भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
कोई व्यक्ति सम्पूर्ण लक्षणोंसे हीन होते हुए भी सदाचार-सम्पन्न, श्रद्धालु और अनिन्दक है तो वह अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेता है।
मानवको चाहिये कि ब्राह्म-वेलामें जग जाय और धर्म तथा अर्थके विषयमें विचार करे। कभी भी ब्राह्मण, अग्नि, गौ तथा सूर्यके सम्मुख मल-मूत्रका उत्सर्जन नहीं करना चाहिये। दिनमें उत्तराभिमुख और रात्रिमें दक्षिणाभिमुख होकर मल-मूत्रका विसर्जन करना चाहिये। प्रातःकाल नित्य-क्रियासे निवृत्त हो आचमनके अनन्तर समाहित होकर प्रातः-संध्या करनी चाहिये। इसी प्रकार वाणीपर नियन्त्रण कर मौन होकर सायं-संध्या करे। भगवान् सूर्यको उगते हुए तथा अस्त होते हुए नहीं देखना चाहिये। ऋषियोंने दीर्घकालीन तपस्या आदिसे दीर्घायुको प्राप्त किया। धार्मिक राजाको चाहिये कि जो द्विज प्रातः तथा सायं-संध्या नहीं करता, उसे शुद्ध-कर्ममें नियोजित कर दे। मूत्र-पुरीषमें यदि वेग हो जाय या कोई बाधा उपस्थित हो जाय तो उस समय विधि एवं नियमकी अपेक्षा न करे। पृथ्वीको तुणोंसे तथा सिरको वस्त्रसे आच्छादितकर मल त्याग करना चाहिये। ग्राम, आश्रम, तीर्थ, क्षेत्र, मार्ग, जुते खेत, गोष्ठ और गौओंके मार्ग आदि स्थानोंमें मूत्रादिका परित्याग नहीं करना चाहिये। जलके अंदरकी, आश्रम आदिकी, वल्मीककी, चूहिके बिलकी तथा शौचसे बची—इन पाँच प्रकारकी मिट्टियोंका शौच आदिमें प्रयोग न करे।
देवताओं आदिकी पूजा, गुरुओंका अभिवादन तथा भोजन आदि क्रियाएँ आचमन करनेके अनन्तर करनी चाहिये। फेनरहित, सुगन्धित निर्मल जलसे पूर्व या उत्तराभिमुख हो आचमन करना चाहिये। विद्वानोंको धर्म-अर्थ तथा कामके कार्योंको करना चाहिये। धर्म-अर्थ तथा काम इस त्रिवर्गके सम्पादनसे गृहस्थको ऐहिक और पारलौकिक सिद्धि प्राप्त होती है। बुद्धिमान् व्यक्तिको अपने न्यायोपार्जित
द्रव्यके एक भागसे परलोक-सम्बन्धी पुण्यकर्मोंका सम्पादन करना चाहिये। एक भागका संचय करे और आधे अर्थात् दो भागका भोजन, व्यवहार तथा नित्य-नैमित्तिक कार्योंमें व्यय करे। अतः न्यायपूर्वक धनके उपार्जनके लिये प्रयत्न करना चाहिये, क्योंकि धनके माध्यमसे ही धर्म-काम आदि पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। पूर्वाह्नकालमें ही केशप्रसाधन, आदर्शदर्शन, दन्तधावन तथा देवताओंका पूजन आदि कर लेना चाहिये। मल-मूत्रादि क्रियाएँ घरसे दूर करनी चाहिये तथा घरका जूठन आदि भी दूर फेंकना चाहिये। मिट्टीके ढेलेको तोड़नेवाला, तिनकोंको टुकड़े-टुकड़े करनेवाला, नख काटकर खानेवाला, नित्य उच्छिष्ट भोजन करनेवाला तथा वस्तुओंमें मिलावट करनेवाला इस संसारमें अधिक दिनोंतक नहीं जीता। दूसरेकी स्त्रीको नग्न नहीं देखना चाहिये, अपने पुरीष (मल)-को भी न देखे। रजस्वला स्त्रीको न देखे, न उसका स्पर्श करे और न उससे वार्तालाप करे। जलमें मूत्र-पुरीषका उत्सर्ग तथा मैथुन नहीं करना चाहिये। केश, राख, कपाल, मल-मूत्र, भूसी, अंगार, अस्थिपंजर तथा रस्सी आदिपर न बैठे। विद्वानोंको चाहिये कि ब्राह्मणोंको प्रणाम करें तथा उन्हें बैठनेके लिये आसन प्रदान करें, जाते समय कुछ दूरतक उन्हें पहुँचाने जायँ। टूटे-फूटे आसनपर न बैठे और फूटे हुए काँसेके पात्रोंका उपयोग न करे। बालोंको खोलकर भोजन न करे। नग्न होकर स्नान और शयन न करे। जूठे स्थानपर न बैठे। जूठे हाथसे सिरका स्पर्श न करे, क्योंकि सभी प्राण सिरमें स्थित रहते हैं। सिरके बालोंको न खींचे और न सिरपर प्रहार करे। पुत्र और शिष्यको कोड़े-से नहीं मारना चाहिये। अपने सिरको दोनों हाथोंसे एक साथ नहीं खुजलाना चाहिये। बिना कारण सिरसे स्नान नहीं करना चाहिये। ग्रहणके बिना रात्रि-स्नान नहीं करना चाहिये। भोजनके अनन्तर तथा अथाह जलमें डुबकी लगाकर स्नान नहीं
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