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भारतकोश
भविष्य पुराण

भविष्य पुराण

Bhavishya Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished654 पृष्ठ

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  • उत्तरपर्व *

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विषुवयोगमें, व्यतीपातयोगमें, ग्रहणके समय, सूर्य अथवा चन्द्रमाके अदृश्य हो जानेपर, शुक्लपक्षकी तृतीया, द्वादशी या पूर्णिमा तिथिके दिन, विवाह, उत्सव और यज्ञके अवसरोंपर तथा पुण्यप्रद शुभ नक्षत्रके योगमें विद्वान् दाताको शास्त्रादेशानुसार विधिपूर्वक धान्यशैल आदि पर्वतदानोंको करना चाहिये। इसके लिये तीर्थोंमें, देवमन्दिरमें, गोशालामें अथवा किसी नदीके संगमपर भक्तिपूर्वक विधि-विधानके साथ एक चौकोर मण्डपका निर्माण कराये, उसमें उत्तर और पूर्व दिशामें दो दरवाजे हों तथा उसकी भूमि पूर्वोत्तर दिशामें ढालू हो। उस मण्डपकी गोबरसे लिपी-पुती भूमिपर कुश बिछाकर उसके बीचमें विष्कम्भपर्वतसहित* देय पदार्थकी पर्वताकार राशि लगा दे। इस विषयमें एक हजार द्रोण अन्नका पर्वत उत्तम, पाँच सौ द्रोणका मध्यम और तीन सौ द्रोणका कनिष्ठ माना जाता है।

महान् धान्यराशिसे बने हुए मेरुपर्वतको, मध्यमें तीन स्वर्णमय वृक्षोंसे युक्त कर, पूर्व दिशामें मोती और हीरेसे, दक्षिण दिशामें गोमेद और पुष्पराग (पुखराज)-से, पश्चिम दिशामें गारुत्मत (पन्ना) और नीलम मणिसे, उत्तर दिशामें वैदूर्य और पद्मराग मणिसे तथा चारों ओर चन्दनके टुकड़ों और मूँगैसे सुशोभित कर दे। उसे लताओंसे परिवेष्टित तथा सीपीके शिला-खण्डोंसे सुसज्जित कर दिया जाय। पुनः यजमान गर्वरहित होकर अनेकों द्विजसमूहोंके साथ उस पर्वतके मूर्धास्थानपर ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, शंकर और सूर्यकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित करे। उसी प्रकार चारों दिशाओंमें गन्ना और बाँससे ढकी हुई कन्दराएँ तथा घी और जलके झरने भी बनाये जायँ। पुनः पूर्व दिशामें श्वेत वस्त्रोंसे, दक्षिण दिशामें काले वस्त्रोंसे, पश्चिम दिशामें

केसरिया वस्त्रोंसे और उत्तर दिशामें लाल वस्त्रोंसे बादलोंकी पंक्तियाँ बनायी जायँ। फिर चाँदीके बने हुए महेंद्र आदि आठों लोकपालोंको क्रमशः स्थापित करे और उस पर्वतके चारों ओर अनेकों प्रकारके फल, मनोरम पुष्पमालाएँ और चन्दन भी रख दे। उसके ऊपर पँचरंगा चँदोवा लगा दे और उसे खिले हुए श्वेत पुष्पोंसे विभूषित कर दे। इस प्रकार श्रेष्ठ अमरशैल (सुमेरुगिरि)-की स्थापना कर उसके चतुर्थांशसे इसके चारों दिशाओंमें क्रमशः विष्कम्भ (मर्यादा)-पर्वतोंकी स्थापना करनी चाहिये। ये सभी पुष्प और चन्दनसे सुशोभित हों। पूर्व दिशामें मन्दराचलका आकार बनाये, उसके निकट अनेकों प्रकारके फलोंकी कतारें लगा दे, उसे कनकभद्र (देवदारु) और कदम्ब-वृक्षोंके चिह्नोंसे सुशोभित कर दे, उसपर कामदेवकी स्वर्णमयी प्रतिमा स्थापित करे। फिर उसे अपनी शक्तिके अनुसार चाँदीके बने हुए वन और दुर्धनिर्मित अरुणोद नामक सरोवरसे सुशोभित करे। तत्पश्चात् वस्त्र, पुष्प और चन्दन आदिसे उसे भरपूर सुसज्जित कर देना चाहिये।

दक्षिण दिशामें गेहूँकी राशिसे गन्धमादनकी रचना करनी चाहिये। उसे स्वर्णपत्रसे सुशोभित कर दे। उसपर यज्ञपतिकी स्वर्णमयी मूर्ति स्थापित कर उसे वस्त्रोंसे परिवेष्टित कर दे। फिर उसे घीके सरोवर और चाँदीके वनसे सुशोभित कर देना चाहिये। पश्चिम दिशामें अनेकों सुगन्धित पुष्पों, स्वर्णमय पीपल-वृक्ष और सुवर्णनिर्मित हंससे युक्त तिलाचलकी स्थापना करनी चाहिये। उसी प्रकार इसे भी वस्त्रसे परिवेष्टित तथा चाँदीके पुष्पवनसे सुशोभित कर दे। इसके अग्रभागमें दहीसे सितोद सरोवरकी भी रचना करे। इस प्रकार उस विपुल शैलकी स्थापना करके उत्तर

  • सुमेरुगिरिके चारों ओर स्थित मन्दर, गन्धमादन, विपुल और सुपार्थ नामक पर्वतोंको 'विष्कम्भ—सहायक पर्वत' कहा जाता है।

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