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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 636, कुल 654 में से

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पृष्ठ 636
  • उत्तरपर्व *

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हो तो रातमें एक बार भोजन किया जा सकता है। भारत! अब आप सभी पर्वतदानोंकी विधि, मन्त्र और उनके फल सुनें। दान देते समय धान्यशैलसे इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये —

अत्रं ब्रह्म यतः प्रोक्तमन्त्रे प्राणाः प्रतिष्ठिताः। अत्राद् भवन्ति भूतानि जगदन्तरेन वर्धते॥ अत्रमेव यतो लक्ष्मीरत्रमेव जनार्दनः। धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगोत्तम॥

(उत्तरपर्व १९५।४३-४४)

‘पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि अत्रको ही ब्रह्म कहा जाता है और उसीमें प्राणियोंके प्राण प्रतिष्ठित हैं। अत्रसे

ही प्राणी उत्पन्न होते हैं, अत्रसे ही संसार संचालित हो रहा है, इसलिये अत्र ही लक्ष्मी है, अत्र ही भगवान् जनार्दन हैं, अतः धान्यशैलके रूपमें आप मेरी रक्षा करें।’

जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे धान्यमय पर्वतका दान करता है, वह सौ मन्वन्तरसे भी अधिक कालतक देवलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा अप्सराओं और गन्धर्वोंद्वारा व्याप्त सुन्दर विमानसे स्वर्गलोकको जाता है एवं उनके द्वारा पूजित होता है। पुनः पुण्य-क्षय होनेपर वह इस लोकमें निःसंदेह राजाधिराज होता है। (अध्याय १९५)

लवणाचलदान-विधि तथा गुडपर्वतकी महिमाके प्रसंगमें सुलभाका आख्यान

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं श्रेष्ठ लवणाचलके दानकी विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य शिवलोकको प्राप्त करता है। सोलह द्रोण नमकसे लवणाचल बनाना चाहिये, क्योंकि यही उत्तम है। उसके आधे आठ द्रोणसे मध्यम और चार द्रोणसे बना हुआ लवणाचल अधम माना गया है। निर्धन मनुष्यको अपनी शक्तिके अनुसार आधा या एक द्रोणका बनवाना चाहिये। इसके अतिरिक्त (पर्वत-परिमाणके) चौथाई द्रोणसे पृथक्-पृथक् (चार) विष्कम्भ (सहायक)-पर्वतोंका निर्माण कराना चाहिये। ब्रह्मा आदि देवताओंके पूजनका विधान सदा पूर्ववत् होना चाहिये। उसी प्रकार सभी स्वर्णमय वृक्ष एवं लोकपालोंके भी स्थापनका विधान है। पहलेकी तरह इसमें भी कामदेव आदि देवों और सरोवरोंका निर्माण कराना चाहिये तथा रातमें जागरण भी करना चाहिये। अब दान-मन्त्रोंको सुनिये—

सौभाग्यरससम्भूतो यतोऽयं लवणो रसः। दानात्मकत्वेन च मां पाहि पापान्नगोत्तम॥

तस्मादन्नरसाः सर्वे नोत्कृष्टा लवणां विना। प्रियं च शिवयोरित्यं तस्माच्छान्तिप्रदो भव॥ विष्णुदेहसमुद्भूतं यस्मादारोग्यवर्धनम्। तस्मात् पर्वतरूपेण पाहि संसारसागरात्॥

(उत्तरपर्व १९६।६-८)

‘पर्वतश्रेष्ठ! चूँकि यह नमकरूप रस सौभाग्य-सरोवरसे प्रादुर्भूत हुआ है, इसलिये इसके दानसे तुम मेरी रक्षा करो। चूँकि सभी प्रकारके अन्न एवं रस नमकके बिना उत्कृष्ट नहीं होते अर्थात् स्वादिष्ट नहीं लगते तथा तुम शिव और पार्वतीको सदा परम प्रिय हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो। चूँकि तुम भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए हो और आरोग्यकी वृद्धि करनेवाले हो, इसलिये तुम पर्वतरूपसे मेरा संसार-सागरसे उद्धार करो।’ जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे लवणपर्वतका दान करता है, वह एक कल्पतक पार्वतीलोकमें निवास करता है और अन्तमें परमगति—मोक्षको प्राप्त हो जाता है।

भगवान् श्रीकृष्ण पुनः बोले—महाराज! अब मैं उत्तम गुडपर्वतके दानकी विधि बतला रहा हूँ,

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