भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 648, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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अगस्तिरगिनिर्वडवानलश्च भुक्तं प्रपन्नं जरयत्वशेषम् । सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं यच्छत्वरोगं खलु वासुदेवः ॥ (उत्तरपर्व २०५।११५-११६)
‘प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान—इन पञ्चप्राणोंको पुष्टि प्रदान करनेवाला मेरे द्वारा खाया गया अन्न मेरे लिये सुखप्रद हो। अगस्त्य, अग्नि, वडवानल मेरे द्वारा भुक्त हुए अन्न और पेय पदार्थोंको भलीभाँति पचायें तथा मुझे सुखकी प्राप्ति हो और वासुदेव मुझे रोगहीन बनायें।’
इसके बाद आलस्यरहित होकर अनायास होनेवाले कर्मोंको करे। भारत! संध्याके समय यदि कोई पथिक आ जाय तो उसका पाद्य, आसन आदिके द्वारा स्वागत करे। अनन्तर अन्न-प्रदान एवं शयनके द्वारा उसकी सेवा करे। दिनमें आये अतिथिके विमुख हो जानेपर जो पाप लगता है, उसका आठ गुना पाप सायंकालमें आये अतिथिके लौट जानेपर होता है। पूर्व और दक्षिणमें सिर कर शयन करना प्रशस्त माना गया है और इसके विपरीत सोनेसे रोग उत्पन्न होता है। ऋतुकालमें ही स्त्री-सहवास प्रशस्त माना गया है। चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या एवं पर्वके समयमें तैलाभ्यङ्ग तथा स्त्री-सम्पर्क न करे। क्षौर-कर्म, स्त्री-सहवास तथा श्मशानगमनके अनन्तर सवस्त्र स्नान करना चाहिये। गुरु, पतिव्रता, यज्ञकर्ता एवं तपस्वीकी मनोविनोदमें भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्ति को एक ही साथ अग्नि और जलको धारण नहीं करना चाहिये। गुरु और देवताकी ओर पैर नहीं फैलाना चाहिये। जलको अञ्जलिसे नहीं पीना चाहिये और अधिक वायु तथा धूपका भी सेवन नहीं करना चाहिये। दास-नौकर आदिको क्रुद्ध होकर अपशब्द न कहे। सभी बन्धुओंके प्रति मात्सर्यरहित होकर रहना चाहिये। डरे हुए व्यक्ति को आश्वासन देना चाहिये, साधुवत् रहना चाहिये। ये बातें व्यक्ति को स्वर्गरूपी
फल प्रदान करती हैं। पृथ्वीपर देखते हुए चलना चाहिये। बचे हुए जीवनमें जो अपनी आत्माको वशीभूत कर जीवन-यापन करता है, उसके धर्म, अर्थ तथा कामकी थोड़ी भी हानि नहीं होती। आक्रोश, विवाद और पिशुनता छोड़ देनी चाहिये।
सोनेके समय दूसरा वस्त्र, पूजाके समयमें दूसरा और सभामें दूसरा वस्त्र पहनना चाहिये अर्थात् अलग-अलग वस्त्र धारण करना चाहिये। पतितोंके साथ बातचीत न करे अन्यथा वह भी पतित हो जाता है। वृद्ध, ज्ञाति-बन्धु तथा मित्रके दरिद्र हो जानेपर उसको अपने साथ रखना चाहिये। इनके रहनेसे घरकी वृद्धि होती है। कबूतर, शुक्र तथा मैनाको घरमें रखना अच्छा होता है। ये तथा तिलपापन करनेवाले पापरहित होते हैं। चन्दन, वीणा, दर्पण, घी, शहद, जल तथा अग्नि इन्हें घरमें निरन्तर रखना चाहिये। राजाको चाहिये कि धनुर्वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानार्जनमें सदा तत्पर रहे एवं उसे शब्दशास्त्र (व्याकरण), यज्ञशास्त्र (कर्मकाण्ड), गान्धर्वशास्त्र (संगीत), कलाशास्त्र और इतिहास-पुराण आदिका भी ज्ञान रखना चाहिये।
राजन्! मैंने ये सब सदाचारके लक्षण बतलाये। अन्य जाननेयोग्य बातोंको वृद्धोंसे जानना चाहिये। सदाचार ही सभी ऐश्वर्यका जनक है। इसके पालनसे आयुकी वृद्धि होती है। यह सभी दोषोंको दूर कर देता है। सभी आगमोंमें सदाचारको ही प्रथम स्थान प्राप्त है। सदाचारसे ज्ञानकी वृद्धि होती है। आचार परम धर्म है। आचारसे ऐश्वर्य, यश, आयु, स्वर्ग और परम मङ्गल प्राप्त होता है। महाराज! सभी वर्णोंके कल्याणकी दृष्टिसे इन सबका मैंने वर्णन किया है। अतः धर्म, अर्थ, कामरूपी फलको देनेवाले सदाचारका सावधानीके साथ सदा पालन करना चाहिये। (अध्याय २०५)
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