भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 639, कुल 654 में से
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- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
उत्तम, पाँच द्रोणका मध्यम और तीन द्रोणका कनिष्ठ बतलाया गया है। इसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंकी स्थापना तथा अन्यान्य सारा कार्य पूर्ववत् करना चाहिये। नृपश्रेष्ठ! तिलाचलकी प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिये—
यस्मान्मधुवधे विष्णोर्दहैस्वेदसमुद्भवः।
तिलाः कुशाश्च माषाश्च तस्माच्छं नो भवन्तिवह॥
हव्ये कव्ये च यस्माच्च तिलैरैवाभिमन्त्रणम्।
भवादुद्भर शैलेन्द्र तिलाचल नमोऽस्तु ते॥
(उत्तरपर्व १९९।१९-२०)
‘चूँकि मधुदैत्यके वधके समय भगवान् विष्णुके शरीरसे उत्पन्न हुए पसीनेकी बूँदोंसे तिल, कुश और उड़दकी उत्पत्ति हुई थी, इसलिये तुम इस लोकमें हम सबका कल्याण
करो। शैलेन्द्र तिलाचल! चूँकि देवताओंके हव्य और पितरोंके कव्य—दोनोंमें तिलोंसे ही अभिमन्त्रण किया जाता है, इसलिये तुम मेरा भवसागरसे उद्भार करो, तुम्हें नमस्कार है।’
इस प्रकार आमन्त्रित कर जो मनुष्य श्रेष्ठ तिलाचलका दान करता है, वह पुनरागमनरहित विष्णुपदको प्राप्त हो जाता है। उसे इस लोकमें दीर्घायुकी प्राप्ति होती है, वह पुत्र एवं पौत्रोंको प्राप्त कर उनके साथ आनन्द मनाता है तथा अन्तमें देवताओं, गन्धर्वों और पितरोंद्वारा पूजित होकर स्वर्गलोकको चला जाता है। इस दानके माहात्म्यको सुननेसे कपिलादानका पुण्य प्राप्त होता है।
(अध्याय १९८-१९९)
कपास एवं घृतपर्वतोंके दानकी महिमा
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं कपासपर्वतके दानकी विधि बता रहा हूँ। यह सभी दानोंमें श्रेष्ठ और समस्त देवताओंको परम प्रिय है। अपने कुटुम्बका उद्भार करनेके लिये उपयुक्त देश-काल और धनको प्राप्तकर श्रद्धापूर्वक इस महादानको यत्नपूर्वक करना चाहिये। बीस भार रूईसे बना हुआ कपासपर्वत उत्तम, दस भारसे बना हुआ मध्यम और पाँच भारसे बना हुआ अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प सम्पत्तिवाला मनुष्य कृपणता छोड़कर एक भार कपासके बने हुए पर्वतका दान कर सकता है। नृपश्रेष्ठ! धान्यपर्वतकी भाँति सारी सामग्री एकत्र कर रात्रिके व्यतीत होनेपर प्रातःकाल इस दानको करना चाहिये। उस समय यह मन्त्र पढ़े—
त्वमेवावरणं यस्माल्लोकानामिह सर्वदा।
कार्पासाचल नस्तस्मादधीघव्यंसनो भव॥
(उत्तरपर्व २००।७)
‘कार्पासाचल! चूँकि इस लोकमें तुम्हीं सदा सभी लोगोंके शरीरके आच्छादन हो, इसलिये तुम्हें नमस्कार है। तुम मेरे पापसमूहका विनाश कर दो।’ इस प्रकार जो मनुष्य भगवान् शिवके संनिधानमें कार्पासाचलका दान करता है, वह एक कल्पतक रुद्रलोकमें निवास करनेके पश्चात् भूतलपर सौभाग्यशाली राजा होता है।
राजन्! इसके बाद मैं दिव्य तेजसे सम्पन्न अमृतमय और महान्-से-महान् पापोंके विनाशक श्रेष्ठ घृताचलदानका वर्णन कर रहा हूँ। पचास घड़े घीसे बना हुआ घृताचल उत्तम, पचीससे मध्यम और उसके आधेसे अधम (साधारण) कहा गया है। अल्प वित्तवाला भी यदि करना चाहे तो वह यथाशक्ति घृताचलकी रचना करके दान कर सकता है। उसके चतुर्थीशसे विष्कम्भपर्वतोंकी भी कल्पना करनी चाहिये। उन सभी घड़ोंके ऊपर अगहनी चावलसे परिपूर्ण पात्र रखा जाय और
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