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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

पृष्ठ 637, कुल 654 में से

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पृष्ठ 637

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  • संक्षिप्त भविष्यपुराण *

जिससे धनी मनुष्य देवपूजित हो स्वर्गलोकको प्राप्त कर लेता है। दस भार गुडसे बना हुआ गुडपर्वत उत्तम, पाँच भारसे बना हुआ मध्यम और तीन भारसे बना हुआ कनिष्ठ कहा जाता है। स्वल्प वित्तवाला मनुष्य इसके आधे परिमाणसे भी काम चला सकता है। इसमें भी देवताओंका आमन्त्रण, पूजन, स्वर्णमय वृक्ष, देव-पूजन, विष्कम्भपर्वत, सरोवर, वन, देवता, हवन, जागरण और लोकपालोंकी स्थापना आदि धान्यपर्वतकी ही भाँति करनी चाहिये। उस समय यह मन्त्र उच्चारण करें—

यथा देवेषु विश्वात्मा प्रवरोऽयं जनार्दनः। सामवेदस्तु वेदानां महादेवस्तु योगिनाम्॥ प्रणवः सर्वमन्त्राणां नारीणां पार्वती यथा। तथा रसानां प्रवरः सदा चेक्षुरसो मतः॥ मम तस्मात् परां लक्ष्मीं प्रयच्छ गुडपर्वत। सुरासुराणां सर्वेषां नागयक्षक्षयन्त्रिणाम्॥ निवासश्चापि पार्वत्यास्तस्मान्मां पाहि सर्वदा।

(उत्तरपर्व १९७।५-८)

‘जिस प्रकार देवगणोंमें ये विश्वात्मा जनार्दन, वेदोंमें सामवेद, योगियोंमें महादेव, समस्त मन्त्रोंमें अकार और नारियोंमें पार्वती श्रेष्ठ हैं, उसी प्रकार रसोंमें इक्षुरस सदा श्रेष्ठ माना गया है। इसलिये गुडपर्वत! तुम मुझे उत्कृष्ट लक्ष्मी प्रदान करो। गुडपर्वत! चूँकि तुम देवताओं, असुरों, नागों, यक्षों, ऋक्षों तथा पार्वतीके भी निवासस्थान हो, अतः मुझे शान्ति प्रदान करो।’ जो मनुष्य उपर्युक्त विधिके अनुसार गुडपर्वतका दान करता है, वह गन्धर्वोद्धार पूजित होकर गौरीलोकमें प्रतिष्ठित होता है तथा सौ कल्प व्यतीत होनेपर दीर्घायु एवं नीरोगतासे सम्पन्न होकर भूतलपर जन्म ग्रहण करता है और शत्रुओंके लिये अजेय

होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर होता है। राजन्! इस गुडपर्वतदानकी महिमामें एक आख्यान है, उसे आप सुनें।

सुलभा नामकी एक महाभाग्यशालिनी व्रतपरायणा रानी थी। वह राजा मरुतकी प्यारी पत्नी थी और रूप-यौवनसे सम्पन्न थी। राजा मरुतके सात सौ रानियाँ थीं। ये सभी रानियाँ सुलभाकी आज्ञामें रहती थीं और राजा मरुत भी सुलभाके परामर्शको मानते थे। रानी भी राजासे अत्यन्त स्नेह करती थी। एक बारकी बात है कि दुर्वासामुनि राजाके यहाँ आये। राजा मरुतने अर्घ्य-पाद्यादिसे मुनिका सत्कार किया। दुर्वासाजीसे सुलभाने पूछा—‘भगवन्! किस पुण्यकर्मके प्रभावसे राजा मुझे अत्यन्त प्यार करते हैं। मेरा ही मुख देखते रहते हैं और मेरे वशमें हैं, मेरी सौतेँ भी मेरा प्रिय करनेमें तत्पर रहती हैं? ब्रह्मन्! यह सब आप बतलायें, इस विषयमें मुझे महान् कौतूहल है।’

दुर्वासाजी बोले—सुभगे! तुम अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको सावधान होकर सुनो। मैं तुम्हारे पूर्वजन्मोंकी बातोंको अच्छी तरह जानता हूँ। पूर्वजन्ममें तुम गिरिव्रजपुर (राजगृह—विहार)—में निवास करनेवाले एक वैश्यकी स्त्री थी। तुम धार्मिक, सत्यशील और पतिव्रता थी। वहाँ तुमने अपने पतिके साथ ब्राह्मणोंसे गुडपर्वत-दानके माहात्म्य और विधिको सुना था। तब तुमने गुडपर्वतका विधिवत् दान किया। वरानने! उसीके प्रभावसे तुम यह सुखभोग प्राप्त कर रही हो।

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाराज! उस सुलभाने अन्तमें सद्गति प्राप्त की। इस गुडपर्वतका दान स्त्रियोंके लिये विशेषरूपसे बताया गया है।

(अध्याय १९६-१९७)

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