भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 638, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
६२७
सुवर्ण एवं तिलशैलदान-विधि, तिलोंकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं पापहारी एवं श्रेष्ठ सुवर्णाचलकी दान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त करता है। एक हजार पलका सुवर्णाचल उत्तम, पाँच सौ पलका मध्यम और ढाई सौ पलका अधम (साधारण) माना गया है। अल्प वित्तवाला भी अपनी शक्तिके अनुसार गर्वरहित होकर एक पलसे कुछ अधिक सोनेका पर्वत बनवा सकता है। नृपश्रेष्ठ! शेष सारे कार्योंका विधान धान्यपर्वतकी भाँति ही करना चाहिये। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंकी भी स्थापना कर इन मन्त्रोंसे प्रार्थना करे—
नमस्ते ब्रह्मबीजाय ब्रह्मगर्भाय वै नमः॥
यस्मादनन्तफलदस्तस्मात् पाहि शिलोच्चय।
यस्मादग्नेरपत्यं त्वं यस्मात् तेजो जगत्यतेः॥
हेमपर्वतरूपेण तस्मात् पाहि नगोत्तम।
(उत्तरपर्व ११८।४—६)
‘शिलोच्चय! तुम ब्रह्मके बीजरूप हो, तुम्हें नमस्कार है। तुम्हारे गर्भमें ब्रह्मा स्थित रहते हैं, अतः तुम्हें प्रणाम है। तुम अनन्त फलके दाता हो, इसलिये मेरी रक्षा करो। जगत्पति पर्वतोत्तम! तुम अग्निकी संतान और जगदीश्वर शिवके तेजःस्वरूप हो, अतः सुवर्णाचलके रूपसे मेरा पालन करो।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे सुवर्णाचलका दान करता है, वह परम शिवलोकमें जाता है और वहाँ सौ वर्षोंतक निवास करनेके पश्चात् परमगतिको प्राप्त होता है।
राजन्! इसके बाद मैं तिलशैलदान-विधि बतला रहा हूँ, जिससे मनुष्य उत्तम विष्णुलोकको प्राप्त होता है। तिल अत्यन्त पवित्र हैं, पवित्रोंको भी पवित्र करनेवाले हैं। तिलकी उत्पत्ति विष्णुके
शरीरसे हुई है, इसलिये इन्हें उत्तम बतलाया गया है। मधु-कैटभ नामके दो राक्षस दितिके पुत्र थे। भगवान् विष्णुके साथ मधु दैत्यका अनवरत युद्ध चलता रहा। फिर भी दानव मरा नहीं। इसपर भगवान् विष्णु अत्यन्त क्रुद्ध हो गये। उनके शरीरसे स्वेदकी बूँदें पृथिवीपर गिरीं और इधर-उधर बिखर गयीं। उसीसे तिल, उड़द एवं कुश उत्पन्न हुए। भगवान् विष्णुने बलवानोंमें बली उस मधुको मार डाला। उसी मधुके मेद (चर्बी)-से सम्पूर्ण पृथ्वी रँग गयी। इसलिये पर्वतोंको धारण करनेवाली पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा। जब मधु दैत्य मारा गया तो सभी देवता प्रसन्न हो भगवान् विष्णुकी स्तुति करते हुए कहने लगे—‘देव! आपने ही संसारको धारण किया है। संसारकी सृष्टि आपने ही की है। मधुसूदन! यह सारा संसार अन्तमें आपमें ही लीन होता है। संसारका कल्याण करनेके लिये ये तिल आपके ही अङ्गसे उद्भूत हैं। देवेश! आप हम सबकी रक्षा करें।’
देवताओंकी यह स्तुति सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—देवगणो! ये तिल तीनों लोकोंकी रक्षा करनेवाले हैं। शुक्लपक्षमें देवताओंको और कृष्णपक्षमें पितरोंको तिलोदक देना चाहिये। सात या आठ बार तिलोदककी अञ्जलि देनेसे देवता और पितर संतुष्ट हो जाते हैं और देनेवालेका मङ्गल करते हैं। कुत्ते, कौए और पतियोंसे दूषित वस्तु तिलोंके अभ्युक्षण करनेसे पवित्र हो जाती है, इसमें कोई संदेह नहीं। इस प्रकार जो तिलपर्वतका दान ब्राह्मणको करता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय होता है।
राजेन्द्र! दस द्रोण तिलका बना हुआ तिलशैल
१-देवीभागवत, हरिवंश आदि पुराणोंमें मधुके मेदसे उत्पन्न होनेके कारण पृथ्वीका नाम मेदिनी पड़ा। यहाँ भी यही भाव है।
२-शकाकोपहतं यच्च पतितादिभिरेव च। तिलैरभ्युक्षितं सर्वं पवित्रं स्यान्न संशयः॥ (उत्तरपर्व ११९।१५)
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth