भविष्य पुराण
Bhavishya Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 632, कुल 654 में से
संदर्भ में पढ़ें- उत्तरपर्व *
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जीवोंका उसको भय नहीं होता। कोई भी हिंसक प्राणी उसकी हिंसा नहीं कर पाता और अन्त समयमें देवताओंसे पूजित हो वह देवीलोकको प्राप्त करता है। वहाँ बहुत कालतक सुख भोगकर पुण्यक्षीण होनेपर मर्त्यलोकमें जन्म लेकर धर्मात्मा राजा होता है। दशमीको दस दिशा-देवियोंकी सोनेकी प्रतिमा बनाकर और दस पार्वतोंमें नमक, गुड़, दूध, निष्पाव, तिल, दही, घी, गोमय, चावल तथा उड़द भरकर इनके ऊपर एक-एक देवीकी स्थापना करे। वस्त्र-पुष्प आदिसे उनकी पूजाकर ब्राह्मणको दान कर दे। इस दानसे दानकर्ताके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं और मृत्युके अनन्तर वह स्वर्गमें पूजित होता है। बहुत कालतक स्वर्गका सुख भोगकर पृथ्वीमें उत्तम कुलमें जन्म प्राप्त करता है। एकादशीके दिन सुवर्णकी भगवान् विष्णुकी प्रतिमा बनाये। उसे घृतपूर्ण ताम्रपात्रके ऊपर स्थापित कर सभी उपचारोंसे उसका पूजन करे। पूजनके अनन्तर पञ्चाग्नि तापनेवाले तथा पौराणिक ब्राह्मणको इसे देना चाहिये। इससे विष्णुलोककी प्राप्ति होती है।
द्वादशीके दिन गौ, वृष, सुवर्ण, सप्तधान्य, गुड़, फल, घृत और अनेक प्रकारके रस तथा फलवाले वृक्ष, फूल तथा सुगन्धित पदार्थ आदिको यथाशक्ति एकत्र कर सबको नवीन वस्त्रसे आच्छादित कर सत्पात्र ब्राह्मणोंको दान करे अथवा एक ही ब्राह्मणको प्रदान करे। इससे दाता बहुत कीर्ति और ऐश्वर्य प्राप्तकर अन्तमें विष्णुलोकको जाता है। वहाँ बहुत कालतक निवास कर पुण्यक्षय होनेपर पृथ्वीपर जन्म लेकर यज्ञ करनेवाला दानी और प्रतापी राजा होकर शतायु होता है। त्रयोदशीके दिन तेरह सत्पात्र ब्राह्मणोंको
स्नान कराये, उत्तम वस्त्र पहिनाये, गन्ध, पुष्प आदिसे अलंकृत कर उनकी अर्चना करे तथा उत्तम भोजन कराये और दक्षिणामें सुवर्ण देकर 'धर्मो मे प्रीयताम्' ऐसा कहे और श्रद्धापूर्वक धर्मराजके इन तेरह नामों—धर्मराज, काल, चित्रगुप्त, दण्डी, मृत्यु, क्षयरूप, अन्तक, यम, प्रेतनाथ, रौद्र, वैवस्वत, महिषस्थ तथा देवका उच्चारणकर नमस्कार करे और विसर्जन करे। इस विधिसे जो पुरुष यमराजका अर्चन करता है, वह सभी रोगोंसे छुटकारा प्राप्त कर लेता है और यममार्गमें कष्ट नहीं पाता। पितृलोकमें बहुत कालतक निवासकर वह मर्त्यलोकमें जन्म लेकर सुखी और पुत्रवान् होता है।
चतुर्दशीके दिन उत्तम सुन्दर सोनेकी महिषकी प्रतिमा बनाकर उसे जलपूर्ण कलशपर स्थापित कर वस्त्रसे ढककर वस्त्र तथा अलंकारोंसे सुशोभित करे। उसके साथ वृषभ भी रखे। इस प्रकार निर्माणकर उसे कुटुम्बी ब्राह्मणको दान कर दे। इससे शिवलोककी प्राप्ति होती है, वहाँ बहुत कालतक सुख भोगकर आरोग्य, धन और उत्तम कुलमें जन्म पाता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। पूर्णिमाके दिन वृषोत्सर्ग करना चाहिये। चाँदीकी एक चन्द्रमाकी प्रतिमा बनाकर गन्ध, पुष्प, नैवेद्य आदिसे उसका पूजनकर वस्त्र तथा आभूषणसहित ब्राह्मणको प्रदान करे। यह दान करनेवाला चन्द्रमाके समान कान्तिमान् होता है और अप्सराओंसे पूजित होता है। जो पुरुष इस क्रमसे प्रतिपदा आदि तिथियोंमें ब्राह्मणोंको दान करता है, वह ब्रह्मलोक, विष्णुलोक आदिमें बहुत कालतक निवासकर अन्तमें शिव-सायुज्यको प्राप्त करता है। (अध्याय १९३)
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