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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 643, कुल 654 में से

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पृष्ठ 643

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

लीलावतीके पर्वतदानमें बड़ी परिचर्या की थी। उन दोनोंकी सहायतासे लीलावतीने गुरुशुश्रूषा आदि कार्योंको सम्पन्न किया था। अधिक कालके व्यतीत होनेपर वह वेश्या लीलावती समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको चली गयी। वह सोनार, जो दरिद्र होते हुए भी अत्यन्त सामर्थ्यशाली था और जिसने वेश्यासे कुछ भी मूल्य नहीं लिया था, इस समय इस जन्ममें तुम हो, जो दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् और सातों द्वीपोंके अधीश्वररूपसे उत्पन्न हुए हो। सोनारकी जिस पत्नीने स्वर्णनिर्मित वृक्षों एवं देवमूर्तियोंको अत्यन्त चमकीला बनाया था, वही यह भानुमती तुम्हारी पटरानी है।

मूर्तियोंको उज्ज्वल करनेके कारण इसे इस जन्ममें सुन्दर गौरवर्णका शरीर और भुवनेश्वरीका पद प्राप्त हुआ है। चूँकि तुम दोनोंने दत्तचित्त होकर रात्रिमें लवणाचलके दान-प्रसंगमें सहायकरूपसे कर्म किया था, इसीलिये तुम्हें लोकमें अजेयता, नीरोगता, सौभाग्यसम्पन्नता और लक्ष्मीकी प्राप्ति

हुई है। इस कारण तुम भी इस जन्ममें विधानपूर्वक दस प्रकारके धान्याचल आदि पर्वतोंका दान करो। तब राजा धर्ममूर्तिने 'ऐसा ही करूँगा।' कहकर वसिष्ठजीके वचनोंका आदर किया और सैकड़ों बार धान्याचल आदि सभी पर्वतोंका दान किया, जिसके फलस्वरूप देवगणोंद्वारा पूजित होकर भगवान् पुरारिके लोकको प्राप्त हुआ। निर्धन मनुष्य भी यदि उत्कृष्ट भक्तिपूर्वक इन पर्वतदानोंको देखता है, मनुष्योंद्वारा दान करते समय उनका स्पर्श कर लेता है, उनकी कथाएँ सुनता है और उन्हें करनेके लिये सम्मति देता है तो वह भी पापरहित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। नृपश्रेष्ठ! जब इस लोकमें मनुष्यद्वारा भव-भयको विदीर्ण करनेवाले इन शैलेन्द्रोंके प्रसंगका पाठ करनेसे दुःस्वप्न शान्त हो जाते हैं, तब जो मनुष्य स्वयं शान्तिचित्तसे विधिपूर्वक इन सम्पूर्ण पर्वतदानोंको करता है, वह विष्णुलोक तथा शिवलोकको प्राप्त करता है तो इसमें क्या आश्चर्य? (अध्याय २०४)

सदाचारधर्मका निरूपण

महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! मैंने आपसे प्रतिपदा आदि तिथियोंके दानको क्रमशः विस्तारसे सुना, सभी रहस्यों तथा मन्त्रोंके साथ व्रत एवं दान आदिके प्रारम्भ और उद्यापन-विधियोंको सुना। यज्ञ-यागादि दानधर्मों, स्नानविधि, उत्सवों तथा इष्टापूर्तकर्मोंके विषयमें भी सुना। फिर भी मधुसूदन! मेरा मन सशंकित हो रहा है, क्योंकि व्रतोंके प्रसंगमें आपने विविध देवताओंका वर्णन किया है। देवकीपुत्र! आपने देवताओंका नानात्त्व प्रदर्शन किया तथा तिथिके क्रमसे अलग-अलग मन्त्र आदिको भी बतलाया है। परंतु ध्यान-योगपरायण व्यासादि मुनियोंने केवल अव्यय, सर्वगत, निर्विकार एक परमात्माका ही वर्णन

किया है, इसमें क्या रहस्य है? प्रभो! आपने अनेक विषय बतलाये, पर वर्णाश्रमके आचार और धर्मोंका निरूपण नहीं किया। ये सभी महर्षिगण आपकी वाणी सुननेके लिये उत्सुक हैं। इस विषयको आप बतलायें।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा— राजन्! व्रतों और दानोंका तो मैंने सारांशरूपसे वर्णन किया है। विशेष वर्णन तो भगवती सरस्वती ही कर सकती हैं। सभी वर्णाश्रमोंका सामान्य धर्म यही है कि सभी प्राणी विघ्नरहित हों और सभी कल्याणके भागी बनें। यहाँपर जो मैंने देवताओंके उद्देश्यसे व्रतोंका आपसे वर्णन किया है, उसमें भी मूलतः एक परमात्मदेवका ही वर्णन हुआ है। जो ब्रह्मा हैं

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