भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 633, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें६२२
- संक्षिप्त भविष्यपुराण *
वराहदानका विधान
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—महाराज! अब मैं सभी पापोंको हरनेवाले पवित्र और सब दानोंमें उत्तमादि उस वराहदानका विधान बता रहा हूँ, जिसके दानका विधान साक्षात् भगवान्ने अपने मुखसे धरणीदेवीको बताया था। यह दान संक्रान्ति, ग्रहण, द्वादशी, यज्ञोत्सव, विवाह, दुःस्वप्न-दर्शन आदि कालोंमें अथवा जब श्रद्धा हो तब करना चाहिये। कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों, गङ्गा आदि नदियोंके किनारे, पवित्र पुरियों, अरण्यों, वनों, गोष्ठ, देवालय अथवा अपने घरपर ही कुटुम्बी ब्राह्मणको विधिपूर्वक दान देना चाहिये। वह ब्राह्मण वेद-वेदाङ्ग जाननेवाला सुशील और सम्पूर्णङ्ग होना चाहिये।
पवित्र भूमिपर प्रणव-मन्त्रसे कुशा बिछाकर उसपर यथाशक्ति दो अथवा चार द्रोण तिलोंसे भगवान् वराहकी मूर्ति बनाये। उसका मुख सुवर्णका और चाँदीका जबड़ा बनाकर पद्मरागसे उसे अलंकृत कर दे। दो भुजाओंमें चक्र और गदा धारण कराये, सुवर्णका बना शङ्ख तथा
वनमाला अगल-बगलमें रख दे। उसके दोनों पैरोंको पुष्पोंसे अथवा चाँदीसे निर्मित करे। उसके दाँतके अग्रभागपर लगी हुई एक सुवर्णमयी पृथ्वी अङ्कित करे। समस्त धान्य-पदार्थों और रसोंको स्थापित करे। उसके शरीरको अलंकृत कर वस्त्रसे आच्छादित कर दे। कुशोंसे रोएँ बना दे। तदनन्तर गन्ध, पुष्प आदिसे उस वराहभगवान्की प्रतिमाकी अर्चना करे। फिर ग्रहयज्ञ और तिलोंसे होम करे। अनन्तर भगवान् वराहकी स्तुतिकर नमस्कार करे तथा प्रदक्षिणा कर वस्त्र, आभूषण और दक्षिणासहित वह प्रतिमा ब्राह्मणको दे दे। राजन्! इस दानसे सभी यज्ञों और सभी दानोंका फल प्राप्त हो जाता है। वराहभगवान्ने जिस प्रकार भूमिका उद्धार किया, उसी भाँति इस दानको करनेवाला पुरुष अपने कुलका उद्धार करता है और विष्णुलोकमें पूजित होता है। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्री, शैव, वैष्णव, योगी आदि सभी यह दान कर सकते हैं।
(अध्याय १९४)
दशविध पर्वतदानोंमें धान्यशैलदानकी विधि और महिमा
महाराज युधिष्ठिरने कहा—भगवन्! अब मैं विविध दानोंके उत्तम माहात्म्यको सुनना चाहता हूँ, जो देवगणों एवं ऋषिसमूहोंद्वारा पूजित और परलोकमें अक्षय फल देनेवाला है।
भगवान् श्रीकृष्ण बोले—राजन्! प्राचीन कालमें इस विषयको भगवान् रुद्रने देवर्षि नारदसे और मत्स्यभगवान्ने स्वायम्भुव मनुसे कहा था। उस मेरु (पर्वत)-दानके दस भेदोंको मैं बतला रहा हूँ जिनका दान करनेसे मनुष्य देवपूजित लोकोंको प्राप्त करता है। उसे इस लोकमें जिस फलकी
प्राप्ति होती है, वह वेदों और पुराणोंके अध्ययनसे, यज्ञानुष्ठानसे और देव-मन्दिर आदिके निर्माणसे भी नहीं प्राप्त होता। इसलिये अब मैं पर्वतोंके क्रमसे उनके विधानका वर्णन कर रहा हूँ। उनके नाम इस प्रकार हैं—पहला धान्यशैल, दूसरा लवणाचल, तीसरा गुडाचल, चौथा हेमपर्वत, पाँचवाँ तिलशैल, छठा कार्पासपर्वत, सातवाँ घृतशैल, आठवाँ रत्नशैल, नवाँ रजतशैल और दसवाँ शर्कराचल। इनका विधान यथार्थरूपसे क्रमशः बतला रहा हूँ। सूर्यके उत्तरायण और दक्षिणायनके समय, पुण्यमय,
In Public Domain. Digitized by Sarvagya Sharda Peeth