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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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वही हरि, वही महेश्वर, वही सूर्य, वही अग्नि, वही कार्तिकेय और वही विनायक हैं, गौरी, लक्ष्मी और सावित्री ये भी एक ही शक्तिके भिन्न-भिन्न रूप हैं, मूलतः एक ही तत्त्व है। किसी देवता या देवीको उद्देश्यकर जो मनुष्य व्रत करता है, उसे वहाँपर देवी-देवताका भेद नहीं जानना चाहिये, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् शिव-शक्तिमय है। जैसे अग्नि, वायु एवं जलके भेदसे वसुधाके अनेक भेद प्रतीत होते हैं, किंतु पारमार्थिक दृष्टिसे विचार करनेपर भेदका भान नहीं होता है।

पार्थ! वेदधर्मके अनुसार जो कोई भी जिस किसी भी देवताका आश्रयण कर जिस किसी भी दान अथवा व्रतको करता है, उन सबके मूलमें वस्तुतः एक ही परमात्माकी उपासना होती है। मैंने जो व्रत-दानकी विधियाँ कही हैं, वे सदाचारीको ही फलप्रद होती हैं, आचारहीनको नहीं। आचारहीन व्यक्तिको छः अङ्गोंके साथ अधीत वेद भी पवित्र नहीं कर सकते। जैसे पक्षी पंख निकलनेके बाद अपने घोंसलेको छोड़ देता है, वैसे ही ये वेद आचारहीनको मृत्युके समय परित्याग कर देते हैं१। जैसे कपालमें रखा जल, कुत्तेके चर्मपात्र (मशक)- में रखा दूध स्थानदोषसे अशुद्ध हो जाता है, इसी प्रकार आचारहीन व्यक्ति भी अशुद्ध ही है। इसलिये वृत्त (आचार)-की यन्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिये, क्योंकि धन तो आता-जाता रहता है। जो धनसे हीन है, वह दीन नहीं, किंतु जो

आचारसे गिरा हुआ है वह गिरा ही रहता है, वह मेरे हुएके समान है। राजन्! इस प्रकार आचार ही धर्म और कुलका मूल है। आचारसे च्युत व्यक्ति न कुलीन होता है और न धार्मिक होता है। दुरात्मा व्यक्तिके बहुत बड़े कुलसे क्या लाभ? क्या सुगन्धित पुष्पमें कीड़े नहीं रहते? इसी प्रकार उत्तम कुलमें भी दुराचारी उत्पन्न हो जाते हैं। हीन जातिमें उत्पन्न व्यक्ति भी यदि शौचाचारसम्पन्न है और सभी धर्मोंको जानता है तो वह सज्जनोंमें कुलीन और श्रेष्ठ है। कुलको कुल नहीं कहा जाता, बल्कि सदाचार ही कुल है। राजन्! जो व्यक्ति सदाचार-सम्पन्न है, वह इस लोक और परलोक दोनोंमें आनन्द प्राप्त करता है२।

राजन्! आचारसे धर्म उत्पन्न है और संत ही सदाचारके मूल हैं। उनका आचार ही सदाचार है। इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे सदाचारका पालन करना चाहिये। सदाचारके पालनसे दोष-पाप नष्ट हो जाते हैं। संसार जिसे न ठीकसे देखता है और न जिसका कभी परिचय पाता है, वह यदि सदाचारी और धर्मात्मा (पुण्यश्लोक राम, नल, युधिष्ठिर आदिकी तरह) है तो तीनों कालमें उसे श्रेष्ठ मानकर सभी आदरकी दृष्टिसे स्मरण करते रहते हैं और सभी उसका प्रिय करते हैं। जो नास्तिक, ईश्वरीय आस्थासे रहित तथा गुरुओं एवं शास्त्रोंकी आज्ञाका उल्लङ्घन करते हैं, अधर्मज्ञ एवं दुराचारी हैं, वे मानो मृतक-तुल्य हैं, पर यदि

१-आचारहीन न पुनन्ति वेदा यद्यप्यधीताः सह षड्भिर्ब्रह्मैः। छन्दास्थेन मृत्युकाले त्यजन्ति नीडं शकुन्ता इव जातपक्षाः ॥

(उत्तरपर्व २०५।१७)

यह श्लोक वसिष्ठ, गौतम आदि धर्मसूत्रों और प्रायः अनेक पुराणों एवं धर्मशास्त्रोंमें भी इसी प्रकार प्राप्त होता है।

२-कपालस्थं यथा तोयं श्रुतौ वा यथा पयः। दुष्टं स्यात् स्थानदोषेण वृत्तहीने तथाशुभम् ॥

वृत्तं यनेन संरक्षेद् वितमेति प्रयाति च। अहीनो वित्तो हीनो वृत्तस्तस्य हतो हतः ॥

एवमाचारधर्मस्य मूलं राजन् कुलस्य च। आचारान्नि च्युतो जन्तुनं कुलीनो न धार्मिकः ॥

किं कुलेनोपदिष्टेन विपुलेन दुरात्मनाम्। क्रमयः किं न जायन्ते कुसुमेषु सुगन्धिषु ॥

हीनजातिप्रसृतोऽपि शौचाचारसमन्वितः। सर्वधर्मार्थकुशलः स कुलीनः सतां वरः ॥

न कुलं कुलमित्यादुराचारः कुलमुच्यते। आचारकुशलो राजन्मिह चामुत्र नन्दते ॥ (उत्तरपर्व २०५।१८-२३)

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