भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 635, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
दिशामें उड़दसे सुपार्श्व नामक पर्वतकी स्थापना करे। इसे भी सुन्दर वस्त्र और पुष्पोंसे सुसज्जित करे, इसके शिखरपर स्वर्णमय वट-वृक्ष रख दे तथा सुवर्णनिर्मित गौसे सुशोभित कर दे। उसी प्रकार मधुसे बने हुए भद्रसर नामक सरोवर और चमकीली चाँदीसे निर्मित वनसे संयुक्त कर देना चाहिये। तत्पश्चात् पूर्व दिशामें एक हाथ लम्बा-चौड़ा और गहरा कुण्ड बनाकर तिल, घी, समिधा और कुशोद्धार चार श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे हवन कराये। वे सभी ब्राह्मण वेदों और पुराणोंके ज्ञाता, जितेन्द्रिय, अनिन्द्य, चरित्रवान् और सुरूप हों। रातमें मधुर शब्दोंमें गायन और तुरही आदि वाद्योंका वादन कराते हुए जागरण करना चाहिये। इन पर्वतोंका आवाहन इस प्रकार करे—
त्वं सर्वदेवगणधामनिधे च विघ्न- मस्मदगृहेष्खमरपर्वत नाशयाशु।
क्षेमं विधत्स्व कुरु शान्तिमनुत्तमां नः
सम्पूजितः परमभक्तिमतः प्रदेहि ॥
त्वमेव भगवानीशो ब्रह्मा विष्णुर्दिवाकरः।
मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन ॥
यस्मात् त्वं लोकपालानां विश्वमूर्तेश्च मन्दिरम्।
केशवार्कवसूनां च तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ मे ॥
यस्मादशून्यमपैर्गन्धर्वैश्च शिवेन च।
तस्मान्नामुद्भराशेषदुःखसंसारसागरात् ॥
(उत्तरपर्व १९५। २८—३१)
‘अमरपर्वत! आप समस्त देवगणोंके निवासस्थान और रलोंकी निधि हैं। आप हमारे घरोंमें स्थित विघ्न-बाधाओंको शीघ्र ही नष्ट कर दें, हमारे कल्याणका विधान करें और हमें श्रेष्ठ शान्ति तथा परम भक्ति प्रदान करें। सनातन! आप ही ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्य हैं तथा मूर्त (साकार) और अमूर्त (निराकार)-से परे संसारके बीज (कारणरूप) हैं, अतः
हमारी रक्षा करें। चूँकि आप लोकपालों, विश्वमूर्ति, केशव, सूर्य और वसुओंके निवासस्थान हैं, इसलिये मुझे शान्ति प्रदान करें। चूँकि आप देवताओं, गन्धर्वों और शिवजीसे अशून्य अर्थात् संयुक्त रहते हैं, इसलिये इस निखिल दुःखोंसे भरे हुए संसार-सागरसे मेरा उद्धार करें।’
इस विधिसे उस मेरुगिरिकी अर्चना करनेके पश्चात् मन्दराचलकी पूजा करनी चाहिये और इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये—‘मन्दराचल! चूँकि आप चैत्ररथ वन और भद्राश्व वर्षसे सुशोभित हैं, इसलिये शीघ्र ही मेरे लिये तुष्टिकारक बनें।’ ‘गन्धमादन! चूँकि आप जम्बूद्वीपके शिरोमणि हैं, इसलिये गन्धर्वों और अप्सराओंके द्वारा मेरे यशका गान हो।’ ‘विपुल! चूँकि आप केतुमाल वर्ष और वैश्राज वनसे सुशोभित हैं तथा आपका पाषाण स्वर्णमय है, इसलिये आप मुझे शक्ति प्रदान करें।’ ‘सुपार्श्व! चूँकि आप उत्तर कुरुवर्ष और सावित्र वनसे नित्य शोभित हैं, अतः मुझे अक्षय लक्ष्मी प्रदान करें।’ इस प्रकार उन सभी पर्वतोंको आमन्त्रित करके पुनः निर्मल प्रभात होनेपर स्नान आदिसे निवृत्त हो बीचवाला श्रेष्ठ पर्वत गुरु (यज्ञ करानेवाले)-को दान कर दे। इसी प्रकार चारों विष्कम्भपर्वतोंको चारों ऋत्विजोंको क्रमशः दान कर देना चाहिये। इसके बाद चौतीस, दस, सात अथवा आठ गौका दान करनेका विधान है। यदि यजमान निर्धन हो तो वह एक ही दुधारू कपिला गौ गुरुको दान करे। सभी पर्वतदानोंकी यही विधि है। उनके पूजनमें ग्रहों, लोकपालों और ब्रह्मा आदि देवताओंके वे ही मन्त्र हैं और वे ही सामग्रियाँ भी मानी गयी हैं। सभी पर्वत-पूजनोंमें उन-उनके मन्त्रोंके उच्चारणपूर्वक हवन करना चाहिये। यजमानको सदा व्रतमें उपवास करना चाहिये। यदि असमर्थ
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