भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 646, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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करना चाहिये। स्नान करनेके बाद तेल नहीं लगाना चाहिये। तिलपिष्ट नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे आयु क्षीण होती है।
अपने गुरुजनों तथा श्रेष्ठजनोंसे बुरी बात न बोले। यदि वे क्रुद्ध दिखायी दें तो उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। दूसरेकी निन्दाजनक बात नहीं सुननी चाहिये और न स्वयं करनी चाहिये। प्रशस्त ओषधियोंका ही सेवन करना चाहिये। रत्नोंको धारण करना चाहिये। अपने केशोंको स्निग्ध और निर्मल रखना चाहिये। सुन्दर शिष्ट वेष धारण करना चाहिये। सफेद, प्रिय लगनेवाले फूलोंको धारण करना चाहिये। दूसरेके किञ्चिन्मात्र धनको न लेना चाहिये और न कभी अप्रिय बोलना चाहिये। सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिये। दूसरेके दोषोंको नहीं कहना चाहिये। किसीसे वैर बाँधना नहीं चाहिये। दुष्ट यानमें न चढ़े। नदीके किनारेकी छाया आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये। विद्वेषी, पतित, उन्मत्त, बहुतोसे वैर करनेवाले, वर्णसंकर, वन्ध्या, वन्ध्याके पति, नीच, असत्य भाषण करनेवाले, अत्यन्त खर्चीले स्वभाववाले, दूसरेकी व्यर्थ निन्दा करनेवाले तथा शठसे विद्वान् व्यक्तिको मैत्री नहीं करनी चाहिये। मार्गमें एकाकी गमन न करे। अतिशय वेगसम्पन्न जलमें स्नान न करे। जलते हुए घरमें प्रवेश न करे। वृक्षके ऊपरतक न चढ़े। शवके प्रति हुंकार न करे। दांतोंको परस्पर रगड़ना नहीं चाहिये। नासिका फुलाना नहीं चाहिये। मुखको अधिक खोलकर नहीं बोलना चाहिये। ऊँचे स्वरमें हँसना नहीं चाहिये और शब्द करते हुए अपान वायुका परित्याग नहीं करना चाहिये। नखसे नख नहीं बजाना चाहिये, न छेदन करना चाहिये और न पृथ्वीपर लिखना ही चाहिये। दाढ़ी-मूँछके बालोंका भक्षण नहीं करना चाहिये, पैरसे पैरका आक्रमण
नहीं करना चाहिये। गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर नहीं बैठना चाहिये। सदा सदाचारतत्पर रहना चाहिये। कामाचारी नहीं होना चाहिये। दोनों लोकोंमें शुभ चाहनेवाला व्यक्ति कामाचारपूर्वक जीवनयापन न करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। रात्रिमें चतुष्पद (चौराहा), श्मशान, ग्रामके समीपवर्ती पीपल आदिके वृक्ष, उपवन तथा दुष्ट स्त्रीके सानिध्यका परित्याग करे। ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुमें छत्र धारण किये रहे। रात्रि और वनमें मौन रहे। केश, अस्थि, कण्टकयुक्त अपवित्र बलिस्थान, भस्म, भूसी तथा स्नानसे भीगी हुई पृथ्वीका दूरसे ही परित्याग करे।
ब्राह्मण, राजा, स्त्री, ज्ञानवान्, गर्भिणी स्त्री, बोझसे दवा हुआ व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति, मूक, अन्धा, बधिर, मतवाला तथा उन्मत्त व्यक्तिको दूरसे ही मार्ग दे देना चाहिये। अन्योंके द्वारा धारण किये गये जूते, वस्त्र तथा माला नहीं धारण करना चाहिये। दूसरेकी स्त्रीके उपसेवनसे बढ़कर लोकमें अनायुष्यका अन्य कोई भी कार्य नहीं है*। स्त्रियोंसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये और स्त्रियोंकी रक्षा करना कर्तव्य समझना चाहिये। ईर्ष्या करनेसे आयुका ह्रास होता है, अतः ईर्ष्याका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, विरूप, अहंकारी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग अथवा विद्यासे हीन व्यक्तिका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। रात्रिमें देही और सत्तूका भक्षण नहीं करना चाहिये। महाराज! आधी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। घुटनोंको ऊपर कर अधिक देरतक नहीं बैठना चाहिये। दूसरेके रहस्यकी बातको जाननेकी उत्सुकता तथा अभिलाषा नहीं रखनी चाहिये। पैरके ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। अतिशय रक्त, चितकबरा तथा कृष्ण वस्त्रको अधिक समयतक नहीं धारण करना चाहिये और वस्त्र या अलंकारका विपर्यय भी नहीं करना
- न हीदृशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते। यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ (उत्तरपर्व २०५।७३)
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