भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 640, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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उन्हें विधिपूर्वक एकके ऊपर एक रखकर ऊँचा कर देना चाहिये। उन्हें श्वेत वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर उनके निकट गन्ना और फल आदि रख दे। इसमें शेष सारा विधान धान्यपर्वतकी ही भाँति बतलाया गया है। देवताओंकी स्थापना, उनका अर्चन और हवन भी उसी प्रकार करना चाहिये। रात्रि व्यतीत होनेपर प्रातःकाल यजमान शान्त मनसे वह घृताचल गुरुको निवेदित कर दे। उसी प्रकार विष्कम्भपर्वतोंको भी ऋत्विजोंको दान कर दे, उस समय इस मन्त्रका पाठ करना चाहिये— संयोगादघृतमुत्पन्नं यस्मादमुत्ततेजसोः। तस्मादघृताचलश्चास्मात् प्रीयतां मम शंकरः ॥
यस्मात् तेजोमयं ब्रह्मा घृते नित्यं व्यवस्थितम्। घृतपर्वतरूपेण तस्मान्नः पाहि भूधर ॥
(उत्तरपर्व २०१।८-९)
‘चूँकि अमृत और अग्निके संयोगसे घृत उत्पन्न हुआ है, इसलिये घृताचलरूप शंकर इस व्रतसे प्रसन्न हों। चूँकि ब्रह्म तेजोमय है और घीमें विद्यमान है, ऐसा जानकर घृतपर्वतरूप मूधर! हमारी रक्षा करो।’ जो मनुष्य इस विधिसे इस श्रेष्ठ घृताचलका दान करता है, वह महापापी होनेपर भी शिवलोकको प्राप्त होता है।
(अध्याय २००-२०१)
रत्नाचल और रौप्याचलदानका माहात्म्य
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—राजन्! अब मैं श्रेष्ठ रत्नाचलदान-विधिका वर्णन कर रहा हूँ। इससे दाता सप्तर्षिलोक प्राप्त करता है। एक हजार मुक्ताफल (मोतियों)-द्वारा बना हुआ पर्वत उत्तम, पाँच सौसे बना हुआ मध्यम और तीन सौसे बना हुआ अधम (साधारण) माना गया है। अल्पवित्त व्यक्ति सौ मुक्ताफलोंसे रत्नाचलका दान करे। कल्पित पर्वतके चतुर्थांशसे उसके चारों दिशाओंमें विष्कम्भपर्वतोंको स्थापित करना चाहिये। विद्वानोंको पूर्व दिशामें हीरा और गोमेदसे मन्दराचलकी, दक्षिणमें पुष्पराग (पुखराज) और इन्द्रनील (नीलम) मणिके संयोगसे गन्धमादनकी, पश्चिममें वैदूर्य और मूँगैके सम्मिश्रणसे विपुलाचलकी और उत्तरमें गारुत्पत मणिसहित पद्मराग (माणिक्य) मणिसे सुपार्श्व पर्वतकी स्थापना करनी चाहिये। इस दानमें भी धान्यपर्वतकी तरह सारे उपकरणोंकी कल्पना करे। उसी प्रकार स्वर्णमय देवताओं, वनों और वृक्षोंका स्थापन एवं आवाहन करे तथा पुष्प, गन्ध आदिसे उनका पूजन करे। प्रातःकाल
मत्सररहित होकर वह सारा सामान गुरु और ऋत्विजोंको दान कर दे। उस समय इन मन्त्रोंका उच्चारण करे—
यथा देवगणाः सर्वे सर्वरत्नेष्ववस्थिताः। त्वं च रत्नमयो नित्यमतः पाहि महाचल ॥ यस्माद्वलप्रदानेन तुष्टिमेति जनार्दनः। पूजारत्नप्रदानेन तस्मान्नः पाहि सर्वदा ॥
(उत्तरपर्व २०१।८-९)
‘अचल! जब सभी देवगण सम्पूर्ण रत्नोंमें निवास करते हैं, तब तुम तो नित्य रत्नमय ही हो, अतः महाचल! हमारी रक्षा करो। पर्वत! चूँकि सदा रत्नका दान करनेसे श्रीहरि संतुष्ट हो जाते हैं, अतः तुम हमारी रक्षा करो।’
जो मनुष्य उपर्युक्त विधिसे रत्नमय पर्वतका दान करता है, वह इन्द्रसे सत्कृत हो विष्णु-सालोक्यको प्राप्त करता है और वहाँ सौ कल्पोंसे भी अधिक कालतक निवास करता है। पुनः इस लोकमें जन्म लेनेपर वह सौन्दर्य, नीरोगता और सदगुणोंसे युक्त होकर सातों द्वीपोंका अधीश्वर
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