भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
चाहिये। दीर्घायुकी इच्छा है तो स्त्रीको दुर्बल नहीं समझना चाहिये। दूसरेको पीड़ा नहीं देनी चाहिये और परोक्षवादी नहीं होना चाहिये। असहनशील एवं अनम्र भी न हो। अगिनेसे दग्ध अथवा परशुसे काटा गया वन अड्डुरित हो सकता है, किंतु उद्बेलित और अप्रिय वाणी बोलनेपर फिर प्रेमका संचार नहीं हो सकता। मनुष्यको चाहिये कि नास्तिक न बने, वेदों और देवताओंकी निन्दा न करे, किसीके साथ वैर न करे और न कायर ही बने। ब्राह्मणको कुत्सित वाक्य न कहे। नक्षत्रोंको नहीं दिखाना चाहिये। प्राज्ञ व्यक्तिको न्यायके अनुसार कार्य करनेवाले बलवान् शत्रुजयी राजाके यहाँ सुखपूर्वक निवास करना चाहिये। जहाँपर स्त्रियाँ मात्सर्यरहित हों, वहाँपर रहना सुखप्रद होता है। जिस राष्ट्रमें किसान कृषि-कार्यमें लगे हों, अतिशय बोलनेवाले न हों और जहाँ सभी ओषधियाँ प्राप्त हों, विद्वान् व्यक्तिको वहीं रहना चाहिये। जहाँपर लोग दूसरेको पराभूत करनेवाले और वैरकी गॉठ रखनेवाले हों, जनशून्य अथवा अधिक लोग बसते हों तथा जहाँ उत्सव आदि न होते हों—इन स्थानोंपर निवास न करे। राजन्! जहाँ ऋणदाता, वैद्य, श्रोत्रिय तथा जलपूर्ण नदी—ये चारों न हों वहाँ निवास नहीं करना चाहिये। मलिन दर्पण नहीं देखना चाहिये। महाराज! दीर्घ राज्यकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको स्वर्णकारके घरका अन्न नहीं खाना चाहिये, उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये और न उसे मित्र ही बनाना चाहिये। फूटा-टूटा बर्तन, टूटी खाट, कुत्ता तथा मुर्गा—ये चार और कटिदार वृक्ष इन्हें अपने दरवाजेपर न रखे। फूटा पात्र घरमें होनेसे कलह होता है, टूटी खाट रहनेसे भी अच्छा नहीं होता, श्वान और कुककुटवाले घरमें पितर भोजन नहीं करते और कंटकयुक्त वृक्षोंके नीचे पिशाचोंका निवास रहता है। गृहस्थ व्यक्तिको चाहिये कि सुवासिनी, गर्भवती, वृद्धा स्त्री, बालकों
तथा आतुर व्यक्तिको भोजन पहले कराये। घरके स्वामीको अन्तमें भोजन करना चाहिये। असंस्कृत अन्नका भोजन नहीं करना चाहिये। जो गौका वाहन आदिके रूपमें प्रयोग कर उससे धनार्जन करता है और फिर उस धनका उपयोग करता है, घरके बाहर उपस्थित व्यक्तिको बिना दिये हुए खाता है, वह मानो पापका ही भक्षण करता है। बलिर्वैश्वदेव कर्म करनेके बाद ही विधिपूर्वक भोजन करना चाहिये। एक वस्त्र पहनकर भोजन न करे। पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करना चाहिये। असंस्कृत तथा कुत्सित अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। शिष्ट व्यक्ति तथा भूखेको भोजन करानेके बाद पवित्र पात्रोंमें क्रोधरहित (शान्त, प्रसन्नचित्त) होकर भोजन करना चाहिये। तख्तेपर रखे पात्रमें, अनुचित स्थानमें, असमयमें, अतिशय संकीर्ण स्थानमें भोजन नहीं करना चाहिये। भोजनसे पूर्व अग्राशन देकर तन्मय होकर भोजन करना चाहिये। पहले मधुर पदार्थोंको, अनन्तर लवण पदार्थ और इसके बाद कटु एवं तीक्ष्ण पदार्थोंका भोजन करे। पहले कोमल पदार्थों, बीचमें गरिष्ठ व्यञ्जनों तथा अन्तमें द्रवयुक्त व्यञ्जनोंका भोजन करनेसे मनुष्य रोगमुक्त रहते हैं। दिनमें भूजेमें, रात्रिमें दही-सत्तूमें तथा कोविदार (कचनार)-में अलक्ष्मी—दरिद्राका सदा ही निवास रहता है। वाणीका संयम कर मौन होकर अन्नकी निन्दा किये बिना प्रशस्त अन्न खाना चाहिये। पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो भोजन करनेके बाद भलीभाँति आचमनकर पुनः हाथका प्रक्षालन करके सावधानीसे आचमन करे और इसके बाद अपने अभीष्ट देवताका स्मरण करना चाहिये। अनन्तर इन श्लोकोंका पाठ करते हुए अपने हाथसे उदरको धीरे-धीरे सहलाये—
प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा । अन्नं पुष्टिकरं चास्तु ममाद्याव्याहतं सुखम्॥
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