैं, पर यदि
१-आचारहीन न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिर्ब्रह्मैः। छन्दास्थेन मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥
(उत्तरपर्व २०५।१७)
यह श्लोक वसिष्ठ, गौतम आदि धर्मसूत्रों और प्रायः अनेक पुराणों एवं धर्मशास्त्रोंमें भी इसी प्रकार प्राप्त होता है।
२-कपालस्थं यथा तोयं श्रुतौ वा यथा पयः। दुष्टं स्यात् स्थानदोषेण वृत्तहीने तथाशुभम् ॥
वृत्तं यनेन संरक्षेद् वितमेति प्रयाति च। अहीनो वित्तो हीनो वृत्तस्तस्य हतो हतः ॥
एवमाचारधर्मस्य मूलं राजन् कुलस्य च। आचारान्नि च्युतो जन्तुनं कुलीनो न धार्मिकः ॥
किं कुलेनोपदिष्टेन विपुलेन दुरात्मनाम्। क्रमयः किं न जायन्ते कुसुमेषु सुगन्धिषु ॥
हीनजातिप्रसृतोऽपि शौचाचारसमन्वितः। सर्वधर्मार्थकुशलः स कुलीनः सतां वरः ॥
न कुलं कुलमित्यादुराचारः कुलमुच्यते। आचारकुशलो राजन्मिह चामुत्र नन्दते ॥ (उत्तरपर्व २०५।१८-२३)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कोई व्यक्ति सम्पूर्ण लक्षणोंसे हीन होते हुए भी सदाचार-सम्पन्न, श्रद्धालु और अनिन्दक है तो वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
मानवको चाहिये कि ब्राह्म-वेलामें जग जाय और धर्म तथा अर्थके विषयमें विचार करे। कभी भी ब्राह्मण, अग्नि, गौ तथा सूर्यके सम्मुख मल-मूत्रका उत्सर्जन नहीं करना चाहिये। दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका विसर्जन करना चाहिये। प्रातःकाल नित्य-क्रियासे निवृत्त हो आचमनके अनन्तर समाहित होकर प्रातः-संध्या करनी चाहिये। इसी प्रकार वाणीपर नियन्त्रण कर मौन होकर सायं-संध्या करे। भगवान् सूर्यको उगते हुए तथा अस्त होते हुए नहीं देखना चाहिये। ऋषियोंने दीर्घकालीन तपस्या आदिसे दीर्घायुको प्राप्त किया। धार्मिक राजाको चाहिये कि जो द्विज प्रातः तथा सायं-संध्या नहीं करता, उसे शुद्ध-कर्ममें नियोजित कर दे। मूत्र-पुरीषमें यदि वेग हो जाय या कोई बाधा उपस्थित हो जाय तो उस समय विधि एवं नियमकी अपेक्षा न करे। पृथ्वीको तुणोंसे तथा सिरको वस्त्रसे आच्छादितकर मल त्याग करना चाहिये। ग्राम, आश्रम, तीर्थ, क्षेत्र, मार्ग, जुते खेत, गोष्ठ और गौओंके मार्ग आदि स्थानोंमें मूत्रादिका परित्याग नहीं करना चाहिये। जलके अंदरकी, आश्रम आदिकी, वल्मीककी, चूहिके बिलकी तथा शौचसे बची—इन पाँच प्रकारकी मिट्टियोंका शौच आदिमें प्रयोग न करे।
देवताओं आदिकी पूजा, गुरुओंका अभिवादन तथा भोजन आदि क्रियाएँ आचमन करनेके अनन्तर करनी चाहिये। फेनरहित, सुगन्धित निर्मल जलसे पूर्व या उत्तराभिमुख हो आचमन करना चाहिये। विद्वानोंको धर्म-अर्थ तथा कामके कार्योंको करना चाहिये। धर्म-अर्थ तथा काम इस त्रिवर्गके सम्पादनसे गृहस्थको ऐहिक और पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होती है। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपने न्यायोपार्जित
द्रव्यके एक भागसे परलोक-सम्बन्धी पुण्यकर्मोंका सम्पादन करना चाहिये। एक भागका संचय करे और आधे अर्थात् दो भागका भोजन, व्यवहार तथा नित्य-नैमित्तिक कार्योंमें व्यय करे। अतः न्यायपूर्वक धनके उपार्जनके लिये प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि धनके माध्यमसे ही धर्म-काम आदि पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। पूर्वाह्नकालमें ही केशप्रसाधन, आदर्शदर्शन, दन्तधावन तथा देवताओंका पूजन आदि कर लेना चाहिये। मल-मूत्रादि क्रियाएँ घरसे दूर करनी चाहिये तथा घरका जूठन आदि भी दूर फेंकना चाहिये। मिट्टीके ढेलेको तोड़नेवाला, तिनकोंको टुकड़े-टुकड़े करनेवाला, नख काटकर खानेवाला, नित्य उच्छिष्ट भोजन करनेवाला तथा वस्तुओंमें मिलावट करनेवाला इस संसारमें अधिक दिनोंतक नहीं जीता। दूसरेकी स्त्रीको नग्न नहीं देखना चाहिये, अपने पुरीष (मल)-को भी न देखे। रजस्वला स्त्रीको न देखे, न उसका स्पर्श करे और न उससे वार्तालाप करे। जलमें मूत्र-पुरीषका उत्सर्ग तथा मैथुन नहीं करना चाहिये। केश, राख, कपाल, मल-मूत्र, भूसी, अंगार, अस्थिपंजर तथा रस्सी आदिपर न बैठे। विद्वानोंको चाहिये कि ब्राह्मणोंको प्रणाम करें तथा उन्हें बैठनेके लिये आसन प्रदान करें, जाते समय कुछ दूरतक उन्हें पहुँचाने जायँ। टूटे-फूटे आसनपर न बैठे और फूटे हुए काँसेके पात्रोंका उपयोग न करे। बालोंको खोलकर भोजन न करे। नग्न होकर स्नान और शयन न करे। जूठे स्थानपर न बैठे। जूठे हाथसे सिरका स्पर्श न करे, क्योंकि सभी प्राण सिरमें स्थित रहते हैं। सिरके बालोंको न खींचे और न सिरपर प्रहार करे। पुत्र और शिष्यको कोड़े-से नहीं मारना चाहिये। अपने सिरको दोनों हाथोंसे एक साथ नहीं खुजलाना चाहिये। बिना कारण सिरसे स्नान नहीं करना चाहिये। ग्रहणके बिना रात्रि-स्नान नहीं करना चाहिये। भोजनके अनन्तर तथा अथाह जलमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं
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- उत्तरपर्व *
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करना चाहिये। स्नान करनेके बाद तेल नहीं लगाना चाहिये। तिलपिष्ट नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे आयु क्षीण होती है।
अपने गुरुजनों तथा श्रेष्ठजनोंसे बुरी बात न बोले। यदि वे क्रुद्ध दिखायी दें तो उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। दूसरेकी निन्दाजनक बात नहीं सुननी चाहिये और न स्वयं करनी चाहिये। प्रशस्त ओषधियोंका ही सेवन करना चाहिये। रत्नोंको धारण करना चाहिये। अपने केशोंको स्निग्ध और निर्मल रखना चाहिये। सुन्दर शिष्ट वेष धारण करना चाहिये। सफेद, प्रिय लगनेवाले फूलोंको धारण करना चाहिये। दूसरेके किञ्चिन्मात्र धनको न लेना चाहिये और न कभी अप्रिय बोलना चाहिये। सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिये। दूसरेके दोषोंको नहीं कहना चाहिये। किसीसे वैर बाँधना नहीं चाहिये। दुष्ट यानमें न चढ़े। नदीके किनारेकी छाया आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये। विद्वेषी, पतित, उन्मत्त, बहुतोसे वैर करनेवाले, वर्णसंकर, वन्ध्या, वन्ध्याके पति, नीच, असत्य भाषण करनेवाले, अत्यन्त खर्चीले स्वभाववाले, दूसरेकी व्यर्थ निन्दा करनेवाले तथा शठसे विद्वान् व्यक्तिको मैत्री नहीं करनी चाहिये। मार्गमें एकाकी गमन न करे। अतिशय वेगसम्पन्न जलमें स्नान न करे। जलते हुए घरमें प्रवेश न करे। वृक्षके ऊपरतक न चढ़े। शवके प्रति हुंकार न करे। दांतोंको परस्पर रगड़ना नहीं चाहिये। नासिका फुलाना नहीं चाहिये। मुखको अधिक खोलकर नहीं बोलना चाहिये। ऊँचे स्वरमें हँसना नहीं चाहिये और शब्द करते हुए अपान वायुका परित्याग नहीं करना चाहिये। नखसे नख नहीं बजाना चाहिये, न छेदन करना चाहिये और न पृथ्वीपर लिखना ही चाहिये। दाढ़ी-मूँछके बालोंका भक्षण नहीं करना चाहिये, पैरसे पैरका आक्रमण
नहीं करना चाहिये। गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर नहीं बैठना चाहिये। सदा सदाचारतत्पर रहना चाहिये। कामाचारी नहीं होना चाहिये। दोनों लोकोंमें शुभ चाहनेवाला व्यक्ति कामाचारपूर्वक जीवनयापन न करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। रात्रिमें चतुष्पद (चौराहा), श्मशान, ग्रामके समीपवर्ती पीपल आदिके वृक्ष, उपवन तथा दुष्ट स्त्रीके सानिध्यका परित्याग करे। ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुमें छत्र धारण किये रहे। रात्रि और वनमें मौन रहे। केश, अस्थि, कण्टकयुक्त अपवित्र बलिस्थान, भस्म, भूसी तथा स्नानसे भीगी हुई पृथ्वीका दूरसे ही परित्याग करे।
ब्राह्मण, राजा, स्त्री, ज्ञानवान्, गर्भिणी स्त्री, बोझसे दवा हुआ व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति, मूक, अन्धा, बधिर, मतवाला तथा उन्मत्त व्यक्तिको दूरसे ही मार्ग दे देना चाहिये। अन्योंके द्वारा धारण किये गये जूते, वस्त्र तथा माला नहीं धारण करना चाहिये। दूसरेकी स्त्रीके उपसेवनसे बढ़कर लोकमें अनायुष्यका अन्य कोई भी कार्य नहीं है*। स्त्रियोंसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये और स्त्रियोंकी रक्षा करना कर्तव्य समझना चाहिये। ईर्ष्या करनेसे आयुका ह्रास होता है, अतः ईर्ष्याका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, विरूप, अहंकारी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग अथवा विद्यासे हीन व्यक्तिका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। रात्रिमें देही और सत्तूका भक्षण नहीं करना चाहिये। महाराज! आधी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। घुटनोंको ऊपर कर अधिक देरतक नहीं बैठना चाहिये। दूसरेके रहस्यकी बातको जाननेकी उत्सुकता तथा अभिलाषा नहीं रखनी चाहिये। पैरके ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। अतिशय रक्त, चितकबरा तथा कृष्ण वस्त्रको अधिक समयतक नहीं धारण करना चाहिये और वस्त्र या अलंकारका विपर्यय भी नहीं करना
- न हीदृशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते। यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ (उत्तरपर्व २०५।७३)
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