भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 650, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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राजन्! जो संसारसे भयभीत होकर मोक्ष प्राप्त करना चाहता है, उसके लिये यही व्रत सर्वोत्तम है। यह रूप, आरोग्य और आयु प्रदान करनेवाला है तथा यह पितरोंको सर्वदा प्रिय है। जो पुरुष इसका अनुष्ठान करता है, वह त्रिभुवनका अधिपति होकर इक्कीस सौ कल्पोंतक चन्द्रलोकमें निवास करता है। जो स्त्री इस रोहिणीचन्द्रशयन नामक
व्रतका अनुष्ठान करती है, वह भी उसी पूर्वोक्त फलको प्राप्त करती है। साथ ही वह आवागमनसे मुक्त हो जाती है। चन्द्रमाके नाम-कीर्तनद्वारा भगवान् श्रीमधसूदनकी पूजाका यह प्रसङ्ग जो नित्य पढ़ता अथवा सुनता है, उसे भगवान् उत्तम बुद्धि प्रदान करते हैं तथा वह भगवान् श्रीविष्णुके धाममें जाकर देवसमूहके द्वारा पूजित होता है। (अध्याय २०६)
श्रीकृष्ण-युधिष्ठिर-संवादका उपसंहार और भगवान्का द्वारकागमन
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! व्रत, दान और धर्मके विषयमें मैंने आपको बतलाया। चूँकि इस सम्पूर्ण संसारका मूल धर्म ही है, इसलिये आप भी धर्मपरायण हो जायें। पार्थ! जानते हुए भी मैंने काम और अर्थका प्रकाश नहीं किया, क्योंकि इसमें तो सभी लोग स्वतः प्रवृत्त होते रहते हैं, अतः इसके वर्णनकी क्या आवश्यकता। पाण्डुनन्दन! इस भविष्योत्तरमें मैंने सदाचारसम्पन्न पुरुषोंके व्रत एवं दानसमूहोंका वर्णन किया। मैंने जो इतिहास और पुराणोंमें देखा और जो वेद-वेदाङ्गसे सम्बद्ध हैं, उन सभी विषयोंको यहाँ प्रदर्शित किया। राजन्! लोक-वेदविरुद्ध विषयोंमें आस्था नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह प्रलापमात्र ही है। आपसे विशेष स्नेह होनेके कारण मैंने यह सब वर्णन किया। पार्थ! दाम्भिक और शठके सम्मुख इन विषयोंको प्रकट नहीं करना चाहिये। नास्तिक, अश्रद्धालु और कुतर्कियोंसे इसकी चर्चा नहीं करनी चाहिये। सदाचारी, जितेन्द्रिय, सत्य और पवित्रतामें रत व्यक्तियोंके सामने इसके व्याख्यानसे सुगति प्राप्त होती है। पार्थ! आप स्वयं साक्षात् धर्मस्वरूप और धर्म एवं अर्थके तत्त्वके मर्मज्ञ तथा भूत-
भविष्यके ज्ञाता हैं। आपने इसे जाननेकी इच्छा प्रकट की, अतः मैंने आपके सम्मुख धर्मके रहस्यको प्रकाशित किया। मनुष्योंको इन विषयोंपर श्रद्धा-विश्वास रखना चाहिये। अब मैं द्वारकाके लिये प्रस्थान कर रहा हूँ, पुनः आपके महोत्सव और यज्ञके अवसरपर उपस्थित रहूँगा। सब कुछ कालके अधीन है, अतः किसी तरहका संताप नहीं करना चाहिये। इतना कहकर भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्नचित्त होकर पाण्डवोंद्वारा अर्चित—सम्मानित हुए, फिर सभी मित्रों और बन्धुजनोंकी सम्मति प्राप्तकर भगवान् श्रीकृष्णने ब्राह्मणोंको प्रणामकर द्वारकाकी ओर प्रस्थान किया।
सुमन्तुमुनि बोले—महाराज शतानीक! याज्ञवल्क्यमुनिने भगवान् वसिष्ठसे जिस विषयको पूछा था और उन्होंने जो उत्तर दिया तथा भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको जो कहा गया, उस विषयको मुनिश्रेष्ठ व्यासने पूर्वमें ही रच रखा था, उसी विषयका मैंने आपसे प्रतिपादन किया। पराशरके पुत्र तथा सत्यवतीके हृदयको आनन्द देनेवाले उन व्यासदेवकी जय हो। जिनके मुखकमलसे निःसृत हुई वाणीरूपी पवित्र मधुधाराका संसार पान करता है*। (अध्याय २०७)
- जयति पराशरसुतः सत्यवतीहृदयनन्दनो व्यासः । यस्यास्यकमलगलितं वाङ्मधुपुष्पं जगत् पिबति ॥ (उत्तरपर्व २०७ । १५)
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