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भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ
  • उत्तरपर्व *

६३५

करना चाहिये। स्नान करनेके बाद तेल नहीं लगाना चाहिये। तिलपिष्ट नहीं खाना चाहिये, क्योंकि इससे आयु क्षीण होती है।

अपने गुरुजनों तथा श्रेष्ठजनोंसे बुरी बात न बोले। यदि वे क्रुद्ध दिखायी दें तो उन्हें प्रसन्न करना चाहिये। दूसरेकी निन्दाजनक बात नहीं सुननी चाहिये और न स्वयं करनी चाहिये। प्रशस्त ओषधियोंका ही सेवन करना चाहिये। रत्नोंको धारण करना चाहिये। अपने केशोंको स्निग्ध और निर्मल रखना चाहिये। सुन्दर शिष्ट वेष धारण करना चाहिये। सफेद, प्रिय लगनेवाले फूलोंको धारण करना चाहिये। दूसरेके किञ्चिन्मात्र धनको न लेना चाहिये और न कभी अप्रिय बोलना चाहिये। सत्य और प्रिय वाणी बोलनी चाहिये। दूसरेके दोषोंको नहीं कहना चाहिये। किसीसे वैर बाँधना नहीं चाहिये। दुष्ट यानमें न चढ़े। नदीके किनारेकी छाया आदिका आश्रय नहीं लेना चाहिये। विद्वेषी, पतित, उन्मत्त, बहुतोसे वैर करनेवाले, वर्णसंकर, वन्ध्या, वन्ध्याके पति, नीच, असत्य भाषण करनेवाले, अत्यन्त खर्चीले स्वभाववाले, दूसरेकी व्यर्थ निन्दा करनेवाले तथा शठसे विद्वान् व्यक्तिको मैत्री नहीं करनी चाहिये। मार्गमें एकाकी गमन न करे। अतिशय वेगसम्पन्न जलमें स्नान न करे। जलते हुए घरमें प्रवेश न करे। वृक्षके ऊपरतक न चढ़े। शवके प्रति हुंकार न करे। दांतोंको परस्पर रगड़ना नहीं चाहिये। नासिका फुलाना नहीं चाहिये। मुखको अधिक खोलकर नहीं बोलना चाहिये। ऊँचे स्वरमें हँसना नहीं चाहिये और शब्द करते हुए अपान वायुका परित्याग नहीं करना चाहिये। नखसे नख नहीं बजाना चाहिये, न छेदन करना चाहिये और न पृथ्वीपर लिखना ही चाहिये। दाढ़ी-मूँछके बालोंका भक्षण नहीं करना चाहिये, पैरसे पैरका आक्रमण

नहीं करना चाहिये। गुरुके सम्मुख उच्च आसनपर नहीं बैठना चाहिये। सदा सदाचारतत्पर रहना चाहिये। कामाचारी नहीं होना चाहिये। दोनों लोकोंमें शुभ चाहनेवाला व्यक्ति कामाचारपूर्वक जीवनयापन न करनेसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। रात्रिमें चतुष्पद (चौराहा), श्मशान, ग्रामके समीपवर्ती पीपल आदिके वृक्ष, उपवन तथा दुष्ट स्त्रीके सानिध्यका परित्याग करे। ग्रीष्म और वर्षा-ऋतुमें छत्र धारण किये रहे। रात्रि और वनमें मौन रहे। केश, अस्थि, कण्टकयुक्त अपवित्र बलिस्थान, भस्म, भूसी तथा स्नानसे भीगी हुई पृथ्वीका दूरसे ही परित्याग करे।

ब्राह्मण, राजा, स्त्री, ज्ञानवान्, गर्भिणी स्त्री, बोझसे दवा हुआ व्यक्ति, श्रेष्ठ व्यक्ति, मूक, अन्धा, बधिर, मतवाला तथा उन्मत्त व्यक्तिको दूरसे ही मार्ग दे देना चाहिये। अन्योंके द्वारा धारण किये गये जूते, वस्त्र तथा माला नहीं धारण करना चाहिये। दूसरेकी स्त्रीके उपसेवनसे बढ़कर लोकमें अनायुष्यका अन्य कोई भी कार्य नहीं है*। स्त्रियोंसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिये और स्त्रियोंकी रक्षा करना कर्तव्य समझना चाहिये। ईर्ष्या करनेसे आयुका ह्रास होता है, अतः ईर्ष्याका सर्वथा परित्याग कर देना चाहिये। मूर्ख, उन्मत्त, व्यसनी, विरूप, अहंकारी, हीनाङ्ग, अधिकाङ्ग अथवा विद्यासे हीन व्यक्तिका तिरस्कार नहीं करना चाहिये। रात्रिमें देही और सत्तूका भक्षण नहीं करना चाहिये। महाराज! आधी रातमें भोजन नहीं करना चाहिये। घुटनोंको ऊपर कर अधिक देरतक नहीं बैठना चाहिये। दूसरेके रहस्यकी बातको जाननेकी उत्सुकता तथा अभिलाषा नहीं रखनी चाहिये। पैरके ऊपर पैर रखकर नहीं बैठना चाहिये। अतिशय रक्त, चितकबरा तथा कृष्ण वस्त्रको अधिक समयतक नहीं धारण करना चाहिये और वस्त्र या अलंकारका विपर्यय भी नहीं करना

  • न हीदृशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते। यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम् ॥ (उत्तरपर्व २०५।७३)

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६३६

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

चाहिये। दीर्घायुकी इच्छा है तो स्त्रीको दुर्बल नहीं समझना चाहिये। दूसरेको पीड़ा नहीं देनी चाहिये और परोक्षवादी नहीं होना चाहिये। असहनशील एवं अनम्र भी न हो। अगिनेसे दग्ध अथवा परशुसे काटा गया वन अड्डुरित हो सकता है, किंतु उद्बेलित और अप्रिय वाणी बोलनेपर फिर प्रेमका संचार नहीं हो सकता। मनुष्यको चाहिये कि नास्तिक न बने, वेदों और देवताओंकी निन्दा न करे, किसीके साथ वैर न करे और न कायर ही बने। ब्राह्मणको कुत्सित वाक्य न कहे। नक्षत्रोंको नहीं दिखाना चाहिये। प्राज्ञ व्यक्तिको न्यायके अनुसार कार्य करनेवाले बलवान् शत्रुजयी राजाके यहाँ सुखपूर्वक निवास करना चाहिये। जहाँपर स्त्रियाँ मात्सर्यरहित हों, वहाँपर रहना सुखप्रद होता है। जिस राष्ट्रमें किसान कृषि-कार्यमें लगे हों, अतिशय बोलनेवाले न हों और जहाँ सभी ओषधियाँ प्राप्त हों, विद्वान् व्यक्तिको वहीं रहना चाहिये। जहाँपर लोग दूसरेको पराभूत करनेवाले और वैरकी गॉठ रखनेवाले हों, जनशून्य अथवा अधिक लोग बसते हों तथा जहाँ उत्सव आदि न होते हों—इन स्थानोंपर निवास न करे। राजन्! जहाँ ऋणदाता, वैद्य, श्रोत्रिय तथा जलपूर्ण नदी—ये चारों न हों वहाँ निवास नहीं करना चाहिये। मलिन दर्पण नहीं देखना चाहिये। महाराज! दीर्घ राज्यकी इच्छा रखनेवाले व्यक्तिको स्वर्णकारके घरका अन्न नहीं खाना चाहिये, उसपर विश्वास नहीं करना चाहिये और न उसे मित्र ही बनाना चाहिये। फूटा-टूटा बर्तन, टूटी खाट, कुत्ता तथा मुर्गा—ये चार और कटिदार वृक्ष इन्हें अपने दरवाजेपर न रखे। फूटा पात्र घरमें होनेसे कलह होता है, टूटी खाट रहनेसे भी अच्छा नहीं होता, श्वान और कुककुटवाले घरमें पितर भोजन नहीं करते और कंटकयुक्त वृक्षोंके नीचे पिशाचोंका निवास रहता है। गृहस्थ व्यक्तिको चाहिये कि सुवासिनी, गर्भवती, वृद्धा स्त्री, बालकों

तथा आतुर व्यक्तिको भोजन पहले कराये। घरके स्वामीको अन्तमें भोजन करना चाहिये। असंस्कृत अन्नका भोजन नहीं करना चाहिये। जो गौका वाहन आदिके रूपमें प्रयोग कर उससे धनार्जन करता है और फिर उस धनका उपयोग करता है, घरके बाहर उपस्थित व्यक्तिको बिना दिये हुए खाता है, वह मानो पापका ही भक्षण करता है। बलिर्वैश्वदेव कर्म करनेके बाद ही विधिपूर्वक भोजन करना चाहिये। एक वस्त्र पहनकर भोजन न करे। पूर्वाभिमुख अथवा उत्तराभिमुख होकर प्रसन्नतापूर्वक भोजन करना चाहिये। असंस्कृत तथा कुत्सित अन्न ग्रहण नहीं करना चाहिये। शिष्ट व्यक्ति तथा भूखेको भोजन करानेके बाद पवित्र पात्रोंमें क्रोधरहित (शान्त, प्रसन्नचित्त) होकर भोजन करना चाहिये। तख्तेपर रखे पात्रमें, अनुचित स्थानमें, असमयमें, अतिशय संकीर्ण स्थानमें भोजन नहीं करना चाहिये। भोजनसे पूर्व अग्राशन देकर तन्मय होकर भोजन करना चाहिये। पहले मधुर पदार्थोंको, अनन्तर लवण पदार्थ और इसके बाद कटु एवं तीक्ष्ण पदार्थोंका भोजन करे। पहले कोमल पदार्थों, बीचमें गरिष्ठ व्यञ्जनों तथा अन्तमें द्रवयुक्त व्यञ्जनोंका भोजन करनेसे मनुष्य रोगमुक्त रहते हैं। दिनमें भूजेमें, रात्रिमें दही-सत्तूमें तथा कोविदार (कचनार)-में अलक्ष्मी—दरिद्राका सदा ही निवास रहता है। वाणीका संयम कर मौन होकर अन्नकी निन्दा किये बिना प्रशस्त अन्न खाना चाहिये। पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख हो भोजन करनेके बाद भलीभाँति आचमनकर पुनः हाथका प्रक्षालन करके सावधानीसे आचमन करे और इसके बाद अपने अभीष्ट देवताका स्मरण करना चाहिये। अनन्तर इन श्लोकोंका पाठ करते हुए अपने हाथसे उदरको धीरे-धीरे सहलाये—

प्राणापानसमानानामुदानव्यानयोस्तथा । अन्नं पुष्टिकरं चास्तु ममाद्याव्याहतं सुखम्॥

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  • उत्तरपर्व *

६३७

अगस्तिरगिनिर्वडवानलश्च भुक्तं प्रपन्नं जरयत्वशेषम् । सुखं च मे तत्परिणामसम्भवं यच्छत्वरोगं खलु वासुदेवः ॥ (उत्तरपर्व २०५।११५-११६)

‘प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान—इन पञ्चप्राणोंको पुष्टि प्रदान करनेवाला मेरे द्वारा खाया गया अन्न मेरे लिये सुखप्रद हो। अगस्त्य, अग्नि, वडवानल मेरे द्वारा भुक्त हुए अन्न और पेय पदार्थोंको भलीभाँति पचायें तथा मुझे सुखकी प्राप्ति हो और वासुदेव मुझे रोगहीन बनायें।’

इसके बाद आलस्यरहित होकर अनायास होनेवाले कर्मोंको करे। भारत! संध्याके समय यदि कोई पथिक आ जाय तो उसका पाद्य, आसन आदिके द्वारा स्वागत करे। अनन्तर अन्न-प्रदान एवं शयनके द्वारा उसकी सेवा करे। दिनमें आये अतिथिके विमुख हो जानेपर जो पाप लगता है, उसका आठ गुना पाप सायंकालमें आये अतिथिके लौट जानेपर होता है। पूर्व और दक्षिणमें सिर कर शयन करना प्रशस्त माना गया है और इसके विपरीत सोनेसे रोग उत्पन्न होता है। ऋतुकालमें ही स्त्री-सहवास प्रशस्त माना गया है। चतुर्दशी, अष्टमी, अमावास्या एवं पर्वके समयमें तैलाभ्यङ्ग तथा स्त्री-सम्पर्क न करे। क्षौर-कर्म, स्त्री-सहवास तथा श्मशानगमनके अनन्तर सवस्त्र स्नान करना चाहिये। गुरु, पतिव्रता, यज्ञकर्ता एवं तपस्वीकी मनोविनोदमें भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। विद्वान् व्यक्ति को एक ही साथ अग्नि और जलको धारण नहीं करना चाहिये। गुरु और देवताकी ओर पैर नहीं फैलाना चाहिये। जलको अञ्जलिसे नहीं पीना चाहिये और अधिक वायु तथा धूपका भी सेवन नहीं करना चाहिये। दास-नौकर आदिको क्रुद्ध होकर अपशब्द न कहे। सभी बन्धुओंके प्रति मात्सर्यरहित होकर रहना चाहिये। डरे हुए व्यक्ति को आश्वासन देना चाहिये, साधुवत् रहना चाहिये। ये बातें व्यक्ति को स्वर्गरूपी

फल प्रदान करती हैं। पृथ्वीपर देखते हुए चलना चाहिये। बचे हुए जीवनमें जो अपनी आत्माको वशीभूत कर जीवन-यापन करता है, उसके धर्म, अर्थ तथा कामकी थोड़ी भी हानि नहीं होती। आक्रोश, विवाद और पिशुनता छोड़ देनी चाहिये।

सोनेके समय दूसरा वस्त्र, पूजाके समयमें दूसरा और सभामें दूसरा वस्त्र पहनना चाहिये अर्थात् अलग-अलग वस्त्र धारण करना चाहिये। पतितोंके साथ बातचीत न करे अन्यथा वह भी पतित हो जाता है। वृद्ध, ज्ञाति-बन्धु तथा मित्रके दरिद्र हो जानेपर उसको अपने साथ रखना चाहिये। इनके रहनेसे घरकी वृद्धि होती है। कबूतर, शुक्र तथा मैनाको घरमें रखना अच्छा होता है। ये तथा तिलपापन करनेवाले पापरहित होते हैं। चन्दन, वीणा, दर्पण, घी, शहद, जल तथा अग्नि इन्हें घरमें निरन्तर रखना चाहिये। राजाको चाहिये कि धनुर्वेदादि शास्त्रोंके ज्ञानमें तथा नीतिशास्त्रके ज्ञानार्जनमें सदा तत्पर रहे एवं उसे शब्दशास्त्र (व्याकरण), यज्ञशास्त्र (कर्मकाण्ड), गान्धर्वशास्त्र (संगीत), कलाशास्त्र और इतिहास-पुराण आदिका भी ज्ञान रखना चाहिये।

राजन्! मैंने ये सब सदाचारके लक्षण बतलाये। अन्य जाननेयोग्य बातोंको वृद्धोंसे जानना चाहिये। सदाचार ही सभी ऐश्वर्यका जनक है। इसके पालनसे आयुकी वृद्धि होती है। यह सभी दोषोंको दूर कर देता है। सभी आगमोंमें सदाचारको ही प्रथम स्थान प्राप्त है। सदाचारसे ज्ञानकी वृद्धि होती है। आचार परम धर्म है। आचारसे ऐश्वर्य, यश, आयु, स्वर्ग और परम मङ्गल प्राप्त होता है। महाराज! सभी वर्णोंके कल्याणकी दृष्टिसे इन सबका मैंने वर्णन किया है। अतः धर्म, अर्थ, कामरूपी फलको देनेवाले सदाचारका सावधानीके साथ सदा पालन करना चाहिये। (अध्याय २०५)

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६३८

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

रोहिणीचन्द्रशयन-व्रत

महाराज युधिष्ठिरने पूछा— भगवन्! जिस व्रतका अनुष्ठान करनेसे मनुष्य प्रत्येक जन्ममें दीर्घायु, नीरोगता, कुलीनता और अभ्युदयसे युक्त हो, राजाके कुलमें जन्म पाता है, उस व्रतका सम्यक् प्रकारसे वर्णन कीजिये।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले— राजन्! आपने बड़ी उत्तम बात पूछी है। अब मैं अक्षय स्वर्ग-प्राप्तिकारक परम गोपनीय रोहिणीचन्द्रशयन नामक व्रतका वर्णन कर रहा हूँ। इसमें चन्द्रमाके नामोंसे भगवान् नारायणकी प्रतिमाका पूजन करना चाहिये। जब कभी सोमवारके दिन पूर्णिमा तिथि हो अथवा पूर्णिमाको रोहिणी नक्षत्र हो, उस दिन मनुष्य प्रातः पञ्चगव्य और सरसोंके दानोंसे युक्त जलसे स्नान करे तथा विद्वान् पुरुष 'आप्यायस्वः' (यजु० १२।११२, ११४) इत्यादि मन्त्रको एक सौ आठ बार जपे। यदि शूद्र भी इस व्रतको करे तो अत्यन्त भक्तिपूर्वक 'सोमाय नमः', 'वरदाय नमः', 'विष्णवे नमः'—इन मन्त्रोंका जप करे और पाखण्डियों—विधर्मियोंसे बातचीत न करे। जप करनेके पश्चात् अपने घर आकर फल-फूल आदिके द्वारा भगवान् श्रीमधुसूदनके अङ्गोंकी पूजा करे। साथ ही चन्द्रमाके नामोंका उच्चारण करता रहे। सुगन्धित पुष्प, नैवेद्य और धूप आदिके द्वारा इन्दुपत्नी रोहिणीदेवीका भी पूजन करे।

इसके बाद रात्रिके समय भूमिपर शयन करे और सबेर उठकर स्नानके पश्चात् 'पापविनाशाय नमः' का उच्चारण करके ब्राह्मणको घृत और सुवर्णसहित जलसे भरा कलश दान करे। फिर दिनभर उपवास करनेके पश्चात् गोमूत्र पीकर मांसवर्जित एवं खारे नमकसे रहित अन्नके अट्टाईस ग्रास, दूध और घीके साथ भोजन करे। तदनन्तर दो घड़ीतक इतिहास-पुराण आदिका श्रवण करे। राजन्! चन्द्रस्वरूप भगवान् विष्णुको कदम्ब, नील कमल, केवड़ा, जातीपुष्प, कमल,

शतपत्रिका, बिना कुम्हलाये कुब्जके फूल, सिन्दुवार, चमेली, अन्यान्य श्वेत पुष्प, करवीर-पुष्प तथा चम्पा—ये फूल चढ़ाने चाहिये। उपर्युक्त फूलोंकी जातियोंमेंसे एक-एकको श्रावण आदि महीनोंमें क्रमशः अर्पण करे। जिस महीनेमें व्रत प्रारम्भ किया जाय, उस समय जो भी पुष्प सुलभ हों, उन्हींके द्वारा श्रीहरिका पूजन करना चाहिये।

इस प्रकार एक वर्षतक इस व्रतका विधिवत् अनुष्ठान करके समाप्तिके समय व्रतीको चाहिये कि वह दर्पण तथा शयनोपयोगी सामग्रियोंके साथ शय्यादान करे। रोहिणी और चन्द्रमा—दोनोंकी सुवर्णमयी मूर्ति बनवाये। उनमें चन्द्रमा छः अङ्गुलके और रोहिणी चार अङ्गुलकी होनी चाहिये। आठ मोतियोंसे युक्त तथा दो श्वेत वस्त्रोंसे आच्छादित उन प्रतिमाओंको अक्षतसे भरे हुए काँसेके पात्रमें रखकर दुग्धपूर्ण कलशके ऊपर स्थापित कर दे तथा पूर्वोह्नके समय अगहनी चावल, ईख और फलके साथ उसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक दान कर दे। फिर जिसका मुख (शृशुन) सुवर्णसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये हों, ऐसी वस्त्र और दोहिनीके साथ दूध देनेवाली श्वेत रंगकी गौ तथा सुन्दर शङ्ख प्रस्तुत करे। फिर उत्तम गुणोंसे युक्त ब्राह्मण-दम्पतिको बुलाकर उन्हें आभूषणोंसे अलंकृत करे तथा मनमें यह भावना रखे कि ब्राह्मण-दम्पतिके रूपमें ये रोहिणीसहित चन्द्रमा ही विराजमान हैं। तत्पश्चात् इनकी इस प्रकार प्रार्थना करे— 'श्रीकृष्ण! जिस प्रकार रोहिणीदेवी चन्द्रस्वरूप आपकी शय्याको छोड़कर अन्यत्र नहीं जाती हैं, उसी तरह मेरा भी इन विभूतियोंसे कभी बिछोह न हो। चन्द्रदेव! आप ही सबको परम आनन्द और मुक्ति प्रदान करनेवाले हैं। आपकी कृपासे मुझे भोग और मोक्ष—दोनों प्राप्त हों तथा आपमें मेरी सदा अनन्य भक्ति बनी रहे।' इस प्रकार विनय कर शय्या, प्रतिमा तथा धेनु आदि सब कुछ ब्राह्मणको दान कर दे।

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  • उत्तरपर्व *

६३९

राजन्! जो संसारसे भयभीत होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसके लिये यही व्रत सर्वोत्तम है। यह रूप, आरोग्य और आयु प्रदान करनेवाला है तथा यह पितरोंको सर्वदा प्रिय है। जो पुरुष इसका अनुष्ठान करता है, वह त्रिभुवनका अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। जो स्त्री इस रोहिणीचन्द्रशयन नामक

व्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी उसी पूर्वोक्त फलको प्राप्त करती है। साथ ही वह आवागमनसे मुक्त हो जाती है। चन्द्रमाके नाम-कीर्तनद्वारा भगवान् श्रीमधसूदनकी पूजाका यह प्रसङ्ग जो नित्य पढ़ता अथवा सुनता है, उसे भगवान् उत्तम बुद्धि प्रदान करते हैं तथा वह भगवान् श्रीविष्णुके धाममें जाकर देवसमूहके द्वारा पूजित होता है। (अध्याय २०६)

श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवादका उपसंहार और भगवान्का द्वारकागमन

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! व्रत, दान और धर्मके विषयमें मैंने आपको बतलाया। चूँकि इस सम्पूर्ण संसारका मूल धर्म ही है, इसलिये आप भी धर्मपरायण हो जायें। पार्थ! जानते हुए भी मैंने काम और अर्थका प्रकाश नहीं किया, क्योंकि इसमें तो सभी लोग स्वतः प्रवृत्त होते रहते हैं, अतः इसके वर्णनकी क्या आवश्यकता। पाण्डुनन्दन! इस भविष्योत्तरमें मैंने सदाचारसम्पन्न पुरुषोंके व्रत एवं दानसमूहोंका वर्णन किया। मैंने जो इतिहास और पुराणोंमें देखा और जो वेद-वेदाङ्गसे सम्बद्ध हैं, उन सभी विषयोंको यहाँ प्रदर्शित किया। राजन्! लोक-वेदविरुद्ध विषयोंमें आस्था नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह प्रलापमात्र ही है। आपसे विशेष स्नेह होनेके कारण मैंने यह सब वर्णन किया। पार्थ! दाम्भिक और शठके सम्मुख इन विषयोंको प्रकट नहीं करना चाहिये। नास्तिक, अश्रद्धालु और कुतर्कियोंसे इसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। सदाचारी, जितेन्द्रिय, सत्य और पवित्रतामें रत व्यक्तियोंके सामने इसके व्याख्यानसे सुगति प्राप्त होती है। पार्थ! आप स्वयं साक्षात् धर्मस्वरूप और धर्म एवं अर्थके तत्त्वके मर्मज्ञ तथा भूत-

भविष्यके ज्ञाता हैं। आपने इसे जाननेकी इच्छा प्रकट की, अतः मैंने आपके सम्मुख धर्मके रहस्यको प्रकाशित किया। मनुष्योंको इन विषयोंपर श्रद्धा-विश्वास रखना चाहिये। अब मैं द्वारकाके लिये प्रस्थान कर रहा हूँ, पुनः आपके महोत्सव और यज्ञके अवसरपर उपस्थित रहूँगा। सब कुछ कालके अधीन है, अतः किसी तरहका संताप नहीं करना चाहिये। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्नचित्त होकर पाण्डवोंद्वारा अर्चित—सम्मानित हुए, फिर सभी मित्रों और बन्धुजनोंकी सम्मति प्राप्तकर भगवान् श्रीकृष्णने ब्राह्मणोंको प्रणामकर द्वारकाकी ओर प्रस्थान किया।

सुमन्तुमुनि बोले—महाराज शतानीक! याज्ञवल्क्यमुनिने भगवान् वसिष्ठसे जिस विषयको पूछा था और उन्होंने जो उत्तर दिया तथा भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको जो कहा गया, उस विषयको मुनिश्रेष्ठ व्यासने पूर्वमें ही रच रखा था, उसी विषयका मैंने आपसे प्रतिपादन किया। पराशरके पुत्र तथा सत्यवतीके हृदयको आनन्द देनेवाले उन व्यासदेवकी जय हो। जिनके मुखकमलसे निःसृत हुई वाणीरूपी पवित्र मधुधाराका संसार पान करता है*। (अध्याय २०७)

  • जयति पराशरसुतः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः । यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मधुपुष्पं जगत् पिबति ॥ (उत्तरपर्व २०७ । १५)

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६४०

  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

भविष्योत्तरपर्वकी संक्षिप्त अनुक्रमणिका

इस पर्वके प्रारम्भमें महाराज युधिष्ठिरके पास महर्षि वेदव्यासके साथ अनेक ऋषियोंके आगमन, ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति, नारदको वैष्णवीमायाका दर्शन, संसारके दोषोंका वर्णन, पापोंके भेद, शुभ और अशुभ लक्षणोंका वर्णन है। शकटव्रत, तिलकव्रत, अशोक और करवीर, कोकिला, बृहत्तप, भद्रोपवास, यमद्वितीया, अशून्यशयन, कामाख्यातृतीया, मेघपाली, पञ्चाग्निसाधन, त्रिरात्रगोष्पद, हरकाली, ललिता-तृतीया, योगाख्यातृतीया, उमामहेश्वरव्रत, रम्भा-तृतीया, सौभाग्यतृतीया, आर्द्रानन्दकरीतृतीया तथा चैत्र, भाद्र और माघके तृतीयाव्रतोंका वर्णन हुआ है। फिर आनन्तर्यतृतीया, विनायक-शान्ति, सारस्वतव्रत, नागपञ्चमी, श्रीपञ्चमी, शोकप्रणाशिनीषष्ठी, फलषष्ठी, मन्दारषष्ठी, ललिताषष्ठी, कार्तिकेयषष्ठी, महत्तपससमी, विभूषाससमी, आदित्यमण्डपविधि, त्रयोदशवर्ज्यससमी, कृकवाकुप्लवङ्गससमी, उभयससमी, कल्याणससमी, शर्कराससमी, कमलाससमी, शुभाससमी, स्नपनससमी, व्रतससमी और अचलाससमी, बुधाष्टमी, जन्माष्टमी, दूर्वाष्टमी, कृष्णाष्टमी, अनघाष्टमी, अर्काष्टमी व्रतोंका वर्णन है। तदनन्तर श्रीवृक्षनवमी, ध्वजनवमी, उल्कानवमी, दशावतार, आशादशमी, रोहिणीचन्द्र, इन्द्रहरि-शम्भु-ब्रह्मा-सूर्य-अवियोगव्रत, गोवत्सद्व्रादशी, नीराजनद्व्रादशी, भीष्मपञ्चक, मल्लद्व्रादशी, भीमाद्व्रादशी, श्रवणद्व्रादशी, सम्प्रासिद्धादशी, गोविन्दद्व्रादशी, अखण्डद्व्रादशी, तिलद्व्रादशी,

सुकृतद्व्रादशी, धरणीव्रत, विशोकद्व्रादशी, विभूतिद्व्रादशी, पुष्यद्व्रादशी, श्रवणद्व्रादशी, अनङ्गद्व्रादशी, अङ्गुपादव्रत, निम्बार्क-करवीर-माहात्म्य, यमदर्शनत्रयोदशी, अनङ्गत्रयोदशी, पालीव्रत, रम्भाव्रत, आग्रेयी चतुर्दशी, अनन्तचतुर्दशी, श्रावणी, नक्तचतुर्दशी, शिवचतुर्दशी, फलत्यागचतुर्दशीव्रत तथा वैशाख, कार्तिक और माघकी पूर्णिमाके माहात्म्यका वर्णन किया गया है। तत्पश्चात् कार्तिकमें कृत्तिकाके योगमें कृत्तिकाव्रत, फाल्गुन पूर्णिमामें पूर्णमनोरथव्रत, अशोकपूर्णिमाव्रत, अनन्तव्रत, साम्भरायणीव्रत, नक्षत्रपुरुषव्रत, शिवनक्षत्रपुरुषव्रत, कामदानव्रत, वृत्ताकविधि, आदित्यदिननक्तव्रत, संक्रान्तिके उद्यापनका विधान, भद्राव्रत, अगस्त्यार्घ्यव्रत, नवचन्द्रार्घ्य, शुक्र-बृहस्पति-अर्घ्य-प्रदानव्रत, पञ्चाशीतिव्रत, माघस्नान, नित्यस्नान, रुद्रस्नानकी विधि, चन्द्र और सूर्य-ग्रहणमें स्नान, भोजन-विधि, वापी, कूप तथा तडागका उत्सर्ग, वृक्ष-पूजा, देवपूजा, दीपदान, वृषोत्सर्गविधि, फाल्गुनी-उत्सव, मदनोत्सव, भूतमातोत्सव, श्रावणीमें रक्षाबन्धनकी विधि, चन्द्रोत्सव, दीपमालिका, होम, लक्षहोम, कोटिहोमकी विधि, महाशान्ति तथा विनायक-शान्ति, नक्षत्रहोम, गोदान-विधि, गुडधेनु, घृतधेनु, तिलधेनु, जलधेनु, लवणधेनु और नवनीतधेनु एवं सुवर्णधेनुदानके विधानोंका निरूपण हुआ है। ये सभी देवकार्य हैं, कल्याणकामी पुरुषोंको इन धर्मकार्योंको यथाशक्ति अवश्य करना चाहिये। (अध्याय २०८)

॥ भविष्यपुराणान्तर्गत उत्तरपर्व सम्पूर्ण ॥

॥ श्रीभविष्यमहापुराण सम्पूर्ण ॥

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पञ्जीकृत संख्या — जी० आर० — १३

पौ० गीताप्रेस — २७३००५

गोरखपुर, फोन (०५५१) २३३४७२१

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गीताप्रेस, गोरखपुरसे प्रकाशित पुराण, उपनिषद् आदि

  • 28 श्रीमद्भागवत-सुधासागर

  • 1490 श्रीमद्भागवत-सुधासागर (विशिष्ट संस्करण)

  • 25 श्रीशुकसुधासागर—बृहदाकार, बड़े टाइपमें

  • 1535 श्रीमद्भागवत-महापुराण—

  • 1536 सटीक, दो खण्डोंमें सेट, (विशिष्ट संस्करण)

  • 26 श्रीमद्भागवत-महापुराण—

  • 27 सटीक, दो खण्डोंमें सेट

  • 29 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल टाइपमें

  • 124 श्रीमद्भागवत-महापुराण—मूल टाइपमें

  • 1092 भागवत-महापुराण—मूल टाइपमें

  • 571 श्रीकृष्णमहाभक्तचिन्तन

  • 30 श्रीप्रेम-सुधासागर

  • 31 भागवत एकादश स्कन्ध

  • 728 महाभारत—हिन्दी टीका-सहित, सजिल्द, सचित्र [छः खण्डोंमें] सेट (अलग-अलग खण्ड भी उपलब्ध)

  • 38 महाभारत-खिलभाग हरिवंशपुराण—सटीक

  • 1589 ,, केवल हिन्दी

  • 637 जैमिनीयाश्वमेध पर्व

  • 39 संक्षिप्त महाभारत—केवल

  • 511 भाषा, सचित्र, सजिल्द सेट (दो खण्डोंमें)

  • 44 संक्षिप्त पद्मपुराण—सचित्र, सजिल्द

  • 1468 सं० शिवपुराण (विशिष्ट संस्करण)

  • 789 सं० शिवपुराण—मोटा टाइप

  • 1133 सं० देवीभागवत

  • 48 श्रीविष्णुपुराण—सटीक, सचित्र

  • 1364 श्रीविष्णुपुराण (केवल हिन्दी)

  • 1183 सं० नारदपुराण

  • 279 सं० स्कन्दपुराणांक

  • 539 सं० मार्कण्डेयपुराण

  • 1111 सं० ब्रह्मपुराण

  • 1113 नरसिंहपुराणम्—सटीक

  • 1189 सं० गरुडपुराण

  • 1362 अग्निपुराण (मूल संस्कृतका हिन्दी-अनुवाद)

  • 1361 सं० श्रीवराहपुराण

  • 584 सं० भविष्यपुराण

  • 1131 कूर्मपुराण—सटीक

  • 631 सं० ब्रह्मवैवर्तपुराण

  • 1432 श्रीवामन पुराण—सटीक

  • 557 मत्स्यमहापुराण—सटीक

  • 1610 देवीपुराण (महाभागवत) शक्तिपीठांक

  • 517 गर्गसंहिता

  • 47 पातंजलयोग-प्रदीप

  • 135 पातंजलयोगदर्शन

  • 582 छान्दोग्योपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य

  • 577 बृहदारण्यकोपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य

  • 1421 ईशादि नौ उपनिषद्—सानुवाद शांकरभाष्य

  • 66 ईशादि नौ उपनिषद्—अन्वय-हिन्दी व्याख्या

  • 67 ईशावास्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 68 केनोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 578 कठोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 69 माण्डूक्योपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 513 मुण्डकोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 70 प्रश्नोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 71 तैत्तिरीयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 72 ऐतरेयोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 73 श्वेताश्वतरोपनिषद्—सानुवाद, शांकरभाष्य

  • 65 वेदान्त-दर्शन—हिन्दी व्याख्या-सहित, सजिल्द

  • 639 श्रीनारायणीयम्—सानुवाद

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