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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 642, कुल 654 में से

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पृष्ठ 642
  • उत्तरपर्व *

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तत्पश्चात् आवाहन, यज्ञ आदि सारा विधान धान्यपर्वतकी तरह करके अन्तमें इन वक्ष्यमाण मन्त्रोंका उच्चारण करते हुए बीचका प्रधान पर्वत गुरुको और चारों विष्कम्भपर्वत ऋत्विजोंको दान कर दे। वे मन्त्र इस प्रकार हैं—

सौभाग्यामृतसारोऽयं परमः शर्करायुतः ॥ यस्मादानन्दकारी त्वं भव शैलेन्द्र सर्वदा। अमृतं पिबतां ये तु निष्येतुर्भुवि शीकराः ॥ देवानां तत्समुत्थोऽसि पाहि नः शर्कराचल। मनोभवधनुर्मध्यादुद्भूता शर्करा यतः ॥ तन्मयोऽसि महाशैल पाहि संसारसागरात्।

(उत्तरपर्व २०४।१०—१३)

‘शैलेन्द्र ! यह शक्करद्वारा निर्मित पर्वत सौभाग्य और अमृतका सार है, इसलिये तुम मेरे लिये सदा आनन्दकारक होओ। शर्कराचल ! देवताओंके अमृतपान करते समय जो बूँदें भूतलपर टपक पड़ी थीं, उन्हींसे तुम्हारी उत्पत्ति हुई है, अतः तुम हमारी रक्षा करो। महाशैल ! चूँकि शर्करा कामदेवके धनुषके मध्यभागसे प्रादुर्भूत हुई है और तुम शर्करामय हो, इसलिये संसारसागरसे मुझे बचाओ।’

जो मनुष्य इस विधिके अनुसार शर्कराशैलका दान करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकको प्राप्त हो जाता है। वहाँ वह भगवान् विष्णुकी आज्ञासे अपने आश्रितोंके साथ ही सूर्य, चन्द्र और तारागणोंके समान कान्तिमान् विमानपर आरूढ होकर सुशोभित होता है। पुनः सौ कल्पोंके बाद तीन अयुत जन्मोंतक भूतलपर दीर्घायु और नीरोगतासे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधिपति होता है। सभी पर्वतदानोंमें मत्सररहित होकर अपनी शक्तिके अनुसार भोजन करानेका विधान है। गुरुकी आज्ञासे अपनी शक्तिके अनुकूल स्वयं भी क्षार (नमक)-रहित भोजन करना चाहिये। पुनः पर्वतदानकी सारी सामग्री ब्राह्मणके घर स्वयं भेजवा देनी चाहिये।

राजन् ! अब आप लवणाचल-दानकी महिमामें एक आख्यान सुनें—पहले ब्रह्मकल्पमें धर्ममूर्ति नामक एक राजा हुआ था। उसके तेजके सामने सूर्य और चन्द्रमा आदि भी कान्तिहीन हो जाते थे। वह इन्द्रका मित्र था। उसने हजारों दैत्योंका वध किया था। वह इच्छानुकूल रूप धारण करनेवाला मनुष्य होनेपर भी किसीसे परास्त नहीं हुआ, अपितु उसके द्वारा सैकड़ों शत्रु पराजित हो चुके थे। उसकी पत्नीका नाम भानुमती था। वह त्रिलोकोंमें सर्वश्रेष्ठ सुन्दरी थी। उसने सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीके समान अपने दिव्य रूपसे देवाङ्गनाओंको भी पराजित कर दिया था। वह दस हजार नारियोंके बीचमें लक्ष्मीकी तरह सुशोभित होती थी। राजा धर्ममूर्तिकी वह पटरानी उसे प्राणोंसे भी अधिक प्रिय थी। एक बार सभामण्डपमें पधारे अपने पुरोहित महर्षि वसिष्ठसे उस राजाने विस्मय-विमुग्ध हो ऐसा प्रश्न किया—

‘भगवन् ! किस धर्मके प्रभावसे मुझे सर्वश्रेष्ठ लक्ष्मीकी प्राप्ति हुई है तथा किस धर्मके फलस्वरूप मेरे शरीरमें सदा प्रचुरमात्रामें उत्तम तेज विराजमान रहता है ?’

वसिष्ठजीने कहा—राजन् ! पूर्वकालमें लीलावती नामकी एक वेश्या थी। वह शिवजीकी भक्त थी। उसने चतुर्दशी तिथिके दिन विधिपूर्वक अपने गुरुको स्वर्णमय वृक्ष आदि उपकरणोंसहित लवणाचलका दान किया था। उन दिनों लीलावतीके घर एक शुद्धजातीय शौण्ड नामक सोनार नौकर था। भूपाल ! उसने ही श्रद्धापूर्वक सुवर्णद्वारा वृक्षों और प्रधान देवताओंकी मूर्तियोंका निर्माण किया था। उसने बिना कुछ पारिश्रमिक लिये उन मूर्तियोंको गढ़कर अत्यन्त सुन्दर बनाया था और यह धर्मका कार्य है—ऐसा जानकर किसी भी प्रकारका कुछ वेतन भी उसने नहीं लिया था। पृथ्वीपते ! उस स्वर्णकारकी पत्नीने भी उन सुवर्णनिर्मित देवों एवं वृक्षोंकी मूर्तियोंको रगड़कर चमकीला बनाया था और

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